‘जीवाश्म ईंधन अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा’: ब्रिक्स घोषणा ने कार्बन सीमा कर का किया विरोध।
यह सिर्फ एक शीर्षक नहीं, बल्कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के एक शक्तिशाली समूह – ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) – का दुनिया को दिया गया एक स्पष्ट और जोरदार संदेश है। जलवायु परिवर्तन से जूझ रही दुनिया में जहां जीवाश्म ईंधन को खलनायक के तौर पर देखा जा रहा है, वहीं ब्रिक्स देशों ने एक सुर में कहा है कि उनकी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए जीवाश्म ईंधन (जैसे कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस) अभी भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसके साथ ही, उन्होंने पश्चिमी देशों द्वारा प्रस्तावित 'कार्बन सीमा कर' (Carbon Border Tax) का भी कड़ा विरोध किया है, जिसे वे अनुचित और भेदभावपूर्ण मानते हैं।
क्या हुआ और यह इतना अहम क्यों है?
हाल ही में हुई अपनी घोषणा में, ब्रिक्स देशों ने अपनी आर्थिक प्रगति और ऊर्जा सुरक्षा के लिए जीवाश्म ईंधन पर निरंतर निर्भरता को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के वैश्विक प्रयासों के बावजूद, उनके विकास पथ पर जीवाश्म ईंधन का महत्व बना रहेगा। इस घोषणा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ब्रिक्स ने यूरोपीय संघ जैसे विकसित देशों द्वारा लगाए जा रहे या प्रस्तावित 'कार्बन सीमा समायोजन तंत्र' (Carbon Border Adjustment Mechanism - CBAM), जिसे आम भाषा में कार्बन सीमा कर कहा जाता है, को अस्वीकार कर दिया है।
यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब दुनिया भर में नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए रिन्यूएबल ऊर्जा स्रोतों पर जोर दिया जा रहा है। ब्रिक्स का यह रुख दर्शाता है कि विकासशील और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं जलवायु परिवर्तन पर अपने दृष्टिकोण में अपनी विकास संबंधी प्राथमिकताओं को सर्वोपरि मानती हैं। यह सिर्फ जलवायु नीति पर एक असहमति नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और कूटनीति पर गहरा प्रभाव डालने वाला एक महत्वपूर्ण बयान है।
कार्बन सीमा कर क्या है और ब्रिक्स इसका विरोध क्यों कर रहा है?
कार्बन सीमा कर एक प्रकार का शुल्क है जो उन उत्पादों पर लगाया जाता है जो ऐसे देशों से आयात किए जाते हैं जहाँ कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने के नियम कम सख्त होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य 'कार्बन लीकेज' को रोकना है। कार्बन लीकेज तब होता है जब कोई कंपनी अपने उत्पादन को ऐसे देश में स्थानांतरित कर देती है जहाँ कार्बन उत्सर्जन पर कम प्रतिबंध या लागत होती है, ताकि वह अपने उत्पादों को सस्ता बेच सके। यूरोपीय संघ ने अपने CBAM को इसी तर्क के साथ पेश किया है कि इससे उन कंपनियों को प्रोत्साहन मिलेगा जो पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन प्रक्रियाओं को अपनाती हैं और यह वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद करेगा।
हालांकि, ब्रिक्स देश इसे एक संरक्षणवादी उपाय (protectionist measure) के रूप में देखते हैं जो उनके निर्यात को महंगा बना देगा और उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर अनुचित बोझ डालेगा। वे तर्क देते हैं कि यह विकासशील देशों को उन संसाधनों से वंचित करेगा जिनकी उन्हें गरीबी कम करने और अपने नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार करने के लिए आवश्यकता है। उनका यह भी मानना है कि विकसित देशों को ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और उन्हें विकासशील देशों पर अपने कार्बन कटौती के बोझ को थोपना नहीं चाहिए।
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इस घोषणा के पीछे की पृष्ठभूमि: विकास बनाम पर्यावरण
इस पूरे मुद्दे की जड़ में विकासशील और विकसित देशों के बीच 'सामान्य लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां' (Common But Differentiated Responsibilities - CBDR) का सिद्धांत है। यह सिद्धांत स्वीकार करता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी देशों की जिम्मेदारी है, लेकिन विकसित देशों की ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन में भूमिका रही है, इसलिए उनकी जिम्मेदारी अधिक है। ब्रिक्स देश इसी सिद्धांत पर जोर देते हुए कहते हैं कि उन्हें अपनी अर्थव्यवस्थाओं को विकसित करने और लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने के लिए अभी भी जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता है।
ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास
- भारत: दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक, भारत की ऊर्जा मांग तेजी से बढ़ रही है। कोयला अभी भी इसकी बिजली उत्पादन का प्रमुख स्रोत है और ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
- चीन: दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता और उत्सर्जक, चीन भी अपनी विशाल अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए जीवाश्म ईंधन पर बहुत अधिक निर्भर करता है, हालांकि वह रिन्यूएबल ऊर्जा में भारी निवेश भी कर रहा है।
- रूस: एक प्रमुख तेल और गैस निर्यातक, जिसकी अर्थव्यवस्था इन संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर करती है।
- ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका: ये देश भी अपनी विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए जीवाश्म ईंधन का उपयोग करते हैं, भले ही उनके पास नवीकरणीय ऊर्जा की अच्छी क्षमता हो।
इन देशों का मानना है कि जीवाश्म ईंधन से अचानक मुंह मोड़ना उनकी अर्थव्यवस्थाओं के लिए अस्थिरता पैदा कर सकता है, जिससे लाखों लोगों के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वे तर्क देते हैं कि ऊर्जा संक्रमण (energy transition) एक क्रमिक प्रक्रिया होनी चाहिए जो उनकी विकास संबंधी जरूरतों के साथ तालमेल बिठाए।
क्यों ट्रेंडिंग है और इसका वैश्विक प्रभाव क्या होगा?
यह मुद्दा इसलिए ट्रेंड कर रहा है क्योंकि यह वैश्विक जलवायु नीति, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और भू-राजनीतिक संबंधों के बीच एक बड़ा टकराव पैदा करता है।
वैश्विक व्यापार पर प्रभाव
यदि यूरोपीय संघ जैसे देश कार्बन सीमा कर लागू करते हैं, तो ब्रिक्स देशों से आयात होने वाले सामान महंगे हो जाएंगे। इसका सीधा असर उनके निर्यात पर पड़ेगा, खासकर लोहा, स्टील, सीमेंट, एल्युमीनियम और उर्वरक जैसे ऊर्जा-गहन क्षेत्रों पर। यह एक 'व्यापार युद्ध' (trade war) की स्थिति पैदा कर सकता है जहां ब्रिक्स देश जवाबी शुल्क या नीतियों पर विचार कर सकते हैं, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो सकती हैं।
जलवायु कार्रवाई पर द्वंद्व
यह घोषणा जलवायु कार्रवाई के भविष्य पर भी सवाल उठाती है। क्या विकसित और विकासशील देश एक साझा ज़मीन पर आ पाएंगे, या जलवायु नीतियों के कारण व्यापारिक बाधाएं और तनाव बढ़ेंगे? ब्रिक्स का रुख यह स्पष्ट करता है कि जलवायु लक्ष्य तभी प्रभावी हो सकते हैं जब वे विकासशील देशों की आर्थिक वास्तविकताओं और जरूरतों को ध्यान में रखें।
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तथ्य और आंकड़े
- ब्रिक्स का वैश्विक योगदान: ब्रिक्स देश दुनिया की लगभग 41% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 25-30% का योगदान करते हैं।
- कार्बन उत्सर्जन: ब्रिक्स देश सामूहिक रूप से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो उनके विकास के साथ जुड़ा हुआ है।
- EU CBAM: यूरोपीय संघ का CBAM 2026 से पूरी तरह लागू होने वाला है, जिसमें आयरन, स्टील, सीमेंट, एल्युमीनियम, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों को लक्षित किया जाएगा।
- भारत की ऊर्जा निर्भरता: अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, भारत अपनी प्राथमिक ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80% जीवाश्म ईंधन से पूरा करता है, और कोयला देश की बिजली का 70% से अधिक हिस्सा प्रदान करता है।
दोनों पक्ष: तर्क और प्रति-तर्क
कार्बन सीमा कर के समर्थक (विकसित देश/यूरोपीय संघ)
- कार्बन लीकेज की रोकथाम: यह उन उद्योगों को हतोत्साहित करता है जो कम सख्त उत्सर्जन नियमों वाले देशों में उत्पादन स्थानांतरित करके अपना कार्बन पदचिह्न कम करने की कोशिश करते हैं।
- समान प्रतिस्पर्धा: यह उन घरेलू उद्योगों के लिए समान अवसर प्रदान करता है जो अपने ही देश में कड़े कार्बन मूल्य निर्धारण का सामना कर रहे हैं।
- वैश्विक decarbonization को प्रोत्साहन: यह अन्य देशों को अपनी कार्बन नीतियों को मजबूत करने और स्वच्छ उत्पादन तरीकों में निवेश करने के लिए प्रेरित करता है।
- पर्यावरणीय लक्ष्य: यह वैश्विक उत्सर्जन को कम करने और पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है।
कार्बन सीमा कर के विरोधी (ब्रिक्स/विकासशील देश)
- भेदभावपूर्ण और संरक्षणवादी: इसे विकासशील देशों के निर्यात को लक्षित करने वाला एक अनुचित व्यापार बाधा माना जाता है।
- विकास पर नकारात्मक प्रभाव: यह उन देशों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालता है जिन्हें अभी भी गरीबी उन्मूलन और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए तीव्र आर्थिक विकास की आवश्यकता है।
- ऐतिहासिक जिम्मेदारी: विकसित देशों ने औद्योगिक क्रांति के दौरान भारी उत्सर्जन किया है और उन्हें अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।
- WTO नियमों का उल्लंघन: कुछ विशेषज्ञ इसे विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों का संभावित उल्लंघन मानते हैं, क्योंकि यह आयातित वस्तुओं पर घरेलू वस्तुओं की तुलना में अलग व्यवहार करता है।
- अक्षमता: कई देशों में कार्बन उत्सर्जन को मापने और रिपोर्ट करने के लिए मजबूत तंत्र की कमी के कारण यह अव्यावहारिक हो सकता है।
भविष्य की राह
यह स्पष्ट है कि ब्रिक्स देशों और पश्चिमी देशों के बीच जलवायु कार्रवाई के तरीकों को लेकर एक गहरा मतभेद है। जबकि विकसित देश तेजी से decarbonization और कड़े नियमों पर जोर दे रहे हैं, ब्रिक्स देश एक अधिक न्यायसंगत और धीरे-धीरे होने वाले संक्रमण की वकालत कर रहे हैं जो उनकी विकास संबंधी जरूरतों को प्राथमिकता देता है। इस टकराव का समाधान वैश्विक सहयोग और संवाद के माध्यम से ही संभव है, जहां सभी पक्षों की चिंताओं को सुना और समझा जाए। दुनिया को यह समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने का मतलब विकासशील देशों को उनके विकास के अधिकार से वंचित करना नहीं हो सकता। एक समावेशी और न्यायसंगत जलवायु नीति ही स्थायी समाधान की कुंजी है।
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स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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