"भारत की कूटनीतिक जगह और कद बहाल करें, ग्लोबल साउथ के भागीदारों के बीच विश्वास का पुनर्निर्माण करें": कांग्रेस ने हाल ही में केंद्र सरकार की विदेश नीति पर तीखा प्रहार करते हुए यह बयान दिया है। यह सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक स्थिति और भविष्य की भूमिका पर एक गंभीर बहस का संकेत है। क्या भारत वाकई अपनी कूटनीतिक चमक खो रहा है, या यह सिर्फ विपक्ष की राजनीतिक बयानबाजी है? आइए इस पूरे मुद्दे की गहराई से पड़ताल करते हैं।
क्या हुआ: कांग्रेस का कूटनीतिक आरोप
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने हाल ही में एक बयान जारी कर मोदी सरकार की विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि भारत की कूटनीतिक जगह और कद में कमी आई है, और उसे 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों का समूह) के अपने पुराने और भरोसेमंद साझेदारों के बीच विश्वास को फिर से बनाने की जरूरत है। यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया तेजी से बदल रही है और भारत वैश्विक मंच पर एक बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा रखता है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार की नीतियां भारत को उसके पारंपरिक सहयोगियों से दूर कर रही हैं और उसकी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि को धूमिल कर रही हैं।
पृष्ठभूमि: ग्लोबल साउथ और भारत का ऐतिहासिक रिश्ता
भारत का 'ग्लोबल साउथ' के साथ एक लंबा और गहरा रिश्ता रहा है। शीत युद्ध के दौरान, भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का नेतृत्व किया, जो दुनिया के उन देशों के लिए एक मंच बना जो न तो अमेरिकी खेमे में शामिल होना चाहते थे और न ही सोवियत संघ के। इस आंदोलन ने भारत को विकासशील दुनिया का एक स्वाभाविक नेता बना दिया। भारत ने हमेशा इन देशों के हितों की बात की है, चाहे वह संयुक्त राष्ट्र में हो, विश्व व्यापार संगठन में हो, या जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों पर।
भारत ने आर्थिक सहयोग, तकनीकी सहायता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से इन देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए हैं। यह रिश्ता केवल सरकारों तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों से लोगों के बीच भी फैला हुआ है। 'ग्लोबल साउथ' के देशों के साथ एकजुटता भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रही है, जिसने उसे वैश्विक मंच पर नैतिक अधिकार और प्रभाव प्रदान किया है।
क्यों ट्रेंडिंग है यह मुद्दा?
यह मुद्दा कई कारणों से आजकल चर्चा में है:
- बदलती वैश्विक व्यवस्था: दुनिया अब एक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहाँ कई शक्तियाँ उभर रही हैं। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन युद्ध और नए भू-राजनीतिक गठबंधनों (जैसे क्वाड) ने भारत के लिए एक जटिल कूटनीतिक परिदृश्य बनाया है।
- भारत की बढ़ती महत्वाकांक्षा: भारत खुद को एक 'विश्व गुरु' और एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में देखता है। ऐसे में उसकी विदेश नीति की हर चाल पर बारीकी से नजर रखी जाती है।
- G20 और BRICS: भारत ने हाल ही में G20 की सफल अध्यक्षता की, जिसमें 'ग्लोबल साउथ' की आवाज को बुलंद करने की बात कही गई। BRICS जैसे मंचों पर भारत की सक्रियता भी इसकी ग्लोबल साउथ नेतृत्व की महत्वाकांक्षा को दर्शाती है। हालांकि, इन मंचों पर भारत के फैसलों की आलोचना भी हुई है।
- घरेलू राजनीति: विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, मौजूदा सरकार की नीतियों को विभिन्न मोर्चों पर घेरने की कोशिश कर रहा है, और विदेश नीति भी इसका एक हिस्सा है।
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कांग्रेस का परिप्रेक्ष्य: प्रतिष्ठा बहाल करने की आवश्यकता
कांग्रेस का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत की विदेश नीति ने कुछ महत्वपूर्ण गलतियाँ की हैं, जिससे उसकी कूटनीतिक साख को नुकसान पहुँचा है।
'खोई हुई प्रतिष्ठा' का तर्क
- एकतरफा झुकाव का आरोप: कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने पश्चिम (विशेषकर अमेरिका) की ओर बहुत अधिक झुकाव दिखाया है, जिससे 'ग्लोबल साउथ' के कई देशों में यह संदेश गया है कि भारत अब गुटनिरपेक्षता के अपने मूल सिद्धांत से भटक गया है।
- संवाद की कमी: विपक्ष का तर्क है कि भारत ने 'ग्लोबल साउथ' के देशों के साथ पहले जैसा नियमित और गहन संवाद बनाए नहीं रखा है। महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर साझा रणनीति बनाने की पहल में कमी आई है।
- विवादित मुद्दों पर चुप्पी: कुछ आलोचक कहते हैं कि भारत ने मानवाधिकारों या लोकतंत्र से जुड़े कुछ वैश्विक मुद्दों पर मुखरता से अपनी बात नहीं रखी, जिससे उसकी नैतिक नेतृत्व की छवि कमजोर हुई है।
ग्लोबल साउथ का विश्वास फिर से बनाना
कांग्रेस के अनुसार, 'ग्लोबल साउथ' के भागीदारों का विश्वास फिर से बनाने के लिए भारत को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:
- स्वतंत्र विदेश नीति पर जोर: किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय, भारत को अपनी स्वतंत्र और स्वायत्त विदेश नीति को फिर से मजबूत करना चाहिए, जो सभी देशों के साथ समान दूरी और सम्मान पर आधारित हो।
- साझा चुनौतियों पर फोकस: जलवायु परिवर्तन, गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ जैसी साझा चुनौतियों पर मिलकर काम करना चाहिए।
- बहुपक्षीय मंचों को मजबूत करना: संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों पर 'ग्लोबल साउथ' की आवाज को और अधिक मजबूती से उठाना चाहिए और इन मंचों में सुधारों के लिए दबाव बनाना चाहिए।
- आर्थिक सहयोग बढ़ाना: विकासशील देशों के साथ व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग को और बढ़ावा देना चाहिए, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
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सरकार का प्रति-कथा: ताकत का दावा
सत्ताधारी भाजपा और सरकार के समर्थक कांग्रेस के आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। उनका तर्क है कि भारत की विदेश नीति अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर है और 'ग्लोबल साउथ' के साथ उसके संबंध पहले से कहीं अधिक मजबूत हुए हैं।
भारत की सक्रिय कूटनीति
- मजबूत द्विपक्षीय संबंध: सरकार का दावा है कि उसने दुनिया के लगभग हर देश के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत किया है, जिसमें 'ग्लोबल साउथ' के देश भी शामिल हैं। प्रधान मंत्री की लगातार यात्राएँ और विभिन्न देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी इसका प्रमाण हैं।
- संतुलित दृष्टिकोण: सरकार का कहना है कि भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर भी एक संतुलित और स्वतंत्र रुख अपनाया है, जो उसके राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता है। यह किसी भी गुट के दबाव में नहीं आया है।
- वैक्सीन मैत्री: कोरोना महामारी के दौरान भारत ने 'वैक्सीन मैत्री' पहल के तहत कई विकासशील देशों को टीके और चिकित्सा सहायता प्रदान की, जिसने उसकी 'फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड' की छवि को और मजबूत किया और 'ग्लोबल साउथ' में विश्वास पैदा किया।
G20 और BRICS: नेतृत्व का प्रदर्शन
सरकार अक्सर G20 की अपनी अध्यक्षता और BRICS के विस्तार को अपनी कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत करती है:
- G20 में 'ग्लोबल साउथ' की आवाज: भारत ने G20 में अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाकर 'ग्लोबल साउथ' की आवाज को एक प्रमुख वैश्विक मंच पर लाने का काम किया।
- BRICS का विस्तार: BRICS समूह में नए सदस्यों को शामिल करने में भारत की भूमिका को विकासशील देशों के बीच उसके बढ़ते प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है।
- जलवायु न्याय: भारत लगातार जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर विकासशील देशों के लिए "जलवायु न्याय" की मांग कर रहा है, और विकसित देशों से अधिक जिम्मेदारी लेने का आह्वान कर रहा है।
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कूटनीतिक संतुलन अधिनियम: चुनौतियाँ और अवसर
सच्चाई अक्सर चरम दावों के बीच कहीं होती है। भारत एक जटिल वैश्विक परिदृश्य में अपनी जगह तलाश रहा है।
एक बहुध्रुवीय दुनिया में नेविगेट करना
भारत को अमेरिका, रूस, चीन और यूरोप जैसी प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करना होगा, जबकि 'ग्लोबल साउथ' के साथ अपने ऐतिहासिक संबंधों को भी बनाए रखना होगा। यह एक सूक्ष्म और चुनौतीपूर्ण कार्य है। वैश्विक भू-राजनीति में लगातार बदलाव आ रहे हैं, और भारत को इन परिवर्तनों के अनुकूल अपनी रणनीति बनानी होगी।
आर्थिक निहितार्थ
भारत की कूटनीतिक स्थिति का उसके आर्थिक हितों पर सीधा असर पड़ता है। 'ग्लोबल साउथ' के साथ मजबूत संबंध भारत के लिए नए व्यापार और निवेश के अवसर खोलते हैं, जबकि प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ अच्छे संबंध प्रौद्योगिकी और पूंजी प्रवाह के लिए महत्वपूर्ण हैं। आर्थिक कूटनीति एक प्रमुख भूमिका निभाती है।
जनमत और भविष्य का दृष्टिकोण
आम भारतीय नागरिक अपनी सरकार को वैश्विक मंच पर मजबूत और प्रभावशाली देखना चाहता है। कांग्रेस का बयान इस बात पर बहस छेड़ता है कि क्या वर्तमान नीतियाँ इस आकांक्षा को पूरा कर रही हैं। भविष्य में भारत को अपनी विदेश नीति में और अधिक लचीलापन और दूरदर्शिता दिखानी होगी। उसे अपनी आर्थिक शक्ति, सॉफ्ट पावर और लोकतांत्रिक मूल्यों का उपयोग करके 'ग्लोबल साउथ' में अपना नेतृत्व फिर से स्थापित करना होगा, जबकि बड़ी शक्तियों के साथ रचनात्मक संबंध बनाए रखने होंगे।
निष्कर्ष
कांग्रेस की यह टिप्पणी भारत की विदेश नीति पर एक महत्वपूर्ण आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता को दर्शाती है। चाहे भारत का कूटनीतिक कद वास्तव में कम हुआ हो या नहीं, 'ग्लोबल साउथ' के साथ विश्वास और संबंधों को मजबूत करना हमेशा भारत के हित में रहा है और रहेगा। एक मजबूत, स्वतंत्र और विश्वसनीय विदेश नीति ही भारत को वैश्विक मंच पर उसकी सही जगह दिला सकती है – एक ऐसी जगह जहाँ वह न केवल अपने हितों की रक्षा करता है, बल्कि विकासशील दुनिया की आवाज भी बनता है। यह समय है कि भारत अपनी कूटनीतिक रणनीतियों का मूल्यांकन करे और सुनिश्चित करे कि वह बदलती दुनिया में भी अपने मूलभूत सिद्धांतों और सहयोगियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को न भूले।
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स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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