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President Murmu's Historic Message: A Call for 'Mental Decolonisation' and Rajaji's Resurgence! - Viral Page (राष्ट्रपति मुर्मू का ऐतिहासिक संदेश: 'मानसिक उपनिवेशवाद' से मुक्ति की हुंकार और राजाजी का पुनरुत्थान! - Viral Page)

राष्ट्रपति ने राजाजी की प्रतिमा का अनावरण किया: 'मानसिक उपनिवेशवाद का उदाहरण प्रस्तुत करें' - यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय विमर्श की शुरुआत है। भारत के सर्वोच्च पद से दिया गया यह संदेश आज हर भारतीय के मन में गूँज रहा है।

हाल ही में, माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देश के पहले भारतीय गवर्नर-जनरल, महान स्वतंत्रता सेनानी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, जिन्हें प्यार से 'राजाजी' कहा जाता है, की प्रतिमा का अनावरण किया। यह अनावरण अपने आप में ऐतिहासिक है, लेकिन जो बात इसे 'वायरल' और 'ट्रेंडिंग' बना रही है, वह है राष्ट्रपति का इसके साथ जुड़ा संदेश: "हमें मानसिक उपनिवेशवाद से खुद को मुक्त करना चाहिए और इसका उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।"

क्या हुआ और क्यों यह इतना महत्वपूर्ण है?

यह घटना नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में हुई, जहां राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राजाजी की जयंती के अवसर पर उनकी प्रतिमा का अनावरण किया। उन्होंने इस अवसर पर कहा कि राजाजी एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने "स्वदेशी और आत्मनिर्भरता" के आदर्शों का जीवन भर पालन किया और देश को "मानसिक उपनिवेशवाद" से मुक्ति दिलाने के लिए प्रेरणास्रोत रहे। यह बयान सिर्फ एक औपचारिक भाषण नहीं था; यह एक सशक्त आह्वान था जो भारत के वर्तमान आत्म-खोज और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साथ गहराई से जुड़ा है।

President Droupadi Murmu unveiling the bust of C. Rajagopalachari at Rashtrapati Bhavan, with dignitaries in the background.

Photo by Sumit Singh on Unsplash

राष्ट्रपति के इस बयान ने कई स्तरों पर बहस छेड़ दी है। एक तरफ, यह उन लोगों के लिए एक पुष्टि है जो लंबे समय से औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों से मुक्ति की वकालत कर रहे हैं। दूसरी ओर, यह एक जटिल विषय पर चर्चा को फिर से खोलता है कि भारत के लिए 'मानसिक उपनिवेशवाद' का क्या अर्थ है और इससे कैसे निपटा जाए।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) कौन थे?

इस संदेश को समझने के लिए, हमें सबसे पहले राजाजी को समझना होगा।

  • पहले भारतीय गवर्नर-जनरल: वह स्वतंत्र भारत के पहले और एकमात्र भारतीय गवर्नर-जनरल थे, जिसने माउंटबेटन के बाद यह पद संभाला।
  • महान स्वतंत्रता सेनानी: महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी, उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन और असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
  • दूरदर्शी नेता: वह एक कुशल प्रशासक, न्यायविद, लेखक और दार्शनिक थे। उन्होंने मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और केंद्रीय गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।
  • भारत रत्न: उन्हें 1954 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया था।
  • स्वतंत्र पार्टी के संस्थापक: नेहरू की समाजवादी नीतियों से असहमत होकर, उन्होंने 1959 में स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की, जो मुक्त बाजार और न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप की वकालत करती थी।

राजाजी को उनकी बौद्धिक क्षमता, नैतिक साहस और सिद्धांतों पर अटल रहने के लिए जाना जाता था। राष्ट्रपति का उन्हें 'मानसिक उपनिवेशवाद' से मुक्ति का प्रतीक बताना इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि उन्होंने ब्रिटिश राज के तहत भी कभी अपनी भारतीयता को कमजोर नहीं पड़ने दिया और स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय मूल्यों और परंपराओं की वकालत की।

'मानसिक उपनिवेशवाद' क्या है और यह क्यों ट्रेंडिंग है?

मानसिक उपनिवेशवाद (Mental Decolonisation) का अर्थ है औपनिवेशिक शासकों द्वारा छोड़ी गई मानसिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक गुलामी से मुक्ति। यह सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सोचने, समझने और स्वयं को परिभाषित करने के तरीकों को भी उपनिवेशवादी चश्मे से हटाना है।

राष्ट्रपति का यह बयान कई कारणों से ट्रेंडिंग है:

  1. उच्चतम पद से समर्थन: जब देश का सर्वोच्च नागरिक इस तरह का आह्वान करता है, तो यह स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन जाता है।
  2. बढ़ती राष्ट्रीय पहचान की भावना: पिछले कुछ समय से भारत अपनी पहचान, संस्कृति और इतिहास को नए सिरे से परिभाषित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। शहरों, सड़कों, इमारतों के नाम बदलना, शिक्षा नीति में सुधार, भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना - ये सभी इस बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
  3. सांस्कृतिक और बौद्धिक पुनरुत्थान: यह बयान उन लोगों को प्रोत्साहित करता है जो भारतीय ज्ञान प्रणालियों, कला रूपों, साहित्य और दर्शन को विश्व मंच पर लाना चाहते हैं, और उन्हें पश्चिमी मॉडल से कमतर नहीं आंकते।
  4. युवाओं में जागरूकता: सोशल मीडिया के युग में, युवा पीढ़ी इन मुद्दों पर अधिक जागरूक हो रही है और अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने व उनसे जुड़ने की इच्छा रखती है। राष्ट्रपति का संदेश उन्हें इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करता है।

A mosaic of diverse Indian faces, young and old, reflecting on cultural identity and looking towards a modern yet rooted future.

Photo by Shail Sharma on Unsplash

यह केवल अतीत को नकारने की बात नहीं है, बल्कि एक ऐसा भविष्य बनाने की बात है जहाँ भारत अपनी शर्तों पर आगे बढ़े, अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और वैश्विक मंच पर अपनी अनूठी पहचान बनाए रखे।

इस आह्वान का संभावित प्रभाव

राष्ट्रपति के इस शक्तिशाली आह्वान के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं:

  • नीतिगत बदलावों को प्रोत्साहन: यह सांस्कृतिक, शैक्षिक और कानूनी नीतियों में और अधिक बदलावों को प्रेरित कर सकता है जो भारत के अपने मूल्यों और प्रणालियों पर आधारित हों।
  • शैक्षणिक सुधार: शिक्षा प्रणाली में भारतीय इतिहास, साहित्य, कला और विज्ञान को अधिक प्रमुखता मिल सकती है, ताकि छात्र अपनी विरासत पर गर्व कर सकें।
  • भाषा और साहित्य को बढ़ावा: भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाने के प्रयासों को बल मिल सकता है।
  • आत्मविश्वास में वृद्धि: यह भारतीयों के आत्मविश्वास को बढ़ा सकता है कि उनके अपने विचार, प्रणालियाँ और जीवन शैली पश्चिमी प्रणालियों के बराबर या उनसे बेहतर हो सकती हैं।
  • सार्वजनिक बहस का विस्तार: यह 'मानसिक उपनिवेशवाद' के विभिन्न पहलुओं पर अधिक विस्तृत और गहन सार्वजनिक बहस को बढ़ावा देगा, जिससे समाज में एक नई चेतना आएगी।

हालांकि, यह एक जटिल प्रक्रिया है और इसमें समय लगेगा। यह रातों-रात होने वाला बदलाव नहीं है, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली एक वैचारिक यात्रा है।

दोनों पक्ष: विमर्श की गहराई

किसी भी बड़े विचार की तरह, 'मानसिक उपनिवेशवाद' से मुक्ति के इस विचार के भी विभिन्न पहलू और दृष्टिकोण हैं, जिन पर विचार करना महत्वपूर्ण है।

समर्थन में तर्क (राष्ट्रपति के दृष्टिकोण के अनुरूप):

  • स्वतंत्रता की पूर्णता: जब तक हम मानसिक रूप से उपनिवेशवाद से मुक्त नहीं होते, तब तक हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है। यह वास्तव में एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में खड़े होने की क्षमता प्रदान करता है।
  • राष्ट्रीय गौरव का पुनर्निर्माण: औपनिवेशिक काल ने हमें अपनी संस्कृति और ज्ञान पर संदेह करना सिखाया। इस मानसिकता से मुक्ति हमें अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व करने और उसे बढ़ावा देने में मदद करती है।
  • भारतीय समाधान: भारत की अपनी समस्याएँ हैं जिनके लिए भारतीय समाधान की आवश्यकता है, न कि पश्चिम से आयातित मॉडल की। यह 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे विचारों को वैचारिक आधार प्रदान करता है।
  • पहचान की पुनर्प्राप्ति: यह हमें अपनी भाषाओं, कलाओं, साहित्य और जीवनशैली को पुनः अपनाकर अपनी मूल पहचान को पुनः प्राप्त करने में मदद करता है।

विचारणीय बिंदु और सूक्ष्मताएँ (Nuances and Counter-arguments):

  • "मानसिक उपनिवेशवाद" की परिभाषा: कुछ आलोचक पूछते हैं कि "मानसिक उपनिवेशवाद" की सटीक परिभाषा क्या है? क्या यह सिर्फ उन पश्चिमी विचारों को अस्वीकार करना है जो भारत की सांस्कृतिक पहचान के खिलाफ हैं, या इसमें अधिक जटिल आयाम हैं?
  • चयन का मुद्दा: क्या हम उपनिवेशवाद से सब कुछ त्याग सकते हैं या त्यागना चाहिए? उदाहरण के लिए, अंग्रेजी भाषा ने भारत को वैश्विक मंच पर एक लाभ दिया है, और ब्रिटिश कानूनी प्रणाली के कई तत्व आज भी हमारे लिए उपयोगी हैं। क्या हमें इन्हें पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए या उन्हें भारतीय संदर्भ में अनुकूलित करना चाहिए?
  • अति-राष्ट्रवाद का खतरा: कुछ लोगों को चिंता है कि 'मानसिक उपनिवेशवाद' से मुक्ति का आह्वान कभी-कभी अति-राष्ट्रवाद या इतिहास के चयनात्मक पुनर्लेखन का रूप ले सकता है, जिससे विविधता और खुलेपन को खतरा हो सकता है।
  • वर्तमान चुनौतियों पर ध्यान: कुछ का तर्क है कि देश के सामने गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अधिक तात्कालिक चुनौतियाँ हैं। क्या 'मानसिक उपनिवेशवाद' पर इतना ध्यान केंद्रित करना संसाधनों और ऊर्जा का भटकाव नहीं है?
  • राजाजी का जटिल व्यक्तित्व: राजाजी स्वयं एक जटिल व्यक्ति थे। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर 'स्वतंत्र पार्टी' बनाई थी, जिसकी विचारधारा कुछ हद तक पश्चिमी उदारवादी आर्थिक सिद्धांतों से प्रभावित थी। क्या उनका उदाहरण पूरी तरह से 'मानसिक उपनिवेशवाद' से मुक्ति का प्रतिनिधित्व करता है या इसमें और भी परतें हैं?

यह दर्शाता है कि यह विषय सरल नहीं है और इस पर एक स्वस्थ और खुली बहस आवश्यक है। राष्ट्रपति का आह्वान इस बहस को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है, जहां सभी दृष्टिकोणों को सुना जाए और एक संतुलित मार्ग खोजा जाए।

निष्कर्ष: एक नई दिशा की ओर

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा राजाजी की प्रतिमा का अनावरण और 'मानसिक उपनिवेशवाद' से मुक्ति का आह्वान सिर्फ एक घटना नहीं है, बल्कि भारत के लगातार विकसित हो रहे राष्ट्रवाद और आत्म-पहचान की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि हम कौन हैं, हम कहाँ से आए हैं, और हम कहाँ जाना चाहते हैं। यह एक सशक्त संदेश है कि भारत अब केवल पश्चिम की नकल करने वाला देश नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से प्रेरणा लेकर अपने भविष्य को गढ़ने वाला एक आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी राष्ट्र है।

यह यात्रा चुनौतीपूर्ण हो सकती है, लेकिन यह एक ऐसे भारत के निर्माण के लिए आवश्यक है जो वास्तव में स्वतंत्र, संप्रभु और अपनी अनूठी पहचान पर गर्व करने वाला हो। राजाजी जैसे दूरदर्शी नेताओं के आदर्श हमें इस मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहेंगे।

हमें इस विमर्श में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए, अपनी राय देनी चाहिए और एक ऐसे भविष्य का निर्माण करना चाहिए जहाँ हम मानसिक रूप से पूरी तरह स्वतंत्र हों।

यह खबर आपको कैसी लगी? इस पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं!

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स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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