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Bihar Rajya Sabha Polls: NDA's Dream of Hitting a 'Four', But Why Were AIMIM and BSP the 'Kingmakers' for the 5th Seat? - Viral Page (बिहार राज्यसभा चुनाव: NDA का 'चौका' लगाने का सपना, लेकिन 5वीं सीट पर AIMIM और BSP क्यों थे 'किंगमेकर'? - Viral Page)

HINDI_TITLE: बिहार राज्यसभा चुनाव: NDA का 'चौका' लगाने का सपना, लेकिन 5वीं सीट पर AIMIM और BSP क्यों थे 'किंगमेकर'? ENGLISH_TITLE: Bihar Rajya Sabha Polls: NDA's Dream of Hitting a 'Four', But Why Were AIMIM and BSP the 'Kingmakers' for the 5th Seat? META_DESC: बिहार राज्यसभा चुनाव में NDA का 4 सीटों पर दावा, लेकिन 5वीं सीट पर AIMIM और BSP की अहम भूमिका का विश्लेषण। जानें संख्या बल, राजनीतिक दांवपेंच और क्यों यह मुकाबला रोमांचक था।

बिहार राज्यसभा चुनाव: NDA को 4 सीटें मिलने की उम्मीद, लेकिन 5वीं सीट पर AIMIM और BSP की भूमिका अहम – जानिए क्यों?

क्या है पूरा मामला?

देश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव हमेशा से ही बेहद दिलचस्प रहे हैं। खासकर तब, जब संख्या बल का गणित इतना उलझा हुआ हो कि छोटे से छोटे दल भी 'किंगमेकर' की भूमिका में आ जाएं। बिहार में हुए हालिया राज्यसभा चुनावों में भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला था। सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने चार सीटें जीतने का दावा किया, लेकिन सबकी निगाहें पांचवीं सीट पर टिकी थीं। यह वो सीट थी, जहां असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और मायावती की BSP के पास महज एक-एक विधायक होने के बावजूद, उनकी भूमिका बेहद अहम हो गई थी। क्यों? आइए जानते हैं इस पूरे सियासी ड्रामे की परतें खोलते हुए कि यह चुनाव क्यों इतना trending था और इसके पीछे क्या गणित काम कर रहा था।

बिहार में कुल पांच राज्यसभा सीटें खाली हुई थीं, जिनके लिए चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई। जहां एक ओर NDA गठबंधन अपने संख्या बल के आधार पर अपनी जीत सुनिश्चित करने की कोशिश में था, वहीं INDIA गठबंधन भी अपनी पूरी ताकत झोंकने को तैयार था। इसी बीच, AIMIM और BSP के एक-एक विधायक के वोट ने समीकरणों को और भी पेचीदा बना दिया था। हर कोई यह जानने को बेताब था कि क्या NDA वास्तव में चार सीटें जीत पाएगा और अगर हाँ, तो पांचवीं सीट का फैसला कैसे होगा?

A detailed close-up shot of a ballot paper being marked in a Rajya Sabha election, with hands visible.

Photo by أخٌ‌في‌الله on Unsplash

राज्यसभा चुनाव का गणित: कैसे होता है मतदान?

लोकसभा और विधानसभा चुनावों से अलग, राज्यसभा चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं चुने जाते। बल्कि, इन्हें राज्य विधानसभा के सदस्य (MLA) चुनते हैं। यह चुनाव 'आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली' के तहत 'एकल संक्रमणीय मत' (Single Transferable Vote) पद्धति से होता है। इसका मतलब है कि एक विधायक एक ही उम्मीदवार को वोट नहीं देता, बल्कि अपनी पसंद के क्रम में कई उम्मीदवारों को वरीयता देता है।

एक सीट जीतने के लिए कितने वोटों की जरूरत होती है, इसका एक निश्चित गणित होता है। इसे 'जीत का कोटा' कहा जाता है। इसका फॉर्मूला है:

जीत का कोटा = (कुल विधायकों की संख्या / (कुल राज्यसभा सीटों की संख्या + 1)) + 1

बिहार विधानसभा में कुल 243 विधायक हैं और पांच राज्यसभा सीटों पर चुनाव होना था। इस हिसाब से, जीत का कोटा होगा:

(243 / (5 + 1)) + 1 = (243 / 6) + 1 = 40.5 + 1 = 41.5

इसका मतलब है कि एक उम्मीदवार को राज्यसभा सीट जीतने के लिए कम से कम 42 विधायकों के मतों की आवश्यकता होती है। यह संख्या हर दल के लिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इसी आधार पर वे अपनी रणनीति तैयार करते हैं।

बिहार विधानसभा में सीटों का गणित (फरवरी 2024 के अनुसार अनुमानित)

किसी भी चुनाव का आधार संख्या बल होता है। बिहार विधानसभा में विभिन्न दलों की स्थिति कुछ इस प्रकार थी:

  • राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA):
    • भारतीय जनता पार्टी (BJP): ~78 विधायक
    • जनता दल (यूनाइटेड) (JDU): ~45 विधायक
    • हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM): 4 विधायक
    • अन्य (निर्दलीय/RLJP): ~1 विधायक
    • NDA का कुल संख्या बल: ~128 विधायक
  • INDIA गठबंधन:
    • राष्ट्रीय जनता दल (RJD): ~79 विधायक
    • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress): ~19 विधायक
    • वाम दल (CPIML(L), CPI(M), CPI): ~16 विधायक
    • INDIA गठबंधन का कुल संख्या बल: ~114 विधायक
  • अन्य:
    • ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM): 1 विधायक
    • बहुजन समाज पार्टी (BSP): 1 विधायक
    • निर्दलीय: ~1 विधायक
    • कुल अन्य: ~3 विधायक

इस गणित को देखते हुए, NDA और INDIA गठबंधन दोनों के लिए ही राज्यसभा सीटों को जीतना एक चुनौती भरा काम था, खासकर तब, जब उन्हें अपनी क्षमता से अधिक सीटें निकालने की कोशिश करनी हो।

NDA की रणनीति और 4 सीटों का महत्वाकांक्षी लक्ष्य

संख्या बल के हिसाब से NDA गठबंधन (लगभग 128 विधायक) आसानी से 3 राज्यसभा सीटें जीत सकता था (3 x 42 = 126 वोट)। इसके बाद उनके पास 2 वोटों का अधिशेष (Surplus) बचता। लेकिन, "NDA को 4 सीटें मिलने की उम्मीद" का दावा बताता है कि गठबंधन ने न सिर्फ अपनी 3 सीटों को सुरक्षित माना था, बल्कि चौथी सीट पर भी जीत दर्ज करने की महत्वाकांक्षी रणनीति बनाई थी।

चौथी सीट जीतने के लिए NDA को कुल 4 x 42 = 168 वोटों की जरूरत पड़ती। उनके पास अपने 128 वोट थे, जिसका मतलब था कि उन्हें 40 अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता थी। यह अतिरिक्त वोट कहाँ से आते? इसके लिए कई संभावनाएं थीं:

  1. क्रॉस-वोटिंग (Cross-voting): विरोधी खेमे के विधायकों द्वारा अपनी पार्टी लाइन से हटकर मतदान करना।
  2. दूसरे वरीयता के वोट: अपने पहले उम्मीदवार के कोटा पूरे होने के बाद बचे हुए वोटों को दूसरे वरीयता के तौर पर चौथे उम्मीदवार को ट्रांसफर करना।
  3. छोटे दलों का समर्थन: AIMIM, BSP और निर्दलीय जैसे छोटे दलों के वोटों को अपने पाले में लाना।
  4. रणनीतिक दबाव और अंदरूनी खींचतान: INDIA गठबंधन के भीतर किसी असंतुष्ट गुट को तोड़ना या उनका समर्थन हासिल करना।

यह दिखाता है कि NDA का 4 सीटों का लक्ष्य केवल संख्या बल पर आधारित नहीं था, बल्कि गहन राजनीतिक दांवपेंच और जोड़-तोड़ की रणनीति पर भी निर्भर करता था।

A photo of Bihar Chief Minister Nitish Kumar and BJP leaders in a discussion, looking confident.

Photo by Bruhad S on Unsplash

INDIA गठबंधन की चुनौती और 5वीं सीट का दांव

दूसरी ओर, INDIA गठबंधन (लगभग 114 विधायक) आसानी से 2 राज्यसभा सीटें जीत सकता था (2 x 42 = 84 वोट)। उनके पास इसके बाद 30 वोटों का अधिशेष बचता। अगर NDA वाकई 4 सीटें जीतने में कामयाब होता, तो INDIA गठबंधन के लिए केवल 1 सीट ही बचती। ऐसे में, NDA के चौथी सीट के दावे ने INDIA गठबंधन पर भी दबाव बढ़ा दिया था कि वे अपनी दूसरी सीट को सुरक्षित करें या अगर संभव हो तो तीसरी सीट पर भी दांव खेलें।

NDA की महत्वाकांक्षा के कारण, यह मुकाबला 3 NDA बनाम 2 INDIA जैसा सीधा नहीं रहा था। अगर NDA 4 सीटें जीतने की कोशिश करता, तो यह INDIA गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाती। उनके पास जो 30 अधिशेष वोट थे, वे काफी महत्वपूर्ण थे, लेकिन 42 के कोटे तक पहुँचने के लिए उन्हें अभी भी 12 अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता थी। यहीं पर छोटे दलों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती।

5वीं सीट का किंगमेकर: AIMIM और BSP क्यों थे अहम?

अब आते हैं उस मुख्य बिंदु पर, जिसने इस पूरे चुनाव को रोमांचक बना दिया था – AIMIM और BSP की 'किंगमेकर' की भूमिका।

AIMIM के पास 1 विधायक और BSP के पास 1 विधायक, यानी कुल 2 विधायक थे। देखने में यह संख्या बहुत छोटी लग सकती है, लेकिन एक ऐसे चुनाव में जहाँ जीत का अंतर एक-दो वोटों का भी हो सकता है, ये 2 वोट निर्णायक बन जाते हैं।

अगर NDA 3 सीटें जीतने के बाद चौथी सीट पर दांव खेल रहा था, और INDIA गठबंधन अपनी दूसरी सीट सुरक्षित करने या तीसरी सीट पर पहुंचने की कोशिश कर रहा था, तो इन दोनों के बीच के अंतर को पाटने में AIMIM और BSP के वोट महत्वपूर्ण हो जाते।

कल्पना कीजिए कि अगर किसी उम्मीदवार को जीतने के लिए 42 वोटों की आवश्यकता है, और उसके पास 40 वोट हैं, तो ये 2 वोट उसे जीत दिला सकते हैं। यही वो स्थिति थी जहाँ AIMIM और BSP के विधायक दोनों ही प्रमुख गठबंधनों के लिए अनमोल बन गए थे।

छोटे दलों की राजनीति: मोलभाव का मौका

छोटे दलों के लिए ऐसे चुनाव अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने और मोलभाव करने का बेहतरीन मौका होते हैं। उनके एक-एक वोट की कीमत बढ़ जाती है। वे बदले में क्या मांगते हैं? यह कई बातों पर निर्भर करता है:

  • भविष्य की राजनीतिक डील्स: आगामी लोकसभा या विधानसभा चुनावों में सीटों का बंटवारा या गठबंधन का आश्वासन।
  • विकास कार्य: अपने क्षेत्र के लिए विशेष विकास परियोजनाओं की मांग।
  • मंत्रिपद या बोर्ड/निगम में पद: अपने या अपने समर्थकों के लिए राजनीतिक नियुक्तियाँ।
  • विचारधारात्मक समर्थन: कभी-कभी दल अपनी विचारधारा के करीब के गठबंधन को समर्थन देते हैं, खासकर जब उन्हें कोई बड़ा राजनीतिक लाभ न दिख रहा हो।

AIMIM और BSP दोनों ही दल अपने-अपने वोट बैंक और विचारधारा के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में, उन्हें अपने पक्ष में लाना किसी भी गठबंधन के लिए आसान नहीं होता, लेकिन उनके वोटों के बिना जीत भी मुश्किल हो सकती थी। यही वजह थी कि ये दोनों दल इस चुनाव में केंद्र बिंदु बन गए थे।

क्या हो सकता था परिणाम?

इस तरह के करीबी मुकाबलों में कई परिणाम संभव होते हैं:

  1. समझौता और निर्विरोध चुनाव: अक्सर, राजनीतिक दल आपसी सहमति से उम्मीदवारों की संख्या उतनी ही रखते हैं, जितनी सीटें हैं, ताकि चुनाव को निर्विरोध किया जा सके और विधायकों की खरीद-फरोख्त या क्रॉस-वोटिंग की नौबत न आए। बिहार में, NDA ने 3 और RJD ने 2 उम्मीदवार उतारे, और सभी 5 निर्विरोध चुने गए। यह दिखाता है कि राजनीतिक दलों ने संभावित कश्मकश से बचने के लिए अंतिम समय में सहमति बना ली थी, लेकिन हेडलाइन में जिस "कश्मकश" की बात की गई, वह इन नंबरों और छोटे दलों की भूमिका से ही पैदा हुई थी।
  2. कड़ा मुकाबला: यदि दलों ने सहमति नहीं बनाई होती, तो पांचवीं सीट पर NDA के चौथे उम्मीदवार और INDIA गठबंधन के तीसरे उम्मीदवार के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता था। ऐसे में, AIMIM और BSP के वोट निर्णायक होते।
  3. क्रॉस-वोटिंग: यह भी संभव था कि कुछ विधायक अपनी पार्टी लाइन तोड़कर दूसरे उम्मीदवार को वोट देते, जिससे समीकरण और भी उलझ जाते।

यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ वोटों का खेल नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिष्ठा, आने वाले चुनावों की रणनीति और गठबंधन धर्म की अग्निपरीक्षा भी था।

क्यों बनी हुई थी इस चुनाव पर सबकी नज़र?

यह चुनाव सिर्फ राज्यसभा की पांच सीटों तक सीमित नहीं था। इसके कई बड़े मायने थे:

  • लोकसभा चुनाव से पहले शक्ति परीक्षण: यह 2024 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले बिहार में NDA और INDIA गठबंधन की ताकत और एकजुटता का एक महत्वपूर्ण परीक्षण था।
  • गठबंधन की एकजुटता: यह देखने का मौका था कि क्या दोनों गठबंधन अपने विधायकों को एकजुट रख पाते हैं और क्रॉस-वोटिंग को रोक पाते हैं।
  • छोटे दलों का बढ़ता महत्व: यह एक बार फिर साबित हुआ कि भारतीय राजनीति में छोटे दल और निर्दलीय विधायक अक्सर 'किंगमेकर' की भूमिका में आ जाते हैं, खासकर जब संख्या बल बहुत करीबी हो।
  • नेतृत्व की परीक्षा: यह दोनों गठबंधनों के शीर्ष नेताओं के लिए अपनी राजनीतिक सूझबूझ और रणनीति का प्रदर्शन करने का अवसर था।

भविष्य की राजनीति पर असर

इस चुनाव के दौरान जो राजनीतिक दांवपेंच चले, उनका असर भविष्य की बिहार और राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ता। छोटे दलों के साथ हुए समझौते, अगर कोई होते, तो वे भविष्य के गठबंधनों की नींव रख सकते थे। किसी भी दल के भीतर हुई क्रॉस-वोटिंग या असंतोष से पार्टी अनुशासन पर सवाल उठ सकते थे और आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता था।

यह चुनाव एक बार फिर इस बात पर मुहर लगाता है कि भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हर वोट की अपनी कीमत होती है, और कई बार, कम संख्या वाले दल भी बड़े राजनीतिक उलटफेरों का कारण बन सकते हैं। यह दर्शाता है कि राजनीति में 'नंबर्स गेम' सिर्फ बड़े दलों तक सीमित नहीं होता, बल्कि हर छोटी इकाई की अपनी अहमियत होती है।

हमें उम्मीद है कि "Viral Page" पर आपको यह विश्लेषण पसंद आया होगा और बिहार राज्यसभा चुनाव के पीछे की पूरी कहानी समझ आई होगी।

इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि छोटे दलों की भूमिका और बढ़ेगी? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में साझा करें। इस जानकारीपूर्ण लेख को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करना न भूलें, और ऐसी ही और वायरल स्टोरीज के लिए Viral Page को फॉलो करें!

स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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