‘World of chokepoints’: Countries weaponising finance, resources, says Jaishankar
हमारे विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने हाल ही में वैश्विक मंच पर एक ऐसी चेतावनी दी है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। उन्होंने कहा है कि आज की दुनिया ‘चौकपॉइंट’ (chokepoints) की दुनिया बन गई है, जहां देश वित्त (finance) और संसाधनों (resources) को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य की एक कड़वी सच्चाई है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। लेकिन, आखिर ये 'चौकपॉइंट' क्या हैं और वित्त व संसाधनों का हथियार के तौर पर इस्तेमाल कैसे हो रहा है?
क्या हुआ? जयशंकर ने दुनिया को क्या बताया?
डॉ. जयशंकर ने अपनी टिप्पणी में रेखांकित किया कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में अब सिर्फ सैन्य शक्ति ही निर्णायक कारक नहीं रह गई है। बल्कि, आर्थिक और संसाधन आधारित शक्ति का इस्तेमाल करके दूसरे देशों पर दबाव बनाने या उन्हें मजबूर करने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्र, चाहे वे भौगोलिक हों, वित्तीय हों या तकनीकी, जहां से वैश्विक व्यापार, संचार या ऊर्जा का प्रवाह होता है, अब 'चौकपॉइंट' बन गए हैं। जिस देश का इन चौकपॉइंट्स पर नियंत्रण होता है, वह उनका उपयोग अपनी भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को साधने के लिए कर सकता है।
'चौकपॉइंट' का अर्थ क्या है?
सरल शब्दों में, 'चौकपॉइंट' ऐसे संकरे या महत्वपूर्ण बिंदु होते हैं, जहां से किसी भी चीज़ का बड़ा प्रवाह होता है और जिसे नियंत्रित करके पूरे प्रवाह को रोका या प्रभावित किया जा सकता है।
- भौगोलिक चौकपॉइंट: जैसे स्वेज नहर, होर्मुज जलडमरूमध्य, मलक्का जलडमरूमध्य। ये ऐसे समुद्री रास्ते हैं, जहां से दुनिया का एक बड़ा व्यापार और तेल परिवहन होता है। अगर कोई देश इन पर नियंत्रण कर ले या इन्हें बाधित कर दे, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल सकती है।
- वित्तीय चौकपॉइंट: वैश्विक बैंकिंग प्रणाली (जैसे SWIFT), डॉलर का प्रभुत्व, अंतर्राष्ट्रीय ऋण देने वाली संस्थाएं। इन पर नियंत्रण रखने वाले देश किसी भी दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकते हैं।
- संसाधन चौकपॉइंट: तेल, गैस, दुर्लभ पृथ्वी धातुएं (rare earth minerals), यहां तक कि भोजन और पानी भी। इन आवश्यक संसाधनों की आपूर्ति को नियंत्रित करके किसी भी देश को घुटनों पर लाया जा सकता है।
जयशंकर की बात का सार यह है कि अब ये चौकपॉइंट्स शांतिपूर्ण व्यापार और सहयोग के माध्यम नहीं रहे, बल्कि भू-राजनीतिक संघर्षों में शक्तिशाली हथियार बन गए हैं।
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पृष्ठभूमि: क्यों बढ़ रहा है यह चलन?
यह चलन रातों-रात नहीं बढ़ा है। इसके पीछे कई दशकों के भू-राजनीतिक परिवर्तन और आर्थिक उथल-पुथल है:
- बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा: शीत युद्ध के बाद दुनिया में एकध्रुवीय या बहुध्रुवीय व्यवस्था को लेकर बहस चल रही है। बड़ी शक्तियां अपना प्रभाव बढ़ाने और प्रतिद्वंद्वी देशों को कमजोर करने के लिए हर संभव रणनीति अपना रही हैं।
- सैन्य संघर्षों से बचना: सीधे सैन्य संघर्षों में भारी जान-माल का नुकसान होता है। ऐसे में, आर्थिक और वित्तीय हथियारों का इस्तेमाल 'कम-तीव्रता वाले युद्ध' के रूप में किया जा रहा है, जहां दुश्मन को बिना गोली चलाए भी चोट पहुंचाई जा सकती है।
- वैश्वीकरण का उलटा पहलू: वैश्वीकरण ने देशों को आपस में जोड़ा, लेकिन इसने उनकी कमजोरियों को भी उजागर किया। एक देश की दूसरे पर निर्भरता अब एक हथियार बन गई है।
- महामारियां और जलवायु परिवर्तन: कोविड-19 महामारी और जलवायु परिवर्तन ने आपूर्ति श्रृंखलाओं की नाजुकता को उजागर किया है। इससे देशों को अपने संसाधनों और आपूर्ति मार्गों को सुरक्षित करने की प्रेरणा मिली है, जिससे कभी-कभी 'राष्ट्रवाद' का रुख बढ़ जाता है।
उदाहरण: जब वित्त और संसाधन बने हथियार
- वित्तीय हथियार:
- SWIFT प्रतिबंध: रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद, रूस को वैश्विक बैंकिंग प्रणाली SWIFT से बाहर कर दिया गया, जिससे उसकी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन करने की क्षमता पर गंभीर असर पड़ा।
- अमेरिकी डॉलर का प्रभुत्व: अमेरिकी डॉलर वैश्विक व्यापार और वित्तीय लेनदेन में इतना हावी है कि अमेरिका अक्सर इसका उपयोग प्रतिबंध लगाने के लिए करता है, जिससे गैर-अमेरिकी कंपनियों को भी अमेरिकी नियमों का पालन करना पड़ता है।
- ऋण जाल (Debt Trap): कुछ देशों पर आरोप लगते हैं कि वे छोटे देशों को भारी कर्ज देकर उन्हें अपने प्रभाव में ले लेते हैं, जिससे उनके संसाधनों या रणनीतिक ठिकानों पर नियंत्रण पाया जा सके।
- संसाधन हथियार:
- ऊर्जा आपूर्ति: रूस ने यूरोप को गैस की आपूर्ति को एक भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है, जिससे यूरोप में ऊर्जा संकट पैदा हो गया।
- दुर्लभ पृथ्वी धातुएं: चीन का दुर्लभ पृथ्वी धातुओं पर लगभग एकाधिकार है, जो आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। चीन ने अतीत में इसका उपयोग व्यापार विवादों में leverage (दबाव) के रूप में किया है।
- खाद्य सुरक्षा: कुछ देश अनाज या अन्य खाद्य पदार्थों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर वैश्विक खाद्य कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं, खासकर संकट के समय।
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क्यों Trending है यह मुद्दा?
जयशंकर का यह बयान आज के समय में अत्यधिक प्रासंगिक और 'ट्रेंडिंग' है क्योंकि:
- तत्काल प्रभाव: यूक्रेन युद्ध, वैश्विक ऊर्जा संकट, बढ़ती महंगाई और आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान ने आम आदमी को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। हर कोई इन मुद्दों के मूल कारणों को समझना चाहता है।
- वैश्विक अस्थिरता: यह अवधारणा दुनिया भर में बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता की व्याख्या करती है। देशों के बीच अविश्वास बढ़ रहा है और सहयोग की भावना कम हो रही है।
- भारत के लिए प्रासंगिकता: भारत एक बड़ी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था है, खासकर तेल और कुछ महत्वपूर्ण खनिजों के लिए। जयशंकर का बयान भारत की कमजोरियों और चुनौतियों को भी उजागर करता है।
- भविष्य की चिंता: अगर यह प्रवृत्ति जारी रही, तो यह दुनिया को एक खंडित और संघर्षपूर्ण भविष्य की ओर धकेल सकती है, जहां व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय कानून कमजोर पड़ जाएंगे।
प्रभाव: भारत और वैश्विक व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
जयशंकर की यह चेतावनी दूरगामी प्रभावों वाली है:
भारत पर प्रभाव:
भारत के लिए यह स्थिति एक दोधारी तलवार है। एक तरफ, भारत को अपनी आयात निर्भरता कम करने और आत्मनिर्भरता बढ़ाने की जरूरत है। दूसरी तरफ, भारत एक जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी के रूप में नियमों पर आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थक रहा है।
- आत्मनिर्भर भारत की आवश्यकता: यह 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को और भी महत्वपूर्ण बना देता है, खासकर रक्षा, ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में।
- आपूर्ति श्रृंखला का विविधीकरण: भारत को अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को विविध बनाना होगा, ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता न रहे।
- रणनीतिक स्वायत्तता: भारत को अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की जरूरत है, ताकि वह किसी भी गुट का हिस्सा न बने और अपने हितों की रक्षा कर सके।
- भू-आर्थिक शक्ति का विकास: भारत को अपनी आर्थिक शक्ति का लाभ उठाना होगा और खुद को एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और वैश्विक 'चौकपॉइंट' के रूप में स्थापित करना होगा, लेकिन सकारात्मक तरीके से।
वैश्विक व्यवस्था पर प्रभाव:
- अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का क्षरण: वित्त और संसाधनों का हथियार के तौर पर इस्तेमाल अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और संस्थाओं को कमजोर करता है, जिससे अराजकता बढ़ सकती है।
- ट्रेड वॉर और संरक्षणवाद: देशों के बीच व्यापार युद्ध और संरक्षणवाद बढ़ सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था का एकीकरण बाधित होगा।
- छोटे और विकासशील देश: ये देश सबसे अधिक प्रभावित होंगे क्योंकि उनके पास बड़े देशों के दबाव का सामना करने के लिए पर्याप्त संसाधन या राजनीतिक शक्ति नहीं होगी।
- बढ़ता अविश्वास: देशों के बीच अविश्वास बढ़ेगा, जिससे संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग करना और भी मुश्किल हो जाएगा।
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दोनों पक्ष: क्यों देश ऐसा करते हैं और क्यों यह चिंताजनक है?
देश ऐसा क्यों करते हैं? (उनकी तरफ से तर्क)
कई देशों का मानना है कि वित्त और संसाधनों का हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है या यह उनकी विदेश नीति का एक वैध उपकरण है:
- प्रतिरोध और दंड: कुछ देश इसे अपने विरोधियों को गलत व्यवहार से रोकने या उनके कार्यों के लिए दंडित करने के एक तरीके के रूप में देखते हैं (जैसे आतंकवाद, मानवाधिकार उल्लंघन)।
- राष्ट्रीय हित की रक्षा: उनका मानना है कि यह उनके दीर्घकालिक आर्थिक या रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी है।
- सैन्य संघर्ष का विकल्प: जैसा कि पहले बताया गया, यह सीधे सैन्य टकराव से बचने का एक तरीका है, जो अधिक महंगा और विनाशकारी हो सकता है।
- शक्ति का प्रदर्शन: यह अन्य देशों को अपनी शक्ति और प्रभाव दिखाने का भी एक तरीका है।
यह चिंताजनक क्यों है? (इसके नकारात्मक परिणाम)
इसके बावजूद, वित्त और संसाधनों का हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना वैश्विक शांति और समृद्धि के लिए अत्यधिक चिंताजनक है:
- मासूम लोगों पर प्रभाव: प्रतिबंध और आपूर्ति में व्यवधान अक्सर आम नागरिकों को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं, जिससे मानवीय संकट पैदा होते हैं।
- वैश्विक अस्थिरता: यह देशों के बीच अविश्वास और शत्रुता को बढ़ाता है, जिससे संघर्षों का जोखिम बढ़ता है।
- आर्थिक दक्षता में कमी: यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करता है, व्यापार को कम करता है और आर्थिक दक्षता को कम करता है, जिससे अंततः सभी को नुकसान होता है।
- नैतिक प्रश्न: आवश्यक संसाधनों (जैसे भोजन या दवा) को हथियार बनाना नैतिक रूप से गलत है और अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों का उल्लंघन करता है।
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निष्कर्ष: आगे का रास्ता
जयशंकर की यह चेतावनी हमें एक नई वैश्विक वास्तविकता से परिचित कराती है। 'चौकपॉइंट्स' की दुनिया में भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने, आर्थिक लचीलापन विकसित करने और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर नियमों पर आधारित व्यवस्था की वकालत करते रहने की आवश्यकता है। यह समय है कि देश एकजुट होकर इन प्रवृत्तियों का मुकाबला करें और एक ऐसी वैश्विक प्रणाली की दिशा में काम करें जहां सहयोग, प्रतिस्पर्धा पर हावी हो, न कि हथियार बनी वित्त और संसाधन। अन्यथा, यह 'चौकपॉइंट' की दुनिया हमें गहरे संकट में धकेल सकती है।
आपको क्या लगता है, इस 'चौकपॉइंट' की दुनिया में भारत को अपनी क्या रणनीति अपनानी चाहिए? नीचे कमेंट करके बताएं और इस महत्वपूर्ण जानकारी को दूसरों के साथ शेयर करें। ऐसी ही और वायरल और गहरी खबरों के लिए Viral Page को फॉलो करना न भूलें!
स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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