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Sisterhood in the profession is very important… to ensure access doesn’t end with individual achievement: Justice Nagarathna - Viral Page (Sisterhood in the profession is very important… to ensure access doesn’t end with individual achievement: Justice Nagarathna - Viral Page)

** "Sisterhood in the profession is very important… to ensure access doesn’t end with individual achievement: Justice Nagarathna"

न्यायमूर्ति नागरथना का यह महत्वपूर्ण आह्वान क्या है?

भारत की न्यायपालिका के एक प्रतिष्ठित नाम, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथना, ने हाल ही में एक ऐसी बात कही है जो न केवल कानूनी बिरादरी में, बल्कि हर पेशेवर महिला के बीच गूंज रही है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि "पेशावर दुनिया में महिला-बंधुत्व (सिस्टरहुड) बहुत महत्वपूर्ण है... ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पहुँच व्यक्तिगत उपलब्धि के साथ समाप्त न हो।" यह महज एक एक सामान्य बयान नहीं, बल्कि एक गहरी सोच और एक आवश्यक बदलाव की दिशा में उठाया गया कदम है, जिसका उद्देश्य महिलाओं के लिए पेशेवर परिदृश्य को अधिक समावेशी और सहायक बनाना है। यह बयान तब आया जब वे महिलाओं के लिए पेशेवर दुनिया में समानता, प्रतिनिधित्व और अवसरों को लेकर चर्चा कर रही थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल कुछ महिलाओं का उच्च पदों तक पहुँचना पर्याप्त नहीं है; बल्कि यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि उनकी सफलता भविष्य की पीढ़ियों के लिए दरवाजे खोलती रहे, न कि उन्हें बंद कर दे।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथना कौन हैं?

न्यायमूर्ति नागरथना सुप्रीम कोर्ट की वर्तमान न्यायाधीश हैं और उनके वर्ष 2027 में भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने की संभावना है। उनका अपना करियर भी एक मिसाल है, और ऐसे पद पर रहते हुए उनका यह बयान महिलाओं के लिए मार्गदर्शन और समर्थन की आवश्यकता को रेखांकित करता है। उनका मानना है कि जब एक महिला सफल होती है, तो यह केवल उसकी निजी जीत नहीं होती, बल्कि यह पूरे समुदाय की जीत होनी चाहिए, खासकर तब जब वह दूसरों के लिए मार्ग प्रशस्त करे।

पृष्ठभूमि: क्यों 'सिस्टरहुड' की बात आज भी प्रासंगिक है?

पेशेवर दुनिया में महिलाओं का प्रवेश और उनकी उन्नति हमेशा से चुनौतियों से भरी रही है। 'ग्लास सीलिंग' (कांच की छत) से लेकर लैंगिक पूर्वाग्रह (gender bias) तक, महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कई अतिरिक्त बाधाओं का सामना करना पड़ता है। न्यायपालिका जैसे पारंपरिक रूप से पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में यह और भी अधिक स्पष्ट है। ऐतिहासिक रूप से, कानून और न्याय के क्षेत्र में पुरुषों का वर्चस्व रहा है। महिलाओं ने इस क्षेत्र में जगह बनाने के लिए लंबा संघर्ष किया है। पहली महिला वकील, पहली महिला न्यायाधीश - इन सभी ने अपने-अपने समय में भारी प्रतिरोध का सामना किया। आज भी, उच्चतम न्यायालय में कुल न्यायाधीशों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है, और यह संख्या उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों में थोड़ी बेहतर होते हुए भी, समान प्रतिनिधित्व से कोसों दूर है। जब कुछ गिनी-चुनी महिलाएं इन चुनौतियों को पार कर उच्च पदों पर पहुँचती हैं, तो यह स्वाभाविक है कि वे खुद को "अपवाद" मान सकती हैं। लेकिन न्यायमूर्ति नागरथना का बयान इस मानसिकता को चुनौती देता है। वे कहती हैं कि व्यक्तिगत सफलता सिर्फ एक पड़ाव है, मंजिल नहीं। असली मंजिल तब हासिल होती है जब उस सफलता का उपयोग दूसरों के लिए रास्ते बनाने के लिए किया जाए, खासकर उन युवा महिलाओं के लिए जो अभी भी संघर्ष कर रही हैं।
भारतीय सुप्रीम कोर्ट की इमारत के सामने एक युवा महिला वकील अपने दस्तावेजों के साथ खड़ी है, जो दृढ़ संकल्प दिखा रही है।

Photo by Dibakar Roy on Unsplash

यह बयान क्यों चर्चा में है और इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

न्यायमूर्ति नागरथना का यह बयान कई कारणों से चर्चा में है और इसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी पहले कभी नहीं थी:
  • व्यक्तिगत बनाम सामूहिक सफलता: यह बयान इस आम धारणा को चुनौती देता है कि महिलाओं को अपनी दम पर ही ऊपर उठना चाहिए। यह व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा के बजाय सामूहिक उत्थान और सहयोग के महत्व पर जोर देता है।
  • मेंटरशिप और समर्थन: 'सिस्टरहुड' का अर्थ है अनुभव साझा करना, मार्गदर्शन करना और एक-दूसरे को प्रेरित करना। यह युवा पेशेवरों को उन मुश्किलों से निपटने में मदद करता है जिनका सामना वरिष्ठों ने किया है।
  • अवसरों का विस्तार: जब सफल महिलाएं नई प्रतिभाओं की पहचान करती हैं और उन्हें अवसर प्रदान करती हैं, तो यह सिर्फ उन व्यक्तियों को ही नहीं, बल्कि पूरे समुदाय को सशक्त बनाता है।
  • सकारात्मक कार्य संस्कृति: एक ऐसी कार्य संस्कृति का निर्माण जहाँ महिलाएं एक-दूसरे का समर्थन करती हैं, वह लैंगिक पूर्वाग्रह को कम करने और एक स्वस्थ, समावेशी वातावरण बनाने में मदद करता है।
यह बयान इस बात पर प्रकाश डालता है कि महिलाओं को न केवल अपनी सीटों के लिए लड़ना चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके पीछे आने वालों के लिए भी जगह हो। यह एक ऐसी मानसिकता को बढ़ावा देता है जहाँ एक-दूसरे को गिराने की बजाय, महिलाएं एक-दूसरे को ऊपर उठाने का काम करती हैं।

'सिस्टरहुड' का क्या प्रभाव हो सकता है?

न्यायमूर्ति नागरथना के आह्वान को यदि व्यापक रूप से अपनाया जाए, तो इसके दूरगामी और सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं:

कार्यस्थल में सकारात्मक परिवर्तन

  1. बढ़ी हुई प्रतिनिधित्व: जब महिलाएं एक-दूसरे का समर्थन करती हैं और अवसरों का मार्ग प्रशस्त करती हैं, तो विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।
  2. बेहतर मेंटरशिप कार्यक्रम: वरिष्ठ महिलाएँ युवा महिला पेशेवरों के लिए औपचारिक और अनौपचारिक मेंटर बन सकती हैं, उन्हें करियर सलाह, नेटवर्क के अवसर और भावनात्मक समर्थन प्रदान कर सकती हैं।
  3. महिलाओं के अनुकूल नीतियां: 'सिस्टरहुड' की भावना से प्रेरित होकर, महिलाएं कार्यस्थलों पर ऐसी नीतियों की वकालत कर सकती हैं जो मातृत्व अवकाश, लचीले काम के घंटे और लैंगिक समानता को बढ़ावा देती हैं।
  4. आत्मविश्वास में वृद्धि: यह जानकर कि उनके पास एक सहायक नेटवर्क है, महिलाएं अधिक आत्मविश्वास के साथ चुनौतियों का सामना कर सकती हैं और जोखिम उठा सकती हैं।
एक कॉन्फ्रेंस रूम में तीन महिलाएं एक साथ हंसती हुई और बातचीत करती हुई, एक दूसरे का सहयोग करती हुई दिख रही हैं।

Photo by Dibakar Roy on Unsplash

सामाजिक प्रभाव

'सिस्टरहुड' का प्रभाव केवल कार्यस्थल तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह समाज में भी सकारात्मक बदलाव ला सकता है। यह युवा लड़कियों को बड़े सपने देखने और यह विश्वास रखने के लिए प्रेरित कर सकता है कि उनके पास एक सहायक समुदाय होगा। यह लैंगिक समानता के लिए व्यापक लड़ाई को मजबूत करता है और पितृसत्तात्मक मानदंडों को चुनौती देता है।

तथ्य और आंकड़े: न्यायपालिका में महिलाओं की स्थिति

न्यायमूर्ति नागरथना का बयान विशेष रूप से कानूनी पेशे के संदर्भ में बहुत महत्व रखता है। भारत में न्यायपालिका में महिलाओं की स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं है:
  • उच्चतम न्यायालय: आज तक, उच्चतम न्यायालय में कुल 34 न्यायाधीशों में से केवल 3 महिला न्यायाधीश हैं (न्यायमूर्ति नागरथना सहित)। इतिहास में अब तक केवल 11 महिला न्यायाधीश ही सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच पाई हैं।
  • उच्च न्यायालय: उच्च न्यायालयों में भी महिला न्यायाधीशों का प्रतिशत कम है, जो कुल न्यायाधीशों का लगभग 11-12% है।
  • जिला अदालतें: निचली अदालतों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व थोड़ा बेहतर है, लेकिन फिर भी पुरुषों के मुकाबले काफी कम है।
  • बार काउंसिल: विभिन्न बार काउंसिलों में भी महिला सदस्यों और पदाधिकारियों की संख्या बहुत कम है, जो यह दर्शाता है कि शीर्ष स्तर के नेतृत्व में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सीमित है।
ये आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि न्यायपालिका में लैंगिक संतुलन हासिल करने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है। 'सिस्टरहुड' की अवधारणा इस खाई को पाटने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

दोनों पहलू: क्या 'सिस्टरहुड' हमेशा सकारात्मक होता है?

जबकि 'सिस्टरहुड' का विचार बेहद सकारात्मक और आवश्यक प्रतीत होता है, इसके कुछ संभावित पहलू भी हैं जिन पर विचार किया जा सकता है:

सकारात्मक पहलू

मजबूत समर्थन प्रणाली: जैसा कि चर्चा की गई है, यह महिलाओं के लिए एक मजबूत समर्थन प्रणाली बनाता है, जो उन्हें पेशेवर और व्यक्तिगत चुनौतियों का सामना करने में मदद करता है। प्रेरणा और सशक्तिकरण: एक-दूसरे की सफलता से प्रेरित होकर, महिलाएं अपनी क्षमताओं पर अधिक विश्वास करती हैं और बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित होती हैं। पहुँच का विस्तार: यह सुनिश्चित करता है कि उच्च पदों पर बैठी महिलाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए दरवाजे खुले रखें।

संभावित चुनौतियाँ या आलोचनाएँ

  1. योग्यता पर सवाल: कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि 'सिस्टरहुड' योग्यता-आधारित चयन को कमजोर कर सकता है, यदि इसका उपयोग पक्षपातपूर्ण तरीके से किया जाए। हालांकि, न्यायमूर्ति नागरथना का उद्देश्य योग्यता को दरकिनार करना नहीं, बल्कि योग्य महिलाओं को समान अवसर सुनिश्चित करना है।
  2. समूहवाद का जोखिम: यदि 'सिस्टरहुड' की अवधारणा संकीर्ण रूप से परिभाषित की जाती है, तो यह अनजाने में कुछ समूहों को बाहर कर सकती है, खासकर यदि इसमें विविधता की कमी हो।
  3. पुरुषों की भूमिका की उपेक्षा: लैंगिक समानता केवल महिलाओं का काम नहीं है। पुरुषों को भी इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल होना होगा और महिलाओं का समर्थन करना होगा। 'सिस्टरहुड' पर अत्यधिक जोर देने से पुरुषों की भूमिका गौण हो सकती है, जबकि उन्हें भी सहयोगी बनना महत्वपूर्ण है।
हालांकि, ये चुनौतियाँ 'सिस्टरहुड' के मूल विचार को कम नहीं करतीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के महत्व को रेखांकित करती हैं कि इसे समावेशी और न्यायसंगत तरीके से लागू किया जाए। इसका उद्देश्य किसी को बाहर करना नहीं, बल्कि उन लोगों को अंदर लाना है जिन्हें ऐतिहासिक रूप से बाहर रखा गया है।

निष्कर्ष: एक सामूहिक प्रयास की आवश्यकता

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरथना का बयान केवल कानूनी पेशे के लिए नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए एक वेक-अप कॉल है। यह हमें याद दिलाता है कि व्यक्तिगत सफलता बेशक महत्वपूर्ण है, लेकिन असली शक्ति तब है जब हम एक-दूसरे के हाथ पकड़कर आगे बढ़ते हैं। 'सिस्टरहुड' का अर्थ सिर्फ सहानुभूति या भावनात्मक समर्थन नहीं है, बल्कि यह सक्रिय रूप से अवसरों का निर्माण करना, बाधाओं को दूर करना और यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी महिला का रास्ता केवल इसलिए अवरुद्ध न हो क्योंकि वह एक महिला है। यह एक ऐसा समय है जब महिलाओं को एक-दूसरे की सबसे बड़ी समर्थक बनने की आवश्यकता है। आइए हम सभी न्यायमूर्ति नागरथना के इस आह्वान को गंभीरता से लें और अपनी-अपनी पेशेवर दुनिया में 'सिस्टरहुड' की शक्ति को अपनाएं, ताकि पहुँच केवल व्यक्तिगत उपलब्धि के साथ समाप्त न हो, बल्कि वह अनगिनत नई संभावनाओं के द्वार खोलती रहे। कमेंट करके बताएं कि आप इस 'सिस्टरहुड' के विचार के बारे में क्या सोचते हैं! इस महत्वपूर्ण संदेश को अपने दोस्तों और सहकर्मियों के साथ शेयर करें। और ऐसे ही और दिलचस्प लेखों के लिए 'Viral Page' को फॉलो करना न भूलें!

स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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