In Cuttack’s silver filigree hub, soaring prices and import curbs push artisans to the brink.
ओडिशा के कटक शहर की पहचान सिर्फ उसके ऐतिहासिक महत्व से नहीं, बल्कि उसकी अनमोल कला 'चांदी की तारकशी' (Silver Filigree) से भी है। सदियों से चली आ रही यह कला, जिसमें चांदी के महीन तारों को जोड़कर जटिल और मनमोहक आकृतियां बनाई जाती हैं, अब एक गंभीर संकट का सामना कर रही है। चांदी की आसमान छूती कीमतें और आयात प्रतिबंधों की दोहरी मार ने इस कला से जुड़े हजारों कारीगरों को आजीविका के लिए संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया है, और उन्हें शाब्दिक अर्थों में बर्बादी के कगार पर धकेल दिया है।
चांदी की तारकशी: कटक का गौरव और उसकी पहचान
कटक की तारकशी कला सिर्फ एक हस्तशिल्प नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। यह शहर के डीएनए में रच-बस गई है, और इसकी गलियों में आज भी चांदी के तारों को आकार देते कारीगरों की धुन सुनी जा सकती है।
एक सदियों पुरानी कला
चांदी की तारकशी, जिसे स्थानीय रूप से 'तारकसी' के नाम से जाना जाता है, 12वीं शताब्दी से कटक में फली-फूली है। कहा जाता है कि इसका उद्गम इंडोनेशिया और फ़ारसी देशों से हुआ, और यह व्यापारियों के माध्यम से ओडिशा पहुंची। जल्द ही, कटक इस कला का एक प्रमुख केंद्र बन गया। इसकी विशेषता है चांदी के बेहद पतले तारों को सावधानीपूर्वक मोड़कर, बुनकर और जोड़कर जटिल डिजाइन बनाना। दुर्गा पूजा के लिए बनाए जाने वाले चांदी के भव्य मुकुट और आभूषण, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं, और विभिन्न प्रकार के घरेलू सजावट के सामान तारकशी के अद्भुत उदाहरण हैं। इसके अलावा, झुमके, हार, कंगन जैसी दैनिक उपयोग की वस्तुएं भी अपनी बारीकी और खूबसूरती के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। यह कला सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना चुकी है और कई वैश्विक प्रदर्शनियों में कटक का प्रतिनिधित्व कर चुकी है।
कारीगरों की पीढ़ियाँ
कटक में तारकशी का काम सैकड़ों परिवारों के लिए आजीविका का मुख्य स्रोत है। ये कारीगर सिर्फ कामगार नहीं, बल्कि इस कला के सच्चे संरक्षक हैं। उन्होंने यह हुनर अपने पूर्वजों से सीखा है, और इसे अपनी आने वाली पीढ़ियों को सौंपने की जिम्मेदारी महसूस करते हैं। सुबह से शाम तक, वे अपने छोटे-छोटे कार्यशालाओं में बैठकर, आँखों पर जोर देते हुए और हाथों की अदभुत निपुणता से चांदी को नया जीवन देते हैं। यह सिर्फ एक व्यापार नहीं, बल्कि एक पारिवारिक विरासत और सम्मान का प्रतीक है। अक्सर, एक ही परिवार की कई पीढ़ियाँ इस कला में महारत हासिल करती हैं, जहाँ पिता अपने बेटों और पोतों को चांदी को मोड़ने और आकार देने की बारीकियां सिखाते हैं। इनकी विशेषज्ञता इतनी गहरी होती है कि वे बिना किसी खाके के, केवल अपनी कल्पना और अनुभव के आधार पर अविश्वसनीय रूप से जटिल पैटर्न बना सकते हैं।
संकट के बादल: क्यों मंडरा रहा है यह खतरा?
सदियों से जिस कला ने इतने उतार-चढ़ाव देखे हैं, वह आज एक ऐसे दोहरे संकट का सामना कर रही है जिसने उसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।
आसमान छूती चांदी की कीमतें
पिछले कुछ वर्षों में, चांदी की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। वैश्विक बाजार में धातुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अस्थिरता ने चांदी को एक महंगा कच्चा माल बना दिया है। कटक के कारीगरों के लिए, जो अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा चांदी खरीदने में लगाते हैं, यह एक बड़ा झटका है। एक अनुमान के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में चांदी की कीमतों में लगभग 30-40% की बढ़ोतरी हुई है। इसका सीधा असर उनके उत्पादन लागत पर पड़ा है। वे बढ़ी हुई लागत को पूरी तरह से ग्राहकों पर नहीं डाल सकते, क्योंकि इससे उत्पादों की मांग कम हो सकती है। नतीजतन, उनका लाभ मार्जिन सिकुड़ गया है, और कई कारीगरों के लिए लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है। कई छोटे कारीगरों के पास कच्चा माल खरीदने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं बची है, जिससे उनके काम ठप पड़ रहे हैं।
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आयात प्रतिबंधों की दोहरी मार
चांदी की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ, सरकार द्वारा लगाए गए आयात प्रतिबंधों ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। सरकार का उद्देश्य घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना और व्यापार घाटे को कम करना हो सकता है, लेकिन इसका अप्रत्यक्ष रूप से चांदी की तारकशी जैसे विशिष्ट उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कटक के कारीगर अक्सर उच्च गुणवत्ता वाली चांदी के लिए आयात पर निर्भर रहते हैं। प्रतिबंधों के कारण, उन्हें घरेलू बाजार में उपलब्ध चांदी पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसकी आपूर्ति सीमित हो सकती है या गुणवत्ता में भिन्नता हो सकती है। इसके अलावा, आयातित चांदी की उपलब्धता में कमी और उच्च शुल्क के कारण, बाजार में चांदी की कीमतें और भी बढ़ गई हैं, जिससे कारीगरों पर दोहरी मार पड़ रही है। उन्हें न केवल महंगी चांदी खरीदनी पड़ रही है, बल्कि कभी-कभी उन्हें अपनी जरूरत के अनुसार शुद्धता और प्रकार की चांदी मिल भी नहीं पाती है।
कारीगरों पर सीधा प्रभाव: आजीविका और कला का भविष्य
इन आर्थिक चुनौतियों का सबसे सीधा और विनाशकारी प्रभाव उन कारीगरों पर पड़ रहा है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन इस कला को समर्पित कर दिया है।
घटती आय और बढ़ता कर्ज
बढ़ती लागत और घटते लाभ मार्जिन के कारण, कारीगरों की दैनिक आय में भारी गिरावट आई है। एक कारीगर जो पहले एक महीने में लगभग 15,000-20,000 रुपये कमा लेता था, अब मुश्किल से 8,000-10,000 रुपये कमा पा रहा है। यह राशि आज की महंगाई में परिवार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। कई कारीगरों को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थानीय साहूकारों से कर्ज लेना पड़ रहा है, जिससे वे कर्ज के दुष्चक्र में फंसते जा रहे हैं। बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और घर के अन्य खर्चों का बोझ उन्हें लगातार दबा रहा है। कुछ कारीगरों को तो अपनी कला से जुड़े उपकरण या पुश्तैनी सामान बेचकर गुजर-बसर करनी पड़ रही है, जो उनके लिए बेहद भावनात्मक क्षति है।
युवा पीढ़ी का मोहभंग
जब एक कला आजीविका प्रदान करने में विफल हो जाती है, तो युवा पीढ़ी उससे दूर होने लगती है। कटक में भी यही हो रहा है। युवा पीढ़ी, जो पहले खुशी-खुशी अपने माता-पिता से तारकशी का हुनर सीखती थी, अब बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है। उन्हें लगता है कि इस पारंपरिक कला में कोई भविष्य नहीं है और वे इसमें अपना समय और ऊर्जा बर्बाद नहीं करना चाहते। वे कॉल सेंटर, डिलीवरी सेवाओं या अन्य छोटे-मोटे व्यवसायों में नौकरी करना पसंद कर रहे हैं, जहाँ कम से कम एक स्थिर आय की गारंटी है। यह न केवल कारीगर परिवारों के लिए एक सामाजिक समस्या है, बल्कि यह तारकशी कला के भविष्य के लिए भी एक गंभीर खतरा है, क्योंकि यदि युवा इस कला को नहीं सीखेंगे, तो यह धीरे-धीरे लुप्त हो जाएगी।
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कला का अस्तित्व खतरे में
यदि कारीगर अपनी आजीविका चलाने में असमर्थ रहते हैं और युवा पीढ़ी इस कला को अपनाने से मना कर देती है, तो कटक की यह सदियों पुरानी विरासत हमेशा के लिए खो सकती है। यह सिर्फ कारीगरों के लिए आर्थिक क्षति नहीं होगी, बल्कि भारतीय संस्कृति और कला जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति होगी। एक ऐसी कला जो अपनी बारीकियों और भव्यता के लिए विश्व प्रसिद्ध है, वह केवल इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी। इसके साथ ही, कटक की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी धूमिल हो जाएगा।
समाधान की तलाश: क्या कोई उम्मीद की किरण है?
इस गंभीर संकट से बाहर निकलने के लिए सरकार, कारीगरों और समाज को मिलकर प्रयास करने होंगे।
सरकारी हस्तक्षेप और नीतियाँ
सरकार इस स्थिति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सबसे पहले, चांदी की खरीद पर सब्सिडी प्रदान करके या रियायती दरों पर चांदी उपलब्ध कराकर कारीगरों को राहत दी जा सकती है। आयात प्रतिबंधों पर पुनर्विचार किया जा सकता है, विशेष रूप से हस्तशिल्प उद्योग के लिए कुछ छूट प्रदान की जा सकती है, ताकि उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। इसके अलावा, सरकार को तारकशी उत्पादों के लिए विपणन और प्रचार में निवेश करना चाहिए, उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बढ़ावा देना चाहिए। कारीगरों को कौशल विकास प्रशिक्षण, आधुनिक डिजाइन इनपुट और सीधे ग्राहक तक पहुंचने के लिए ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जुड़ने में मदद करने के लिए विशेष योजनाएं शुरू की जा सकती हैं। वित्तीय सहायता और आसान ऋण तक पहुंच प्रदान करना भी कारीगरों को कर्ज के जाल से बाहर निकालने में सहायक होगा।
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उपभोक्ताओं की भूमिका और जागरूकता
हम, उपभोक्ता भी इस कला को बचाने में अपनी भूमिका निभा सकते हैं। कटक की तारकशी जैसे अद्वितीय हस्तशिल्पों के महत्व को समझना और स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए गए उत्पादों को खरीदना महत्वपूर्ण है। यह न केवल कारीगरों की मदद करेगा, बल्कि एक अनमोल कला को भी जीवित रखेगा। सोशल मीडिया और वर्ड-ऑफ-माउथ के माध्यम से इस कला के बारे में जागरूकता फैलाना, इसकी कहानियों को साझा करना भी इसे पुनर्जीवित करने में मदद कर सकता है। त्योहारों और विशेष अवसरों पर इन हस्तनिर्मित वस्तुओं को उपहार में देना भी एक अच्छा तरीका है।
कारीगरों का एकजुट प्रयास
कारीगरों को भी एकजुट होकर काम करना होगा। सहकारी समितियां बनाना, जिससे वे थोक में चांदी खरीद सकें और अपनी सौदेबाजी की शक्ति बढ़ा सकें, एक प्रभावी कदम हो सकता है। नए डिजाइन और उत्पादों का विकास करना जो समकालीन बाजार की जरूरतों को पूरा करते हों, भी आवश्यक है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना और सीधे ग्राहकों से जुड़ना बिचौलियों को खत्म करके उन्हें बेहतर मुनाफा कमाने में मदद कर सकता है।
आगे का रास्ता
कटक की चांदी की तारकशी सिर्फ एक व्यापार नहीं, बल्कि ओडिशा की आत्मा का एक हिस्सा है। यह एक सांस्कृतिक विरासत है जिसे हमें हर हाल में बचाना होगा। यह संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि चांदी की चमक और कारीगरों की कला कभी फीकी न पड़े। सरकार, कारीगरों, उपभोक्ताओं और विभिन्न संगठनों के संयुक्त प्रयासों से ही हम इस अनमोल कला को बचा सकते हैं और इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित कर सकते हैं। यह समय है जब हमें एकजुट होकर कटक के चांदी के सपनों को बचाने के लिए आगे आना चाहिए।
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स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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