हाल ही में, माननीय सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश ने एक बेहद महत्वपूर्ण और चिंताजनक बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि "राज्य द्वारा बनाए गए आर्थिक नियम संपादकीय स्वतंत्रता पर गहरा प्रभाव डालते हैं।" इतना ही नहीं, उन्होंने इसे 'अप्रत्यक्ष सेंसरशिप' का रूप बताते हुए इसके गंभीर परिणामों की चेतावनी भी दी। यह बयान न केवल मीडिया जगत बल्कि हर उस नागरिक के लिए सोचने पर मजबूर करता है जो एक स्वतंत्र और निष्पक्ष लोकतंत्र में विश्वास रखता है। आखिर क्या है यह मुद्दा, इसके पीछे की पृष्ठभूमि क्या है और भारतीय लोकतंत्र पर इसका क्या असर हो सकता है?
क्या हुआ? सुप्रीम कोर्ट जज की यह चेतावनी क्यों अहम है?
यह बयान किसी साधारण व्यक्ति का नहीं, बल्कि देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के एक सम्मानित सदस्य का है। उन्होंने इशारा किया है कि सरकारें सीधे तौर पर मीडिया को सेंसर न करें, लेकिन ऐसे आर्थिक नियम और नीतियां बना सकती हैं, जिनका अप्रत्यक्ष रूप से मीडिया घरानों की वित्तीय स्थिति पर असर पड़ता है। जब मीडिया घराने आर्थिक दबाव में आते हैं, तो उनकी संपादकीय स्वतंत्रता, यानी बिना किसी दबाव या भय के खबरें प्रकाशित करने या विचार व्यक्त करने की क्षमता, कमजोर पड़ जाती है। यह एक ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जहां मीडिया को अपनी व्यावसायिक जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार के प्रति नरम रुख अपनाना पड़े।
न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि मीडिया की स्वतंत्रता केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सरकार की नीतियों और कार्यों पर सवाल उठाने की क्षमता भी शामिल है। अगर आर्थिक नियमों के कारण यह क्षमता प्रभावित होती है, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
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पृष्ठभूमि: भारत में मीडिया और सरकारी संबंध
भारत में मीडिया को 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ' कहा जाता है। इसका काम सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करना है, जनता को जागरूक करना और सरकार को जवाबदेह ठहराना है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) सभी नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी निहित है।
हालांकि, मीडिया और सरकार का संबंध हमेशा से जटिल रहा है। आजादी के बाद से ही, विभिन्न सरकारों ने मीडिया को नियंत्रित करने के अलग-अलग तरीके अपनाए हैं। आपातकाल के दौरान तो सीधी सेंसरशिप देखने को मिली थी, लेकिन अब तरीके बदल गए हैं। आधुनिक युग में, नियंत्रण अक्सर सूक्ष्म और अप्रत्यक्ष होता है।
- वित्तीय निर्भरता: कई छोटे और मध्यम आकार के मीडिया घराने सरकारी विज्ञापनों पर बहुत अधिक निर्भर करते हैं। सरकार सबसे बड़े विज्ञापनदाताओं में से एक है।
- लाइसेंसिंग और नियामक ढाँचा: ब्रॉडकास्टिंग और डिजिटल मीडिया के लिए सरकार द्वारा निर्धारित लाइसेंसिंग और नियामक नियम होते हैं।
- सरकारी नीतियां: कराधान नीतियां, विदेशी निवेश नियम (FDI), और अन्य आर्थिक नीतियां मीडिया कंपनियों के संचालन को प्रभावित करती हैं।
इन सभी कारकों का इस्तेमाल, चाहे जानबूझकर या अनजाने में, मीडिया पर दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।
क्यों ट्रेंडिंग है यह मुद्दा?
यह मुद्दा आजकल कई कारणों से चर्चा में है:
- बढ़ता वित्तीय दबाव: डिजिटल क्रांति ने मीडिया के राजस्व मॉडल को बदल दिया है। प्रिंट और टीवी चैनलों के विज्ञापन राजस्व में कमी आई है। महामारी ने इस संकट को और गहरा दिया है। ऐसे में, मीडिया घराने आर्थिक रूप से अधिक कमजोर हो गए हैं।
- 'गोदी मीडिया' का आरोप: पिछले कुछ समय से, देश में 'गोदी मीडिया' शब्द काफी प्रचलित हुआ है। यह उन मीडिया आउटलेट्स को संदर्भित करता है जिन पर सरकार का पक्ष लेने और आलोचनात्मक रिपोर्टिंग से बचने का आरोप लगाया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के जज का बयान इस आरोप को एक न्यायिक परिप्रेक्ष्य देता है।
- वैश्विक चिंताएँ: प्रेस स्वतंत्रता के सूचकांकों में भारत की रैंकिंग में गिरावट आई है, जिससे वैश्विक स्तर पर चिंताएं बढ़ रही हैं।
- डिजिटल मीडिया पर नियंत्रण: सरकार द्वारा डिजिटल मीडिया को विनियमित करने के लिए लाए गए नए नियम (जैसे IT नियम, 2021) भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संभावित अंकुश लगाने की बहस को हवा देते हैं।
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प्रभाव: लोकतंत्र और नागरिक पर क्या असर?
यदि अप्रत्यक्ष सेंसरशिप प्रभावी होती है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे:
1. मीडिया की विश्वसनीयता का ह्रास
- जब जनता को लगता है कि मीडिया स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग नहीं कर रहा है, तो उनका भरोसा खत्म हो जाता है।
- बिना भरोसे के मीडिया, लोकतंत्र में अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा सकता।
2. जनमत का ध्रुवीकरण
- यदि मीडिया केवल एक पक्षीय खबरें दिखाता है, तो यह जनता के बीच ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है।
- विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों की कमी से एक स्वस्थ सार्वजनिक बहस संभव नहीं हो पाती।
3. सरकार की जवाबदेही में कमी
- एक स्वतंत्र मीडिया सरकार को उसके कामों के लिए जवाबदेह ठहराता है।
- यदि मीडिया डर या आर्थिक दबाव के कारण आलोचनात्मक रिपोर्टिंग बंद कर देता है, तो सरकार पर कोई लगाम नहीं रहती और मनमानी बढ़ सकती है।
4. नागरिकों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन
- नागरिकों को सही और निष्पक्ष जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है ताकि वे सूचित निर्णय ले सकें।
- अप्रत्यक्ष सेंसरशिप इस अधिकार का हनन करती है, जिससे नागरिक गुमराह हो सकते हैं।
5. खोजी पत्रकारिता पर चोट
- बड़े घोटाले और भ्रष्टाचार अक्सर खोजी पत्रकारिता के माध्यम से ही उजागर होते हैं।
- आर्थिक दबाव में मीडिया ऐसे जोखिम भरे और महंगे प्रोजेक्ट्स से बचने की कोशिश करेगा, जिससे पारदर्शिता प्रभावित होगी।
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तथ्य और दोनों पक्ष: एक संतुलित दृष्टिकोण
न्यायाधीश और आलोचकों का दृष्टिकोण:
न्यायाधीश का बयान इस बात पर केंद्रित है कि सरकारें, आर्थिक लीवरों का उपयोग करके, मीडिया को नियंत्रित कर सकती हैं। ये लीवर्स हो सकते हैं:
- विज्ञापन रोकना या बढ़ाना: सरकारें अपनी पसंद के मीडिया को अधिक विज्ञापन दे सकती हैं और आलोचना करने वालों को वंचित कर सकती हैं।
- सरकारी नीतियों का उपयोग: कर जांच, लाइसेंस नवीनीकरण में देरी, या अन्य नियामक कार्रवाइयाँ उन मीडिया घरानों को निशाना बना सकती हैं जो सरकार के खिलाफ रिपोर्टिंग करते हैं।
- वित्तीय सहायता का विनियमन: कुछ देशों में मीडिया को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वित्तीय सहायता दी जाती है, जिसका विनियमन भी दबाव का एक जरिया बन सकता है।
यह अप्रत्यक्ष नियंत्रण प्रत्यक्ष सेंसरशिप से भी अधिक खतरनाक हो सकता है क्योंकि यह अधिक सूक्ष्म होता है और इसे पहचानना मुश्किल होता है। यह मीडिया के भीतर 'स्व-सेंसरशिप' को बढ़ावा देता है, जहाँ पत्रकार और संपादक बाहरी दबाव के बिना ही खुद को नियंत्रित करने लगते हैं।
राज्य का संभावित दृष्टिकोण:
दूसरी ओर, राज्य यह तर्क दे सकता है कि उसके आर्थिक नियम किसी भी प्रकार की सेंसरशिप के इरादे से नहीं बनाए जाते। उनका उद्देश्य हो सकता है:
- बाजार का विनियमन: मीडिया क्षेत्र में एकाधिकार को रोकना और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना।
- वित्तीय अनुशासन: कंपनियों पर वित्तीय अनुशासन लागू करना, चाहे वे किसी भी क्षेत्र की हों।
- राजस्व जुटाना: सरकार को देश चलाने के लिए कर और शुल्क की आवश्यकता होती है।
- नैतिकता और मानक: ब्रॉडकास्टिंग मानकों को बनाए रखना या फेक न्यूज को रोकना।
सरकार यह भी कह सकती है कि मीडिया को अपनी आय के स्रोत में विविधता लानी चाहिए और केवल सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। हालांकि, आलोचकों का मानना है कि इन वैध उद्देश्यों की आड़ में भी, अप्रत्यक्ष नियंत्रण का रास्ता खुल सकता है।
निष्कर्ष: आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की यह चेतावनी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक वेक-अप कॉल है। एक जीवंत और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक स्वतंत्र, निडर और निष्पक्ष मीडिया का होना अत्यंत आवश्यक है। हमें इस बात पर विचार करना होगा कि हम कैसे मीडिया की वित्तीय स्थिरता को मजबूत कर सकते हैं, ताकि वह बाहरी दबावों के प्रति कम संवेदनशील हो।
मीडिया घरानों को भी अपनी संपादकीय स्वतंत्रता को हर कीमत पर बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए, भले ही उन्हें आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़े। नागरिकों के रूप में, हमें मीडिया द्वारा प्रस्तुत जानकारी के प्रति अधिक आलोचनात्मक होना चाहिए और विभिन्न स्रोतों से जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
अप्रत्यक्ष सेंसरशिप एक धीमी जहर की तरह है, जो धीरे-धीरे लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करती है। इस पर समय रहते ध्यान देना और इसके खिलाफ आवाज उठाना ही हमारे लोकतंत्र को मजबूत बनाएगा।
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स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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