NGT has space for experts, most of them now are former Govt officers – यह शीर्षक अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। क्या वाकई राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal - NGT) में पर्यावरण के सच्चे और विशिष्ट विशेषज्ञ कम पड़ गए हैं, या फिर पूर्व सरकारी अधिकारियों का यह बढ़ता दबदबा किसी गहरी कहानी की ओर इशारा कर रहा है? 'वायरल पेज' पर आज हम इसी ज्वलंत मुद्दे की तह तक जाएंगे और समझेंगे कि आखिर क्यों यह बात अब चर्चा का विषय बन गई है, और इसका हमारे पर्यावरण और न्याय प्रणाली पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
क्या हुआ और यह खबर क्यों मायने रखती है?
हालिया समय में यह बात सामने आई है कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में नियुक्त किए जा रहे विशेषज्ञ सदस्यों में से अधिकांश ऐसे व्यक्ति हैं जो पहले सरकार के विभिन्न विभागों में अधिकारी रह चुके हैं। यानी, वे आईएएस, आईएफएस या अन्य प्रशासनिक सेवाओं से रिटायर हुए अधिकारी हैं। बेशक, इन अधिकारियों के पास व्यापक प्रशासनिक अनुभव होता है, लेकिन NGT जैसे विशिष्ट निकाय में, जहां पर्यावरण विज्ञान और पारिस्थितिकी की गहरी समझ की आवश्यकता होती है, वहां उनकी विशेषज्ञता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह कोई अचानक हुई घटना नहीं, बल्कि एक पैटर्न है जो समय के साथ मजबूत होता जा रहा है और अब इस पर खुलेआम बहस छिड़ गई है।
यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि NGT एक ऐसा मंच है जो पर्यावरण संबंधी विवादों को तेजी से निपटाने और पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके फैसलों का सीधा असर उद्योगों, विकास परियोजनाओं और आम जनता के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ता है। ऐसे में, यदि इसके 'विशेषज्ञ' सदस्यों की विशेषज्ञता पर ही प्रश्नचिह्न लगे, तो NGT की विश्वसनीयता और उसके फैसलों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठते हैं।
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NGT: पृष्ठभूमि और इसका महत्व
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) क्या है?
NGT की स्थापना भारत सरकार द्वारा 18 अक्टूबर, 2010 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, वनों के संरक्षण और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित मामलों का प्रभावी और त्वरित निपटान करना है। यह पर्यावरण संबंधी किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन और व्यक्तियों या संपत्ति को हुए नुकसान के लिए राहत एवं मुआवजा प्रदान करने में सक्षम है। भारत, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बाद, दुनिया का तीसरा देश था जिसने एक विशेष पर्यावरण ट्रिब्यूनल की स्थापना की थी।
क्यों महत्वपूर्ण है NGT?
- त्वरित न्याय: पारंपरिक अदालतों में पर्यावरण संबंधी मामले अक्सर सालों तक लटके रहते थे। NGT को इन मामलों को 6 महीने के भीतर निपटाने का लक्ष्य दिया गया है।
- विशेषज्ञता: NGT को न्यायिक सदस्यों के साथ-साथ ऐसे विशेषज्ञ सदस्यों की भी आवश्यकता होती है जिनके पास पर्यावरण विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नीतियों का गहरा ज्ञान हो। यह विशेषता इसे अन्य अदालतों से अलग बनाती है।
- पर्यावरण संरक्षण: प्रदूषण नियंत्रण, वनों की कटाई, अवैध खनन और जैव विविधता के नुकसान जैसे गंभीर पर्यावरणीय खतरों से निपटने में NGT एक प्रहरी की भूमिका निभाता है।
विशेषज्ञ सदस्यों की भूमिका और क्यों वे महत्वपूर्ण हैं
NGT की संरचना में दो प्रकार के सदस्य होते हैं: न्यायिक सदस्य (जो उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश रहे होते हैं) और विशेषज्ञ सदस्य। विशेषज्ञ सदस्यों का काम पर्यावरणीय मामलों के वैज्ञानिक और तकनीकी पहलुओं पर अपनी राय और विश्लेषण प्रदान करना है। उदाहरण के लिए, यदि किसी उद्योग से निकलने वाले प्रदूषण के प्रभावों का आकलन करना हो, या किसी विकास परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव रिपोर्ट (EIA) की समीक्षा करनी हो, तो इसमें विशेषज्ञ सदस्यों की भूमिका निर्णायक होती है।
उनके पास पर्यावरण विज्ञान, इंजीनियरिंग, पारिस्थितिकी, जैव विविधता, जल विज्ञान, भूविज्ञान या अन्य संबंधित क्षेत्रों में उच्च योग्यता और कम से कम 15 वर्षों का व्यावहारिक अनुभव होना चाहिए, जिसमें से 5 वर्ष पर्यावरण से संबंधित क्षेत्र में होने चाहिए। यह मानदंड इसलिए बनाए गए थे ताकि NGT के फैसले सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी ठोस और टिकाऊ हों।
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क्यों ट्रेंडिंग है यह मुद्दा?
यह मुद्दा हाल के दिनों में कई कारणों से चर्चा का विषय बन गया है:
- पर्यावरण जागरूकता में वृद्धि: भारत में वायु प्रदूषण, जल संकट, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान जैसे मुद्दे अब आम जनता की चिंता का विषय बन गए हैं। लोग चाहते हैं कि इन समस्याओं से निपटने के लिए विशेषज्ञ और निष्पक्ष निकाय काम करें।
- स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल: पूर्व सरकारी अधिकारियों की नियुक्तियों पर यह सवाल उठता है कि क्या वे पूरी तरह से स्वतंत्र होकर फैसले ले पाएंगे, खासकर उन मामलों में जहां उनके पूर्व विभाग या सरकार की नीतियां शामिल हों? क्या हितों का टकराव (conflict of interest) संभव है?
- विशिष्ट विशेषज्ञता की कमी: एक पूर्व आईएएस अधिकारी के पास भले ही व्यापक प्रशासनिक अनुभव हो, लेकिन क्या उनके पास पर्यावरण रसायन विज्ञान, इकोटॉक्सिकोलॉजी या समुद्री पारिस्थितिकी जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में आवश्यक गहराई वाली विशेषज्ञता होगी? यह चिंता उठाई जा रही है कि NGT को केवल नीति-निर्माण का ज्ञान नहीं, बल्कि जमीनी और तकनीकी ज्ञान भी चाहिए।
- पर्यावरण न्याय का भविष्य: यदि NGT के विशेषज्ञ पैनल में अपेक्षित विशेषज्ञता की कमी होती है, तो इसके फैसलों की वैधता और प्रभावशीलता पर सवाल उठ सकते हैं, जिससे पर्यावरण न्याय की पूरी अवधारणा कमजोर पड़ सकती है।
इस स्थिति के संभावित प्रभाव
यदि NGT में पूर्व सरकारी अधिकारियों का अनुपात इसी तरह बढ़ता रहा, तो इसके कई गंभीर परिणाम हो सकते हैं:
- NGT की विश्वसनीयता पर असर: जनता का विश्वास डगमगा सकता है कि NGT पर्यावरण मामलों में स्वतंत्र और वैज्ञानिक रूप से सूचित निर्णय ले रहा है।
- फैसलों की गुणवत्ता में कमी: विशिष्ट वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान के अभाव में, NGT के फैसले पर्याप्त गहराई वाले नहीं हो सकते हैं, जिससे पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान प्रभावी ढंग से नहीं हो पाएगा।
- अन्याय की भावना: पर्यावरण कार्यकर्ता और प्रभावित समुदाय महसूस कर सकते हैं कि उनके मामलों का उचित और निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं हो रहा है।
- पर्यावरण मानकों में ढील: यदि विशेषज्ञ सदस्य उन अधिकारियों में से हों जिन्होंने अतीत में विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी हो, तो संभव है कि वे पर्यावरण मानकों पर नरम रुख अपनाएं।
- अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों की उपेक्षा: शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों और जमीनी स्तर पर काम करने वाले पर्यावरणविदों को NGT जैसे महत्वपूर्ण मंच पर अपनी विशेषज्ञता का योगदान करने का अवसर नहीं मिलेगा।
दोनों पक्ष: पूर्व अधिकारियों की नियुक्ति के पक्ष और विपक्ष में तर्क
इस मुद्दे के दोनों पहलू हैं और दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं:
पूर्व सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति के पक्ष में तर्क:
- प्रशासनिक अनुभव और जमीनी हकीकत की समझ: पूर्व अधिकारियों के पास सरकार के कामकाज, नीतियों के निर्माण और उनके क्रियान्वयन का व्यापक अनुभव होता है। वे जानते हैं कि जमीनी स्तर पर चीजें कैसे काम करती हैं, जो जटिल पर्यावरणीय विवादों को सुलझाने में सहायक हो सकता है।
- नियमों और प्रक्रियाओं का ज्ञान: वे पर्यावरण कानूनों, नियमों और अधिसूचनाओं की जटिलताओं से अच्छी तरह वाकिफ होते हैं, क्योंकि उन्होंने अक्सर इन्हीं नियमों के तहत काम किया होता है।
- उपलब्धता और सत्यापन: अनुभवी और विश्वसनीय पूर्व सरकारी अधिकारी आसानी से उपलब्ध होते हैं, और उनकी पृष्ठभूमि को सत्यापित करना अपेक्षाकृत सरल होता है।
- नीति और क्रियान्वयन के बीच सेतु: वे नीतियों और उनके क्रियान्वयन के बीच के अंतर को समझते हैं, जिससे ऐसे समाधान खोजने में मदद मिल सकती है जो व्यवहार्य और प्रभावी हों।
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पूर्व सरकारी अधिकारियों की अधिकता पर चिंताएँ और विपक्ष में तर्क:
- हितों का टकराव (Conflict of Interest): यह सबसे बड़ी चिंता है। एक पूर्व अधिकारी को उन नीतियों या परियोजनाओं से संबंधित मामलों पर फैसला सुनाना पड़ सकता है, जिनमें वे अपने कार्यकाल के दौरान शामिल रहे हों। इससे निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।
- विशिष्ट पर्यावरणीय विशेषज्ञता की कमी: भले ही एक आईएएस अधिकारी के पास सामान्य ज्ञान व्यापक हो, लेकिन उनके पास आमतौर पर पर्यावरण विज्ञान, पारिस्थितिकी, प्रदूषण नियंत्रण प्रौद्योगिकियों या जैव विविधता संरक्षण जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में गहरी वैज्ञानिक विशेषज्ञता का अभाव होता है, जो NGT के मूल उद्देश्य के लिए महत्वपूर्ण है।
- नौकरशाही मानसिकता: NGT को एक स्वतंत्र, न्यायिक-तकनीकी निकाय के रूप में काम करना चाहिए, न कि एक सरकारी विभाग की तरह। पूर्व अधिकारियों में नौकरशाही की मानसिकता हावी हो सकती है, जो NGT की नवीन और सक्रिय भूमिका के खिलाफ हो सकती है।
- अन्य विशेषज्ञों की अनदेखी: शिक्षाविदों, शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों, पर्यावरण इंजीनियरों, पर्यावरण अर्थशास्त्रियों और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) से जुड़े जमीनी स्तर के विशेषज्ञों को NGT में मौका नहीं मिलता, जिनकी विशेषज्ञता बहुत मूल्यवान हो सकती है।
- सार्वजनिक धारणा और विश्वसनीयता: यदि NGT के फैसलों को "सरकार के ही लोगों द्वारा लिए गए" फैसले के रूप में देखा जाता है, तो NGT की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता पर जनता का विश्वास कम हो सकता है।
आगे की राह: संतुलन और सशक्त NGT के लिए सुझाव
एक प्रभावी और विश्वसनीय NGT के लिए संतुलन स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है। हमें ऐसे विशेषज्ञ सदस्यों की आवश्यकता है जो न केवल प्रशासनिक रूप से सक्षम हों, बल्कि जिनकी पर्यावरण विज्ञान और प्रौद्योगिकी में गहरी और विशिष्ट विशेषज्ञता भी हो।
- विविध विशेषज्ञता को बढ़ावा: नियुक्ति प्रक्रिया में शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, पर्यावरण वकीलों, सिविल इंजीनियरों और NGO क्षेत्र के विशेषज्ञों को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।
- पारदर्शी चयन प्रक्रिया: विशेषज्ञ सदस्यों के चयन की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, जिसमें योग्यता और अनुभव को सर्वोपरि रखा जाए।
- स्वतंत्रता सुनिश्चित करना: नियुक्त सदस्यों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए सख्त आचार संहिता और हितों के टकराव से बचने के नियम लागू किए जाने चाहिए।
- प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण: यदि पूर्व अधिकारियों को नियुक्त किया जाता है, तो उन्हें पर्यावरण विज्ञान और विशिष्ट तकनीकी पहलुओं पर गहन प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष: पर्यावरण न्याय का भविष्य दांव पर
NGT जैसी संस्थाएँ हमारे देश के पर्यावरण संरक्षण के लिए एक रीढ़ की हड्डी के समान हैं। इनकी प्रभावशीलता और विश्वसनीयता सीधे तौर पर इनके सदस्यों की योग्यता, विशेषज्ञता और निष्पक्षता पर निर्भर करती है। पूर्व सरकारी अधिकारियों की प्रशासनिक दक्षता को कम करके नहीं आंका जा सकता, लेकिन पर्यावरण जैसे विशिष्ट और जटिल क्षेत्र में, सच्ची और गहरी वैज्ञानिक विशेषज्ञता की आवश्यकता अपरिहार्य है।
समय आ गया है कि हम NGT में विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्तियों पर गंभीरता से विचार करें। हमें एक ऐसे NGT की आवश्यकता है जो न केवल कानूनी रूप से मजबूत हो, बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी सक्षम हो, ताकि यह हमारे पर्यावरण को वास्तविक और स्थायी सुरक्षा प्रदान कर सके। अन्यथा, पर्यावरण न्याय का भविष्य वास्तव में दांव पर लग सकता है।
हमें उम्मीद है कि यह विश्लेषण आपको इस महत्वपूर्ण मुद्दे की गहन समझ प्रदान कर सका।
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स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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