जम्मू-कश्मीर अब जमीनी प्रतिनिधित्व के बिना है, क्योंकि जिला विकास परिषदों (District Development Councils - DDCs) का कार्यकाल समाप्त हो गया है। यह सिर्फ एक प्रशासनिक घटना नहीं है, बल्कि केंद्र शासित प्रदेश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो वहां के लोगों के लिए गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
क्या हुआ और क्यों यह इतना महत्वपूर्ण है?
25 दिसंबर 2020 को, जम्मू-कश्मीर में पहली बार जिला विकास परिषदों (डीडीसी) के चुनाव के परिणाम घोषित किए गए थे। इन चुनावों ने केंद्र शासित प्रदेश में एक नई लोकतांत्रिक शुरुआत का प्रतीक दिया था, जिसमें लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया था। अब, ठीक पांच साल बाद, इन परिषदों का कार्यकाल समाप्त हो गया है, जिससे स्थानीय स्तर पर शासन और प्रतिनिधित्व में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है। यह शून्य इसलिए चिंताजनक है क्योंकि जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से विधानसभा चुनाव नहीं हुए हैं, और डीडीसी ही एकमात्र निर्वाचित निकाय थे जो लोगों की आवाज को सरकार तक पहुंचा रहे थे।
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पृष्ठभूमि: अनुच्छेद 370 से डीडीसी तक का सफर
जम्मू-कश्मीर का लोकतांत्रिक सफर हमेशा चुनौतियों से भरा रहा है। 5 अगस्त 2019 को, केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया और जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों – जम्मू-कश्मीर और लद्दाख – में विभाजित कर दिया। इस बड़े बदलाव के बाद, क्षेत्र में एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक शून्य पैदा हो गया था। स्थानीय विधानसभा भंग हो चुकी थी और कोई निर्वाचित सरकार नहीं थी।
इस खालीपन को भरने और जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए, भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर पंचायती राज अधिनियम, 1989 में संशोधन किया और जिला विकास परिषदों (डीडीसी) की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इसका उद्देश्य सीधे चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में विकास और शासन को बढ़ावा देना था।
डीडीसी चुनाव 2020 की मुख्य बातें:
- यह अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में हुए पहले बड़े चुनाव थे।
- कुल 20 जिले थे, प्रत्येक में 14 डीडीसी सीटें, यानी कुल 280 सीटें थीं।
- इन चुनावों में 51.42% का मतदान दर्ज किया गया था, जो क्षेत्र में लोकतंत्र के प्रति लोगों के विश्वास को दर्शाता था।
- इन चुनावों में पारंपरिक राजनीतिक दलों के साथ-साथ कई नए चेहरे भी सामने आए।
इन परिषदों को जिले के विकास कार्यक्रमों की योजना बनाने, अनुमोदन करने और लागू करने की शक्तियां दी गई थीं। वे स्थानीय प्रशासन और लोगों के बीच एक पुल का काम कर रहे थे।
यह मुद्दा क्यों ट्रेंड कर रहा है?
यह मुद्दा कई कारणों से चर्चा का विषय बना हुआ है:
- लोकतांत्रिक शून्य: विधानसभा चुनाव की अनुपस्थिति में, डीडीसी ही एकमात्र लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित संस्था थी। इनके कार्यकाल समाप्त होने का मतलब है कि अब जमीनी स्तर पर भी लोगों की सीधी आवाज नहीं है।
- विकास कार्य ठप: डीडीसी सदस्यों को अपने क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं की पहचान करने और उन्हें आगे बढ़ाने का काम सौंपा गया था। उनके अभाव में, कई विकास परियोजनाओं के रुकने या धीमे होने की आशंका है।
- सरकारी वादों का उल्लंघन: केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने का वादा किया था। डीडीसी के कार्यकाल समाप्त होने के बाद नए चुनावों की घोषणा न होने से इन वादों पर सवाल उठ रहे हैं।
- लोगों की हताशा: स्थानीय लोग अपने मुद्दों को उठाने और समाधान पाने के लिए डीडीसी सदस्यों पर निर्भर थे। अब उन्हें लगता है कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है।
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इसका क्या प्रभाव होगा?
डीडीसी के कार्यकाल की समाप्ति के कई गंभीर प्रभाव हो सकते हैं:
- स्थानीय आवाज का दमन: अब स्थानीय स्तर पर लोगों की समस्याओं और आकांक्षाओं को व्यक्त करने के लिए कोई निर्वाचित मंच नहीं होगा। इससे निर्णय लेने की प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी कम होगी।
- विकास में बाधा: डीडीसी विकास परियोजनाओं की प्राथमिकता तय करने और उनके कार्यान्वयन की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। उनके बिना, विकास कार्य धीमा हो सकता है और स्थानीय जरूरतों के अनुसार नहीं हो पाएगा।
- विश्वास का संकट: केंद्र सरकार और स्थानीय लोगों के बीच विश्वास और भी कम हो सकता है। यह दिखाता है कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है।
- राजनीतिक शून्यता का बढ़ना: विधानसभा चुनावों में देरी के साथ, डीडीसी का खाली होना जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक शून्यता को और बढ़ा देगा। इससे क्षेत्र में अस्थिरता और असंतोष बढ़ सकता है।
- अधिकारीशाही पर निर्भरता: निर्वाचित निकायों के अभाव में, स्थानीय प्रशासन और विकास पूरी तरह से अधिकारीशाही के हाथ में आ जाएगा, जिससे जवाबदेही की कमी हो सकती है।
तथ्य एक नज़र में:
- निकाय: जिला विकास परिषदें (DDCs)
- कुल सीटें: 280 (प्रत्येक 20 जिलों में 14)
- चुनाव: नवंबर-दिसंबर 2020
- मतदान प्रतिशत: 51.42%
- कार्यकाल: 5 वर्ष
- कार्यकाल समाप्त: दिसंबर 2025
दोनों पक्ष: सरकार बनाम स्थानीय नागरिक/विपक्ष
इस मुद्दे पर अलग-अलग राय हैं:
सरकार का पक्ष:
केंद्र सरकार या स्थानीय प्रशासन का तर्क यह हो सकता है कि:
- डीडीसी का कार्यकाल स्वाभाविक रूप से समाप्त हो गया है, जैसा कि निर्धारित था।
- नए चुनावों की तैयारी चल रही है, जिसमें मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण और परिसीमन जैसे प्रक्रियात्मक मुद्दे शामिल हैं, जिनमें समय लगता है।
- इस बीच, प्रशासनिक मशीनरी विकास कार्यों को जारी रखेगी।
- सरकार जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है, जो कि किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए आवश्यक है।
- उन्होंने डीडीसी के कार्यकाल के दौरान किए गए विकास कार्यों और पारदर्शिता को भी उजागर कर सकते हैं।
स्थानीय नागरिक और विपक्षी दलों का पक्ष:
इसके विपरीत, स्थानीय लोग और विपक्षी दल इन तर्कों से सहमत नहीं हैं:
- वे इस बात पर जोर देते हैं कि कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही नए चुनावों की योजना बनानी चाहिए थी ताकि लोकतांत्रिक शून्य पैदा न हो।
- उनका मानना है कि यह देरी केवल केंद्रीय नियंत्रण को मजबूत करने और स्थानीय लोगों को सशक्त करने की प्रक्रिया को बाधित करने के लिए है।
- वे सवाल उठाते हैं कि अगर चुनाव कराना इतना मुश्किल है, तो अनुच्छेद 370 हटने के बाद तुरंत डीडीसी चुनाव क्यों कराए गए थे।
- यह स्थिति लोगों में अलगाव की भावना को और बढ़ा सकती है और उन्हें राष्ट्रीय मुख्यधारा से दूर धकेल सकती है।
- विपक्षी दल इसे जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र को कमजोर करने का एक और प्रयास मानते हैं।
आगे क्या?
फिलहाल, जम्मू-कश्मीर में डीडीसी चुनावों को लेकर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं है। स्थानीय लोगों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जल्द से जल्द नए चुनावों की घोषणा होनी चाहिए ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को फिर से स्थापित किया जा सके। इस बीच, केंद्र शासित प्रदेश की अधिकांश विकास और प्रशासनिक गतिविधियां अब पूरी तरह से नौकरशाही के अधीन होंगी, जिससे लोगों की जवाबदेही और भागीदारी पर सवाल उठेंगे।
जम्मू-कश्मीर के लिए यह एक नाजुक समय है, जब उसे जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण की सबसे ज्यादा जरूरत है। डीडीसी का कार्यकाल समाप्त होना सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि जमीनी लोकतंत्र की एक कसौटी है, जिसे केंद्र सरकार को गंभीरता से लेना होगा।
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