Ministers, academics to take forward PM Modi’s ‘decolonisation’ call through conferences, monographs
यह सिर्फ एक सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाली एक बड़ी पहल है! प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के 'वि-उपनिवेशीकरण' (decolonisation) के आह्वान को अब केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे ज़मीन पर उतारने के लिए केंद्र सरकार के मंत्री और देश के शीर्ष शिक्षाविद मिलकर काम करने जा रहे हैं। इसका मतलब है कि भारत अब अपने औपनिवेशिक अतीत की बेड़ियों को तोड़ने के लिए एक संगठित, शैक्षिक और सांस्कृतिक अभियान छेड़ने वाला है।
क्या हुआ है और आगे क्या होगा?
हाल ही में यह खबर सामने आई है कि विभिन्न मंत्रालयों, विशेषकर शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय, ने देश भर के प्रमुख विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के शिक्षाविदों के साथ हाथ मिलाया है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य पीएम मोदी के 'वि-उपनिवेशीकरण' के दृष्टिकोण को साकार करना है। इसके लिए कई ठोस कदम उठाए जाएंगे:
- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन: पूरे देश और विदेश में ऐसे सम्मेलनों और सेमिनारों का आयोजन किया जाएगा, जहाँ औपनिवेशिक विरासत के विभिन्न पहलुओं पर गंभीर चर्चा होगी। इसमें इतिहास, कला, साहित्य, विज्ञान, प्रशासन और कानून जैसे विषय शामिल होंगे।
- विद्वत्तापूर्ण मोनोग्राफ का प्रकाशन: विशेष रूप से औपनिवेशिक काल से पहले के भारत के ज्ञान, विज्ञान, कला, प्रशासन प्रणाली और सांस्कृतिक योगदान पर गहन शोध कर मोनोग्राफ (एकल विषय पर केंद्रित विस्तृत ग्रंथ) प्रकाशित किए जाएंगे। इनका उद्देश्य भारतीय परिप्रेक्ष्य से एक वैकल्पिक इतिहास और ज्ञान प्रणाली को प्रस्तुत करना होगा।
- पाठ्यक्रम संशोधन: शिक्षाविदों के साथ मिलकर स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम में बदलाव लाए जाएंगे, ताकि भारतीय इतिहास और संस्कृति को औपनिवेशिक लेंस से देखने के बजाय, एक स्वदेशी दृष्टिकोण से पढ़ाया जा सके।
- जागरूकता अभियान: आम जनता में, विशेषकर युवाओं में, भारत की समृद्ध विरासत और औपनिवेशिक मानसिकता के दुष्परिणामों के बारे में जागरूकता फैलाई जाएगी।
यह सब कुछ सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका लक्ष्य हमारे सोचने, समझने और खुद को परिभाषित करने के तरीके को बदलना है।
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'वि-उपनिवेशीकरण' का पृष्ठभूमि और पीएम मोदी का आह्वान
भारत को 1947 में राजनीतिक आज़ादी तो मिल गई थी, लेकिन प्रधान मंत्री मोदी पिछले कई वर्षों से लगातार इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि हमें मानसिक और सांस्कृतिक गुलामी से भी आज़ाद होना होगा। 'वि-उपनिवेशीकरण' का उनका आह्वान इसी विचार पर आधारित है। यह केवल ब्रिटिश राज के प्रतीकों को हटाना नहीं है, बल्कि उस मानसिकता को जड़ से उखाड़ फेंकना है, जिसने हमारी अपनी संस्कृति, इतिहास और ज्ञान को कमतर आंका और पश्चिमी विचारों को श्रेष्ठ माना।
पीएम मोदी के आह्वान के मुख्य बिंदु:
- स्वदेशी गौरव: भारतीयता पर गर्व करना, अपनी भाषाओं, कलाओं, साहित्य और परंपराओं को पुनर्जीवित करना।
- ज्ञान प्रणाली का सम्मान: भारत की प्राचीन ज्ञान प्रणालियों, आयुर्वेद, योग, ज्योतिष, गणित, विज्ञान और दर्शन को वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाना।
- इतिहास का पुनर्लेखन: भारतीय इतिहास को भारतीय नायकों और भारतीय संघर्षों के दृष्टिकोण से देखना, न कि औपनिवेशिक शासकों के नज़रिए से।
- प्रतीकात्मक बदलाव: औपनिवेशिक काल के प्रतीकों और नामों को बदलना, जो गुलामी की याद दिलाते हैं (उदाहरण के लिए, राजपथ का 'कर्तव्य पथ' में बदलना, भारतीय नौसेना के ध्वज से औपनिवेशिक सेंट जॉर्ज क्रॉस हटाना)।
पीएम मोदी ने कई मौकों पर, जैसे स्वतंत्रता दिवस के भाषणों में और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में, इस अवधारणा पर प्रकाश डाला है। उनका मानना है कि जब तक हम अपनी जड़ों को मज़बूत नहीं करेंगे और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त नहीं होंगे, तब तक भारत विश्व गुरु बनने की अपनी पूरी क्षमता को साकार नहीं कर पाएगा।
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यह मुद्दा क्यों ट्रेंडिंग है?
यह एक ऐसा विषय है जो केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि आम जनता, विशेषकर युवाओं के बीच भी इसकी खूब चर्चा है। इसके कई कारण हैं:
- राष्ट्रीय पहचान की खोज: एक ऐसे दौर में जब वैश्विक पहचानें धुंधली हो रही हैं, भारत अपनी राष्ट्रीय पहचान को मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है। 'वि-उपनिवेशीकरण' इस प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा है।
- युवाओं में उत्सुकता: नई पीढ़ी अपने इतिहास और संस्कृति के बारे में अधिक जानना चाहती है, और औपनिवेशिक काल के पहले के भारत की कहानियों को फिर से खोजने में रुचि रखती है।
- सरकार का सशक्त समर्थन: चूंकि यह प्रधान मंत्री का एक सीधा आह्वान है, इसलिए इसे सरकारी तंत्र और मीडिया में भरपूर कवरेज मिल रहा है, जिससे यह लगातार ट्रेंड में बना हुआ है।
- वैश्विक आंदोलन: दुनिया भर में कई पूर्व-औपनिवेशिक देश अपनी औपनिवेशिक विरासत पर पुनर्विचार कर रहे हैं। भारत भी इस वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा बन रहा है।
- विचारधारात्मक बहस: यह विषय गहरे वैचारिक मतभेदों को जन्म देता है, जिससे यह बहस का केंद्र बिंदु बन जाता है और लोग इस पर अपने विचार व्यक्त करने को उत्सुक रहते हैं।
इस पहल का संभावित प्रभाव
अगर यह पहल सफल होती है, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं जो भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक ताने-बाने को बदल सकते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में:
- इतिहास का पुनर्पाठ: भारतीय इतिहास को अब केवल आक्रमणकारियों या ब्रिटिश शासकों के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाएगा, बल्कि भारतीय सभ्यता के विकास, उपलब्धियों और संघर्षों पर अधिक ज़ोर दिया जाएगा।
- भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) का समावेश: प्राचीन भारतीय विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा (आयुर्वेद), दर्शन और कला को शिक्षा का एक अभिन्न अंग बनाया जाएगा।
- भाषा और साहित्य को बढ़ावा: क्षेत्रीय भाषाओं और उनके साहित्य को और अधिक महत्व मिलेगा, साथ ही संस्कृत जैसी प्राचीन भाषाओं के अध्ययन को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
संस्कृति और समाज पर:
- आत्मविश्वास और गौरव: देशवासियों में, विशेषकर युवाओं में, अपनी विरासत और पहचान को लेकर आत्मविश्वास और गौरव की भावना बढ़ेगी।
- कला और शिल्प का पुनरुत्थान: भारतीय कला रूपों, हस्तशिल्प और पारंपरिक प्रथाओं को पुनर्जीवित करने और उन्हें आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिक बनाने का प्रयास किया जाएगा।
- कानून और प्रशासन में सुधार: उन कानूनों और प्रशासनिक संरचनाओं पर पुनर्विचार किया जा सकता है जो औपनिवेशिक काल के हैं और शायद आज के भारत के लिए प्रासंगिक नहीं हैं।
अनुसंधान और वैश्विक मंच पर:
- नया शोध: शिक्षाविदों के लिए भारतीय इतिहास, समाज और ज्ञान प्रणालियों पर नए और मौलिक शोध के द्वार खुलेंगे।
- भारत की सॉफ्ट पावर: 'वि-उपनिवेशीकरण' के माध्यम से भारत अपनी अनूठी सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान को वैश्विक मंच पर और अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर पाएगा।
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इस पहल से जुड़े कुछ तथ्य
- इस अभियान में शिक्षा मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय के साथ-साथ भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (ICHR), भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और विभिन्न केंद्रीय विश्वविद्यालयों की भागीदारी अपेक्षित है।
- पहले भी, सरकार ने कई प्रतीक चिह्नों को बदला है, जैसे राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ करना, इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित करना, और भारतीय नौसेना के नए ध्वज से औपनिवेशिक सेंट जॉर्ज क्रॉस को हटाकर शिवाजी महाराज की मुहर से प्रेरित डिज़ाइन अपनाना। ये सभी 'वि-उपनिवेशीकरण' की दिशा में उठाए गए कदम हैं।
- मोनोग्राफ के लिए संभावित विषयों में सिंधु घाटी सभ्यता की शहरी योजना, प्राचीन भारतीय धातु विज्ञान, गणितज्ञ आर्यभट्ट और भास्कर द्वितीय के योगदान, मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, चोल वास्तुकला, या गुप्त काल के विज्ञान और कला की उपलब्धियाँ शामिल हो सकती हैं।
दोनों पक्ष: समर्थक और आलोचक
किसी भी बड़े राष्ट्रीय परिवर्तन की तरह, इस 'वि-उपनिवेशीकरण' पहल के भी अपने समर्थक और आलोचक हैं।
समर्थकों की दलीलें (The Proponents):
समर्थक इस पहल को भारत की सच्ची स्वतंत्रता और आत्म-सम्मान के लिए एक आवश्यक कदम मानते हैं।
- आत्मनिर्भरता और गौरव: उनका मानना है कि औपनिवेशिक मानसिकता ने हमें अपनी क्षमताओं और इतिहास को कमतर आंकना सिखाया है। 'वि-उपनिवेशीकरण' हमें अपनी जड़ों से फिर से जोड़ेगा और आत्मनिर्भरता की भावना को बढ़ावा देगा।
- इतिहास का शुद्धिकरण: आलोचकों का तर्क है कि ब्रिटिश और अन्य विदेशी शासकों ने भारतीय इतिहास को अपने हितों के हिसाब से तोड़ा-मरोड़ा। यह पहल हमें उस विकृत इतिहास को ठीक करने और सही भारतीय परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर देगी।
- सांस्कृतिक पुनर्जागरण: यह भारतीय भाषाओं, कला, साहित्य और परंपराओं को पुनर्जीवित करेगा, जो पश्चिमी प्रभाव के कारण हाशिए पर चले गए थे।
- मानसिक गुलामी से मुक्ति: यह केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं, बल्कि मानसिक आज़ादी है, जो एक राष्ट्र के रूप में हमारे आत्मविश्वास के लिए बहुत ज़रूरी है।
आलोचकों/चिंतितों की दलीलें (The Critics/Concerns):
वहीं, कुछ शिक्षाविद और विचारक इस पहल को लेकर चिंताएं व्यक्त करते हैं।
- इतिहास का राजनीतिकरण: आलोचकों को डर है कि 'वि-उपनिवेशीकरण' के नाम पर इतिहास को एक विशेष राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप फिर से लिखा जा सकता है, जिससे वस्तुनिष्ठता प्रभावित होगी।
- अकादमिक स्वतंत्रता पर खतरा: चिंता जताई जा रही है कि सरकार द्वारा निर्देशित 'वि-उपनिवेशीकरण' अभियान अकादमिक स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है और शोधकर्ताओं को कुछ चुनिंदा विषयों पर ही काम करने के लिए प्रेरित कर सकता है।
- अनावश्यक ध्रुवीकरण: इतिहास की व्याख्या को लेकर समाज में नए सिरे से ध्रुवीकरण हो सकता है, जिससे अनावश्यक विवाद और विभाजन पैदा होंगे।
- क्या सब कुछ औपनिवेशिक है?: कुछ लोग तर्क देते हैं कि औपनिवेशिक काल की हर चीज़ बुरी नहीं थी (जैसे रेलवे, कुछ प्रशासनिक प्रणालियाँ, अंग्रेजी भाषा), और हर चीज़ को सिर्फ इसलिए खारिज करना कि वह औपनिवेशिक विरासत है, तर्कसंगत नहीं है।
- वर्तमान समस्याओं से भटकाव: आलोचकों का कहना है कि अतीत पर इतना अधिक ध्यान केंद्रित करने से वर्तमान की ज़्यादा ज़रूरी समस्याओं, जैसे गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा की गुणवत्ता, से ध्यान भटक सकता है।
निष्कर्ष
'वि-उपनिवेशीकरण' का आह्वान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है। यह एक ऐसा प्रयास है जो हमारी राष्ट्रीय पहचान और गौरव को फिर से परिभाषित करने की क्षमता रखता है। मंत्रियों और शिक्षाविदों का मिलकर काम करना इस बात का संकेत है कि यह पहल अब केवल चर्चा का विषय नहीं, बल्कि एक ठोस कार्य योजना का हिस्सा बनने जा रही है। इसका परिणाम क्या होगा, यह आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन यह निश्चित है कि यह भारत के इतिहास, शिक्षा और सांस्कृतिक परिदृश्य को गहरे रूप से प्रभावित करेगा।
आपका इस 'वि-उपनिवेशीकरण' मिशन पर क्या सोचना है? क्या यह भारत को सही मायने में आज़ाद करेगा या इसमें चुनौतियां हैं? हमें कमेंट्स में बताएं! इस जानकारी को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें और ऐसी ही और वायरल खबरों के लिए 'Viral Page' को फॉलो करें!
स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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