Top News

India Does Not Have a Coloniser Mindset: Brazil President Lula's Statement and India's Rising Global Stature - Viral Page (भारत उपनिवेशवादी मानसिकता नहीं रखता: ब्राजील के राष्ट्रपति लूला का बयान और विश्व मंच पर भारत का बढ़ता कद - Viral Page)

ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने हाल ही में एक ऐसा बयान दिया है जिसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की भूमिका और उसकी ऐतिहासिक स्थिति को एक नई रोशनी दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, "भारत उपनिवेशवादी मानसिकता नहीं रखता।" यह सिर्फ एक राजनयिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि एक प्रमुख वैश्विक नेता द्वारा भारत के बढ़ते प्रभाव, उसकी सांस्कृतिक विरासत और उसकी विदेश नीति के मूलभूत सिद्धांतों की गहरी समझ का प्रमाण है। 'Viral Page' पर, आइए हम इस महत्वपूर्ण बयान की तह तक जाएं और समझें कि यह भारत के लिए, BRICS के लिए, और वास्तव में पूरे 'ग्लोबल साउथ' (Global South) के लिए क्या मायने रखता है।

क्या हुआ और इसका संदर्भ?

यह बयान तब सामने आया जब विश्व मंच पर नए सिरे से ध्रुवीकरण हो रहा है और कई देश एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं। ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा, जो 'ग्लोबल साउथ' के एक मुखर समर्थक और एक अनुभवी राजनेता हैं, ने यह टिप्पणी भारत की विदेश नीति के सिद्धांतों और उसके ऐतिहासिक आचरण को ध्यान में रखते हुए की। यह बयान किसी आकस्मिक बैठक का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह उस समय आया है जब BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) जैसे संगठन अपनी शक्ति और प्रभाव बढ़ा रहे हैं, और 'ग्लोबल साउथ' एक एकजुट आवाज के रूप में उभर रहा है। लूला दा सिल्वा स्वयं एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने हमेशा साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध किया है और विकासशील देशों के बीच सहयोग और समानता की वकालत की है। उनके इस बयान से भारत को एक ऐसे विश्वसनीय सहयोगी के रूप में देखा जा रहा है जो किसी भी देश पर अपनी इच्छा थोपने की बजाय सहयोग और साझा विकास पर विश्वास रखता है।

Brazilian President Lula shaking hands with Indian Prime Minister Modi at a summit, both smiling warmly. The backdrop shows flags of India and Brazil, symbolizing strong diplomatic ties.

Photo by ostudio on Unsplash

क्यों महत्वपूर्ण है यह बयान? भारत की उपनिवेशवाद विरोधी विरासत

लूला का यह बयान भारत की उस ऐतिहासिक पहचान को पुष्ट करता है जिसे उसने दशकों के संघर्ष और राजनयिक प्रयासों से अर्जित किया है।

भारत की ऐतिहासिक पहचान: गुटनिरपेक्ष आंदोलन

भारत ने 1947 में अपनी स्वतंत्रता के बाद से ही उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का दृढ़ता से विरोध किया है। पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में, भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement - NAM) की नींव रखी, जिसका उद्देश्य शीत युद्ध की दो महाशक्तियों के सैन्य गठबंधनों से दूर रहना था। यह आंदोलन उपनिवेशवाद से मुक्त हुए नए स्वतंत्र देशों के लिए एक मंच बन गया, जहाँ वे अपनी संप्रभुता बनाए रख सकें और अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रूप से चला सकें। भारत ने हमेशा विकासशील देशों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन किया है और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रंगभेद, नस्लवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठाई है। भारत की यह नीति केवल कागजों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसने अपने कार्यों से इसे साबित भी किया है, चाहे वह अफ्रीकी देशों की स्वतंत्रता के लिए समर्थन हो या संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में उसकी भागीदारी।

ब्राजील का दृष्टिकोण और लूला की राजनीति

ब्राजील भी अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण उपनिवेशवाद के प्रभावों को अच्छी तरह समझता है। लूला दा सिल्वा, जो अपने प्रगतिशील विचारों और गरीबों के उत्थान के लिए अपनी प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं, ने हमेशा एक न्यायपूर्ण और समान विश्व व्यवस्था की वकालत की है। उनके लिए, भारत का गैर-उपनिवेशवादी रुख केवल एक नीतिगत घोषणा नहीं है, बल्कि यह एक मानसिकता है जो सहयोग, आपसी सम्मान और साझा समृद्धि पर आधारित है। यह बयान ब्राजील जैसे देशों के साथ भारत के गहरे संबंधों को भी दर्शाता है, जो सभी एक बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण की दिशा में काम कर रहे हैं।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य और BRICS की भूमिका

यह बयान ऐसे समय में आया है जब दुनिया एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रही है।

BRICS: ग्लोबल साउथ की बढ़ती आवाज़

BRICS समूह, जिसमें भारत और ब्राजील दोनों महत्वपूर्ण सदस्य हैं, पश्चिमी प्रभुत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह समूह न केवल आर्थिक सहयोग के लिए एक मंच है, बल्कि यह विकासशील देशों को एक मजबूत आवाज भी प्रदान करता है। लूला का बयान BRICS की उस साझा भावना को दर्शाता है कि वे सभी देश, जो कभी उपनिवेशवाद के शिकार थे या उसके प्रभाव में थे, अब एक नई विश्व व्यवस्था के निर्माण में एक साथ खड़े हैं, जहाँ किसी भी राष्ट्र को 'उपनिवेशवादी' मानसिकता से प्रेरित होकर दूसरे पर हावी होने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। भारत, अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था, विशाल जनसंख्या और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ, BRICS में एक केंद्रीय भूमिका निभाता है।

G20 में भारत की अध्यक्षता और विश्व नेता के रूप में उभरता भारत

भारत ने हाल ही में G20 समूह की अध्यक्षता सफलतापूर्वक संपन्न की, जहाँ उसने 'वसुधैव कुटुंबकम्' (Vasudhaiva Kutumbakam) - 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' के सिद्धांत पर जोर दिया। भारत ने 'ग्लोबल साउथ' की चिंताओं को प्रमुखता से उठाया और उनके हितों का प्रतिनिधित्व किया। अफ्रीका जैसे महाद्वीपों को G20 में शामिल करने की भारत की पहल ने उसकी गैर-उपनिवेशवादी और समावेशी मानसिकता को और पुष्ट किया। लूला का बयान भारत की इस कूटनीतिक सफलता और बढ़ती वैश्विक साख को और मजबूत करता है। यह स्पष्ट करता है कि भारत एक ऐसा नेता है जो केवल अपने हितों की नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व समुदाय के कल्याण की बात करता है।

इस बयान का प्रभाव और भारत के लिए मायने

लूला का यह बयान भारत की वैश्विक स्थिति पर कई महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा।

अंतर्राष्ट्रीय छवि पर सकारात्मक असर

यह बयान भारत की 'सॉफ्ट पावर' (Soft Power) को और बढ़ाएगा। भारत की छवि एक ऐसे देश के रूप में मजबूत होगी जो शांति, सहयोग और आपसी सम्मान के सिद्धांतों में विश्वास रखता है। यह उन पश्चिमी देशों के लिए एक संदेश भी है जो अक्सर चीन या रूस जैसे देशों के साथ भारत को 'गैर-लोकतांत्रिक' या 'अधिनायकवादी' गठबंधनों में जोड़ने का प्रयास करते हैं। लूला जैसे एक अनुभवी लोकतांत्रिक नेता द्वारा यह समर्थन भारत की लोकतांत्रिक साख और उसकी समावेशी वैश्विक दृष्टि को रेखांकित करता है।

दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा

यह बयान 'दक्षिण-दक्षिण सहयोग' (South-South Cooperation) को और गति देगा। भारत और ब्राजील जैसे देश, जो कभी उपनिवेशवादी शक्तियों द्वारा शासित थे, अब एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रेरित होंगे। इससे आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक क्षेत्रों में नए अवसर पैदा होंगे, जिससे 'ग्लोबल साउथ' के देशों की सामूहिक ताकत बढ़ेगी। यह सहयोग विकासशील देशों को वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर बातचीत करने में सक्षम बनाएगा।

वैश्विक भू-राजनीति में भारत का बढ़ता महत्व

यह बयान वैश्विक भू-राजनीति में भारत के बढ़ते महत्व को भी दर्शाता है। जब जलवायु परिवर्तन, व्यापार असंतुलन, या सुरक्षा जैसे वैश्विक मुद्दों पर चर्चा होती है, तो भारत की आवाज को अब और अधिक गंभीरता से लिया जाएगा। एक गैर-उपनिवेशवादी शक्ति के रूप में उसकी मान्यता उसे निष्पक्ष मध्यस्थ और समस्या-समाधानकर्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाने में सक्षम बनाएगी।

दोनों पक्षों का विश्लेषण: एक बहुध्रुवीय विश्व की ओर

लूला के बयान को केवल भारत की प्रशंसा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे एक व्यापक भू-राजनीतिक बदलाव के संकेत के रूप में समझना चाहिए।

लूला के बयान का निहितार्थ: नई वैश्विक नैतिकता

एक ओर, यह बयान उस नैतिक आधार को मजबूत करता है जिस पर 'ग्लोबल साउथ' अपनी विदेश नीति बनाता है। यह बताता है कि उपनिवेशवाद के युग को पीछे छोड़ते हुए, अब विश्व को एक नई नैतिकता की आवश्यकता है जो समानता, संप्रभुता और आपसी सम्मान पर आधारित हो। लूला का यह कहना कि भारत में उपनिवेशवादी मानसिकता नहीं है, वास्तव में एक आह्वान है कि सभी देशों को ऐसी ही मानसिकता अपनानी चाहिए। यह उन ऐतिहासिक शक्तियों के विपरीत है जिन्होंने अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए अन्य देशों को उपनिवेश बनाया।

एक बहुध्रुवीय विश्व में संतुलन

दूसरी ओर, यह बयान मौजूदा वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी सवाल उठाता है। यह दर्शाता है कि 'ग्लोबल साउथ' के देश अब पश्चिमी प्रभुत्व वाली एकध्रुवीय या द्विध्रुवीय दुनिया को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। वे एक बहुध्रुवीय विश्व की मांग कर रहे हैं जहाँ विभिन्न ध्रुव हों और कोई भी एक ध्रुव दूसरों पर हावी न हो। भारत, अपनी गैर-उपनिवेशवादी मानसिकता के साथ, इस नए संतुलन में एक महत्वपूर्ण और विश्वसनीय ध्रुव के रूप में उभर रहा है। यह आलोचना नहीं है, बल्कि एक ऐसे वैकल्पिक दृष्टिकोण की पुष्टि है जो पुराने उपनिवेशवादी प्रतिमानों को अस्वीकार करता है और एक अधिक न्यायसंगत विश्व व्यवस्था की वकालत करता है। यह उस भावना को भी पुष्ट करता है कि भारत जैसे देश, जो अपनी विविध संस्कृति, लोकतांत्रिक मूल्यों और विकासशील अर्थव्यवस्था के साथ विश्व मंच पर आए हैं, उनके पास नेतृत्व की एक नई शैली है - एक ऐसी शैली जो किसी को कमजोर नहीं करती बल्कि सभी को साथ लेकर चलती है।

निष्कर्ष: एक नई वैश्विक पहचान

ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा का यह बयान भारत की वैश्विक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह न केवल भारत की उपनिवेशवाद विरोधी विरासत को मान्यता देता है, बल्कि एक जिम्मेदार और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में उसकी बढ़ती स्थिति को भी पुष्ट करता है। यह स्पष्ट है कि भारत अब केवल अपने क्षेत्रीय हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह एक ऐसे 'विश्वामित्र' (विश्व का मित्र) के रूप में उभर रहा है जो 'ग्लोबल साउथ' की आवाज को बुलंद करता है और एक न्यायपूर्ण, संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाता है। जैसे-जैसे दुनिया पुराने भू-राजनीतिक ढाँचों से आगे बढ़ रही है, भारत जैसे देशों की गैर-उपनिवेशवादी मानसिकता और समावेशी दृष्टिकोण विश्व शांति और समृद्धि के लिए पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। लूला का यह बयान इस बात का प्रमाण है कि भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है और उसकी वैश्विक पहचान अब और भी मजबूत हो गई है।

आपको ब्राजील के राष्ट्रपति लूला के इस बयान के बारे में क्या लगता है? क्या आपको लगता है कि भारत वास्तव में एक गैर-उपनिवेशवादी शक्ति के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है? अपने विचार कमेंट्स में साझा करें! इस महत्वपूर्ण विश्लेषण को अपने दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें ताकि वे भी भारत की बढ़ती वैश्विक पहचान को समझ सकें। ऐसी ही और गहन और विचारोत्तेजक सामग्री के लिए, 'Viral Page' को फॉलो करना न भूलें!

स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

Post a Comment

Previous Post Next Post