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Gujarat's 'Love Jihad' Law: Parental Consent Mandatory for Marriage Registration – What's the Full Story? - Viral Page (गुजरात का 'लव जिहाद' कानून: विवाह पंजीकरण में माता-पिता की सहमति अनिवार्य – क्या है पूरा मामला? - Viral Page)

टॉप न्यूज़ हेडलाइंस 20 फरवरी, 2026: 'लव जिहाद' का हवाला देते हुए गुजरात ने विवाह पंजीकरण कानून में बदलाव की ओर कदम बढ़ाया, माता-पिता की सहमति अनिवार्य होगी

20 फरवरी, 2026 की सुर्खियों में, गुजरात सरकार का एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील कदम देश भर में बहस का विषय बन गया है। राज्य सरकार ने 'लव जिहाद' के बढ़ते कथित मामलों का हवाला देते हुए विवाह पंजीकरण कानूनों में बड़े बदलाव का प्रस्ताव रखा है। इस नए प्रस्तावित संशोधन के तहत, विवाह पंजीकरण के लिए माता-पिता की सहमति को अनिवार्य बनाने की तैयारी है। यह घोषणा न केवल गुजरात में, बल्कि पूरे भारत में नागरिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत अधिकारों और सामाजिक ताने-बाने पर बहस को फिर से गरमा रही है।

क्या हुआ और गुजरात सरकार का नया प्रस्ताव क्या है?

गुजरात सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि वह अपने मौजूदा विवाह पंजीकरण कानूनों में संशोधन करेगी। इस संशोधन का प्राथमिक उद्देश्य विवाह के लिए माता-पिता की सहमति को अनिवार्य बनाना है। सरकार का तर्क है कि यह कदम 'लव जिहाद' के मामलों पर अंकुश लगाने और उन लड़कियों को बचाने के लिए आवश्यक है जिन्हें बहकाकर या जबरन विवाह में शामिल किया जाता है। प्रस्तावित कानून के अनुसार, कोई भी विवाह, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, कानूनी रूप से तभी मान्य होगा जब दोनों पक्षों, विशेषकर दुल्हन के माता-पिता की स्पष्ट सहमति प्राप्त हो। यदि माता-पिता की सहमति नहीं होती है, तो विवाह का पंजीकरण अमान्य माना जा सकता है, और इसके गंभीर कानूनी परिणाम हो सकते हैं। हालांकि इस कानून के विस्तृत प्रावधान अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह व्यक्तिगत स्वायत्तता और विवाह के अधिकार पर गहरा प्रभाव डालेगा।
गुजरात विधानसभा भवन की एक तस्वीर, जिसमें सामने धूप खिली हुई है

Photo by Pat Ferranco on Unsplash

'लव जिहाद' का बैकग्राउंड: आखिर क्या है यह शब्द?

'लव जिहाद' शब्द भारत में पिछले कुछ वर्षों से एक विवादास्पद और संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। इस शब्द का उपयोग कुछ हिंदू और ईसाई संगठनों द्वारा एक कथित षड्यंत्र का वर्णन करने के लिए किया जाता है, जिसमें आरोप लगाया जाता है कि मुस्लिम पुरुष हिंदू या ईसाई महिलाओं को प्रेम के जाल में फंसाकर उनसे शादी करते हैं, और फिर उन्हें इस्लाम में परिवर्तित कर देते हैं। इन संगठनों का दावा है कि इसका उद्देश्य भारत में मुस्लिम आबादी बढ़ाना और धार्मिक जनसांख्यिकी को बदलना है। हालांकि, इस अवधारणा को व्यापक रूप से खारिज किया जाता रहा है। भारत सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि 'लव जिहाद' की कोई आधिकारिक परिभाषा नहीं है और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा ऐसी किसी भी घटना की रिपोर्ट नहीं की गई है। इसके बावजूद, यह शब्द राजनीतिक और सामाजिक विमर्श में गहराई से जड़ें जमा चुका है और कई राज्यों में इससे संबंधित कानून भी बनाए गए हैं। गुजरात में पहले से ही "गुजरात धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) अधिनियम, 2021" लागू है, जो जबरन या धोखाधड़ी से धर्मांतरण को रोकने के लिए बनाया गया था। इस अधिनियम में विवाह के माध्यम से जबरन धर्मांतरण को भी शामिल किया गया है और इसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। अब, विवाह पंजीकरण में माता-पिता की सहमति को अनिवार्य बनाने का यह नया प्रस्ताव, मौजूदा कानून को और मजबूत करने या उसका दायरा बढ़ाने की दिशा में एक और कदम प्रतीत होता है।

क्यों ट्रेंडिंग है यह मुद्दा? इसका संभावित प्रभाव क्या होगा?

यह मुद्दा कई कारणों से तेजी से ट्रेंड कर रहा है और इसकी व्यापक चर्चा हो रही है:
  1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सवाल: यह कानून वयस्क व्यक्तियों के अपनी पसंद के साथी से विवाह करने के अधिकार पर सीधा असर डालेगा। संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के अधिकार का उल्लंघन होने की आशंका है।
  2. "लव जिहाद" की अवधारणा: यह शब्द खुद ही एक राजनीतिक और सामाजिक विभाजन पैदा करने वाला है। इसके इर्द-गिर्द कोई भी कानूनी कदम स्वाभाविक रूप से विवादों को जन्म देता है।
  3. महिला स्वायत्तता: आलोचकों का तर्क है कि यह कानून महिलाओं को निर्णय लेने की शक्ति से वंचित करेगा और उनके परिवार की इच्छाओं के अधीन कर देगा, भले ही वे वयस्क हों।
  4. अंतरधार्मिक विवाहों पर असर: यह स्पष्ट है कि इस कानून का सबसे बड़ा प्रभाव अंतरधार्मिक विवाहों पर पड़ेगा, जहां अक्सर परिवार की सहमति एक बड़ी बाधा बन जाती है।
  5. अन्य राज्यों में ऐसे कानून: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे कई राज्यों में पहले से ही धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हैं, जिनमें विवाह के माध्यम से धर्मांतरण को रोकने के प्रावधान हैं। गुजरात का यह कदम अन्य राज्यों को भी ऐसे और कड़े कानून बनाने के लिए प्रेरित कर सकता है।
यह कानून समाज के विभिन्न वर्गों पर गहरा प्रभाव डालेगा। युवा जोड़ों के लिए, यह अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने में एक बड़ी बाधा बन सकता है। समाज में परिवारों का दबदबा बढ़ सकता है, और 'ऑनर किलिंग' या सामाजिक बहिष्कार जैसे मामले बढ़ सकते हैं यदि युवा जोड़े माता-पिता की मर्जी के खिलाफ शादी करने का प्रयास करते हैं।

दोनों पक्षों के तर्क: क्या कहते हैं समर्थक और आलोचक?

किसी भी संवेदनशील मुद्दे की तरह, इस प्रस्ताव के भी मजबूत समर्थक और मुखर आलोचक हैं।

समर्थकों के तर्क:

  • महिलाओं की सुरक्षा: समर्थकों का मुख्य तर्क है कि यह कानून युवा और अनुभवहीन लड़कियों को बहकावे या जबरन धर्मांतरण से बचाएगा। उनका मानना है कि कई मामलों में लड़कियों को झूठे प्यार का झांसा देकर फंसाया जाता है और बाद में उनका उत्पीड़न होता है।
  • पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों का संरक्षण: भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता है। माता-पिता की सहमति को अनिवार्य करके, परिवार के मूल्यों और सामाजिक संरचना को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।
  • धोखाधड़ी पर रोक: सरकार और इसके समर्थकों का मानना है कि यह कानून उन धोखेबाजों को रोकेगा जो पहचान छिपाकर या धर्म बदलकर विवाह करते हैं, जिससे बाद में गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं।
  • मौजूदा कानून को मजबूती: उनका तर्क है कि मौजूदा धर्मांतरण विरोधी कानून पर्याप्त नहीं हैं और विवाह पंजीकरण में सहमति अनिवार्य करके 'लव जिहाद' की कथित समस्या को जड़ से खत्म किया जा सकता है।

आलोचकों के तर्क:

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: आलोचकों का सबसे मजबूत तर्क यह है कि यह कानून भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार), अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव पर रोक) का उल्लंघन करता है। एक वयस्क व्यक्ति को अपने जीवनसाथी का चुनाव करने का अधिकार है।
  • "लव जिहाद" एक मिथक: कई सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी 'लव जिहाद' की अवधारणा को एक निराधार षड्यंत्र सिद्धांत मानते हैं, जिसका उपयोग सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने और अंतरधार्मिक विवाहों को रोकने के लिए किया जाता है। उनका कहना है कि ऐसे कानून बिना किसी ठोस सबूत के समाज को बांटते हैं।
  • महिला स्वायत्तता का हनन: यह कानून महिलाओं को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की शक्ति से वंचित करता है। यह पितृसत्तात्मक सोच को बढ़ावा देता है जहां महिलाओं को हमेशा अपने परिवार के "संरक्षण" की आवश्यकता होती है, भले ही वे वयस्क और सक्षम हों।
  • भेदभावपूर्ण और सांप्रदायिक: आलोचक इस कानून को विशेष रूप से अंतरधार्मिक विवाहों, खासकर हिंदू-मुस्लिम विवाहों को लक्षित करने वाला मानते हैं। यह एक समुदाय विशेष के खिलाफ भेदभावपूर्ण हो सकता है।
  • व्यावहारिक चुनौतियाँ और दुरुपयोग: माता-पिता की सहमति अनिवार्य होने से ऐसे जोड़े जो अंतरधार्मिक विवाह करना चाहते हैं, उन्हें अत्यधिक उत्पीड़न और परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इससे गुप्त विवाहों को बढ़ावा मिल सकता है या 'ऑनर किलिंग' जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। पुलिस और प्रशासन द्वारा भी इस कानून का दुरुपयोग किए जाने की आशंका है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का उल्लंघन: सर्वोच्च न्यायालय ने कई फैसलों में वयस्क व्यक्तियों के अपनी पसंद से शादी करने के अधिकार को मौलिक अधिकार माना है। इस कानून की संवैधानिक वैधता को अदालत में चुनौती मिलने की प्रबल संभावना है।

आगे क्या? कानूनी लड़ाई और सामाजिक बहस

गुजरात सरकार का यह कदम निश्चित रूप से कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर एक लंबी बहस छेड़ देगा। उम्मीद है कि इस कानून को अदालत में चुनौती दी जाएगी, जहां इसकी संवैधानिक वैधता पर गहन विचार-विमर्श होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने पहले भी वयस्क व्यक्तियों के शादी करने के अधिकार को बार-बार दोहराया है। उदाहरण के लिए, हादिया मामले (केरल 'लव जिहाद' मामला) में, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि एक वयस्क अपने जीवनसाथी का चयन करने के लिए स्वतंत्र है, भले ही उसके माता-पिता या समुदाय इस पर आपत्ति जताए। यह मुद्दा न केवल गुजरात बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण है। यह हमारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सीमाओं, राज्य के हस्तक्षेप के दायरे और 'लव जिहाद' जैसी विवादास्पद अवधारणाओं के कानूनी निहितार्थों पर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है।

निष्कर्ष: एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा

गुजरात सरकार का विवाह पंजीकरण कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव, जिसमें माता-पिता की सहमति अनिवार्य है, एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा है। 'लव जिहाद' के नाम पर लाए गए इस कानून को एक तरफ जहां महिलाओं की सुरक्षा और पारिवारिक मूल्यों के संरक्षण के लिए आवश्यक बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों और महिला स्वायत्तता पर हमला करार दिया जा रहा है। आने वाले समय में, यह देखना दिलचस्प होगा कि यह प्रस्ताव कैसे आगे बढ़ता है और भारतीय न्यायपालिका इस पर क्या रुख अपनाती है। निश्चित रूप से, यह सिर्फ एक कानूनी बदलाव नहीं है, बल्कि भारतीय समाज और इसके नागरिकों के अधिकारों पर एक गहरा प्रभाव डालने वाला कदम है। आप इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर क्या सोचते हैं? क्या आपको लगता है कि माता-पिता की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए? या यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है? अपने विचार कमेंट सेक्शन में हमारे साथ साझा करें। इस खबर और ऐसे ही अन्य महत्वपूर्ण अपडेट्स के लिए Viral Page को फॉलो करें और इस लेख को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें ताकि यह बहस आगे बढ़ सके!

स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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