Trade to critical minerals: India, Brazil for a stronger Global South
यह सिर्फ एक शीर्षक नहीं, बल्कि बदलती हुई विश्व व्यवस्था का एक स्पष्ट संकेत है। भारत और ब्राजील, दो उभरती हुई शक्तियां और 'ग्लोबल साउथ' के महत्वपूर्ण स्तंभ, वैश्विक पटल पर एक नई धुरी गढ़ने की दिशा में अग्रसर हैं। उनका यह संयुक्त आह्वान, व्यापार संबंधों को गहरा करने से लेकर भविष्य के महत्वपूर्ण खनिजों पर रणनीतिक साझेदारी बनाने तक फैला है, जिसका उद्देश्य 'ग्लोबल साउथ' को अधिक मजबूत और प्रभावशाली बनाना है।क्या हुआ?
हाल ही में, अंतरराष्ट्रीय मंचों, विशेषकर G20 शिखर सम्मेलन और BRICS बैठकों के दौरान, भारत और ब्राजील के नेताओं ने 'ग्लोबल साउथ' के देशों की आवाज़ को बुलंद करने और उनके हितों की रक्षा के लिए गहन सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। दोनों देशों ने न केवल द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने पर सहमति व्यक्त की, बल्कि महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा संक्रमण, खाद्य सुरक्षा और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। यह सिर्फ बातचीत नहीं थी, बल्कि एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन था कि अब 'ग्लोबल साउथ' केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार बनना चाहता है।Photo by Teslariu Mihai on Unsplash
पृष्ठभूमि: ग्लोबल साउथ और भारत-ब्राजील की भूमिका
'ग्लोबल साउथ' शब्द उन देशों को संदर्भित करता है जो आमतौर पर आर्थिक रूप से कम विकसित हैं या विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ हैं, और जो भौगोलिक रूप से मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध में स्थित हैं (हालांकि यह पूरी तरह से भौगोलिक नहीं है)। इसमें लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, एशिया (इज़राइल, जापान और दक्षिण कोरिया को छोड़कर) और ओशिनिया के विकासशील देश शामिल हैं। शीत युद्ध के दौरान, इन देशों ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के तहत अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश की। उनका लक्ष्य महाशक्तियों के बीच टकराव से बचना और अपने विकास के एजेंडे पर ध्यान केंद्रित करना था। आज 'ग्लोबल साउथ' की अवधारणा भौगोलिक से अधिक राजनीतिक और आर्थिक है, जो समान विकास चुनौतियों और वैश्विक शासन में अधिक न्यायसंगत हिस्सेदारी की इच्छा को दर्शाती है। भारत और ब्राजील इस 'ग्लोबल साउथ' के स्वाभाविक नेता हैं।- भारत: दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, भारत अपनी बढ़ती जनसंख्या, तकनीकी प्रगति और वैश्विक मंचों पर मुखर आवाज़ के लिए जाना जाता है।
- ब्राजील: लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और कृषि शक्ति, ब्राजील भी प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
क्यों यह मुद्दा ट्रेंड कर रहा है?
यह मुद्दा कई कारणों से आज वैश्विक चर्चा के केंद्र में है: 1. बदलती भू-राजनीतिक व्यवस्था: एकध्रुवीय विश्व से बहुध्रुवीय विश्व की ओर संक्रमण हो रहा है। चीन का उदय, रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी देशों की बदलती प्राथमिकताएँ 'ग्लोबल साउथ' के लिए अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर प्रस्तुत करती हैं। 2. आपूर्ति श्रृंखला की भेद्यता: COVID-19 महामारी और भू-राजनीतिक तनावों ने दिखाया है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ कितनी नाजुक हो सकती हैं। महत्वपूर्ण खनिजों और अन्य आवश्यक वस्तुओं के लिए कुछ ही देशों पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम भरी है। भारत और ब्राजील, अपने स्वयं के संसाधनों और क्षमताओं के साथ, इन श्रृंखलाओं को मजबूत और विविध बनाना चाहते हैं। 3. हरित ऊर्जा संक्रमण: दुनिया जलवायु परिवर्तन का सामना कर रही है और हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक वाहन (EVs), सौर पैनल, पवन टर्बाइन - इन सभी को लिथियम, कोबाल्ट, निकल, ग्रेफाइट और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की आवश्यकता होती है। जो देश इन खनिजों का उत्पादन या प्रसंस्करण नियंत्रित करते हैं, वे भविष्य की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण शक्ति रखेंगे। 4. आर्थिक आत्मनिर्भरता की चाह: 'ग्लोबल साउथ' के देश अब सिर्फ कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता या तैयार माल के उपभोक्ता नहीं रहना चाहते। वे अपनी अर्थव्यवस्थाओं को विविधीकृत करना चाहते हैं, विनिर्माण क्षमता बढ़ाना चाहते हैं और मूल्य श्रृंखला में ऊपर उठना चाहते हैं। 5. वैश्विक शासन में प्रतिनिधित्व: 'ग्लोबल साउथ' का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी वैश्विक संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व कम है। भारत और ब्राजील जैसे देश इन मंचों पर अधिक न्यायसंगत और समावेशी प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं।आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभाव
भारत और ब्राजील के इस सहयोग के दूरगामी आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभाव हो सकते हैं: * आर्थिक विविधीकरण और विकास: यह साझेदारी दोनों देशों के लिए नए व्यापार मार्ग खोलेगी, निवेश को बढ़ावा देगी और विशेष रूप से महत्वपूर्ण खनिजों के मूल्यवर्धन में मदद करेगी। इससे उनकी अर्थव्यवस्थाओं को मजबूती मिलेगी और वे केवल कृषि या सेवा क्षेत्र पर निर्भर नहीं रहेंगे। * आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा: एक-दूसरे के साथ सहयोग करके, वे महत्वपूर्ण खनिजों और अन्य रणनीतिक वस्तुओं की आपूर्ति के लिए वैकल्पिक स्रोत और बाजार बना सकते हैं, जिससे बाहरी झटकों के प्रति उनकी भेद्यता कम होगी। * तकनीकी सहयोग और हस्तांतरण: दोनों देश नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि प्रौद्योगिकी और डिजिटल परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में अपनी विशेषज्ञता साझा कर सकते हैं, जिससे दोनों को लाभ होगा। * 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ को मजबूती: जब भारत और ब्राजील जैसे बड़े देश एकजुट होते हैं, तो वे वैश्विक मंचों पर 'ग्लोबल साउथ' के हितों की बेहतर पैरवी कर सकते हैं। यह उन्हें विकसित देशों के सामने एक मजबूत बातचीत की स्थिति में रखेगा। * नई भू-राजनीतिक धुरी: यह सहयोग एक नई भू-राजनीतिक धुरी का निर्माण कर सकता है, जो केवल पश्चिमी या पूर्वी शक्तियों पर केंद्रित नहीं होगी, बल्कि एक अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में योगदान देगी।महत्वपूर्ण खनिज: भविष्य की कुंजी
आज की दुनिया में, तेल और गैस की तरह ही महत्वपूर्ण खनिज भी रणनीतिक महत्व रखते हैं। ये खनिज आधुनिक प्रौद्योगिकी के हर पहलू में निहित हैं:- लिथियम और कोबाल्ट: इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों में।
- दुर्लभ पृथ्वी तत्व: स्मार्टफोन, कंप्यूटर, मिसाइल सिस्टम और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में।
- कॉपर और निकल: इलेक्ट्रिकल वायरिंग और बैटरी में।
चुनौतियाँ और अवसर: दोनों पहलू
यह साझेदारी बेशक असीम संभावनाएं रखती है, लेकिन इसमें कुछ चुनौतियाँ भी हैं:अवसर:
- आर्थिक संप्रभुता: 'ग्लोबल साउथ' के देशों को अपनी आर्थिक नियति का निर्धारण करने में अधिक स्वतंत्रता मिलेगी।
- तकनीकी विकास: साझा अनुसंधान और विकास से दोनों देशों में नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।
- जलवायु परिवर्तन से मुकाबला: हरित ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति से जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।
- बहुपक्षवाद का सुदृढीकरण: यह सहयोग एक ऐसे वैश्विक व्यवस्था को बढ़ावा देगा जो अधिक समावेशी और विविध है।
चुनौतियाँ:
- वित्तपोषण और निवेश: खनिजों के उत्खनन, प्रसंस्करण और संबंधित बुनियादी ढांचे के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी।
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण: महत्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण में उन्नत तकनीक की आवश्यकता होती है, जो अभी भी कुछ ही देशों के पास केंद्रित है।
- पर्यावरणीय चिंताएँ: खनन गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना और सतत खनन प्रथाओं को अपनाना एक बड़ी चुनौती है।
- भू-राजनीतिक दबाव: विकसित देश, जो इन खनिजों के मौजूदा आपूर्ति श्रृंखलाओं पर हावी हैं, इस नई साझेदारी को चुनौती दे सकते हैं।
- 'ग्लोबल साउथ' के भीतर एकता: 'ग्लोबल साउथ' कोई सजातीय समूह नहीं है; इसमें विभिन्न हित और प्राथमिकताएँ हैं। सर्वसम्मत सहयोग प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
आगे क्या?
भारत और ब्राजील का यह साझा दृष्टिकोण एक मजबूत 'ग्लोबल साउथ' के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह केवल द्विपक्षीय व्यापार समझौतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संभवतः भविष्य में 'ग्लोबल साउथ' के अन्य देशों को भी इस साझेदारी में शामिल होने के लिए प्रेरित करेगा। यह सहयोग संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और G20 जैसे बहुपक्षीय मंचों पर 'ग्लोबल साउथ' की सामूहिक आवाज़ को और सशक्त करेगा, जिससे वैश्विक शासन में अधिक संतुलन और न्याय सुनिश्चित हो सकेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह साझेदारी कैसे विकसित होती है और 'ग्लोबल साउथ' की सामूहिक महत्वाकांक्षाओं को कितनी सफलतापूर्वक साकार कर पाती है। लेकिन एक बात निश्चित है: भारत और ब्राजील, अपने साझा विज़न के साथ, भविष्य की वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं। आपको यह लेख कैसा लगा? क्या आप भारत और ब्राजील की इस पहल को 'ग्लोबल साउथ' के लिए गेम-चेंजर मानते हैं? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार साझा करें! इस जानकारी को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें, ताकि वे भी इस महत्वपूर्ण विषय पर जागरूक हो सकें। और हाँ, ऐसे ही और दिलचस्प और ज्ञानवर्धक लेखों के लिए 'Viral Page' को फॉलो करना न भूलें!स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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