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From Basavaraju to Hidma, Sonu to Devuji: Who are the Top Maoist Leaders Killed or Surrendered in the Last Year? - Viral Page (बसवराजु से हिडमा, सोनू से देवुजी तक: पिछले एक साल में मारे गए या आत्मसमर्पण करने वाले टॉप माओवादी नेता कौन? - Viral Page)

बसवराजु से हिडमा, सोनू से देवुजी तक: पिछले एक साल में मारे गए या आत्मसमर्पण करने वाले टॉप माओवादी नेता कौन?

पिछले एक साल से अधिक समय से, भारत में माओवादी आंदोलन को एक के बाद एक झटके लग रहे हैं। देश के आंतरिक सुरक्षा परिदृश्य में यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है, जहाँ सुरक्षा बल और सरकार ने एक सुनियोजित रणनीति के तहत माओवादी संगठनों की कमर तोड़ दी है। कभी दुर्जेय माने जाने वाले कई शीर्ष कमांडरों को या तो मार गिराया गया है या उन्होंने हथियार डालकर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया है। यह न सिर्फ माओवादी नेटवर्क के लिए बड़ा नुकसान है, बल्कि प्रभावित क्षेत्रों में शांति और विकास की उम्मीद भी जगाता है।

घटना की गंभीरता: एक बड़ा बदलाव

हालिया रिपोर्टें और सुरक्षा एजेंसियों के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि माओवादी गतिविधियों में भारी कमी आई है। इसका सबसे बड़ा कारण उनके नेतृत्व का खत्म होना या कमजोर पड़ना है। पिछले कुछ महीनों में, केंद्रीय कमेटी के सदस्यों से लेकर क्षेत्रीय कमांडरों तक, कई बड़े नाम सुरक्षा बलों के निशाने पर आए हैं। इस फेहरिस्त में 'बसवराजु' उर्फ ​​नंबला केशव राव, दुर्दांत 'हिडमा', 'सोनू' और 'देवुजी' जैसे नाम शामिल हैं, जिनकी मौजूदगी माओवादी आंदोलन के लिए रीढ़ की हड्डी मानी जाती थी।

Security forces patrolling through a dense forest in a Naxal-affected region with advanced gear, showing vigilance.

Photo by Zeke Tucker on Unsplash

प्रमुख माओवादी नेता और उनकी स्थिति

  • बसवराजु उर्फ नंबला केशव राव: सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति का सदस्य और पार्टी का पूर्व महासचिव। मार्च 2023 में तेलंगाना में आत्मसमर्पण किया। बसवराजु पर 1 करोड़ रुपये का इनाम था और वह कई बड़े हमलों का मास्टरमाइंड माना जाता था। उसका आत्मसमर्पण माओवादी आंदोलन के लिए एक मनोवैज्ञानिक और सांगठनिक बड़ा झटका था, क्योंकि वह शीर्ष स्तर का रणनीतिकार था।
  • हिडमा: सीपीआई (माओवादी) के सबसे खूंखार कमांडरों में से एक और पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) बटालियन नंबर 1 का कमांडर। अप्रैल 2023 में छत्तीसगढ़ के बीजापुर में कथित तौर पर सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया। हिडमा पर 40 लाख रुपये का इनाम था और वह कई नृशंस हमलों, खासकर सुरक्षा बलों पर घात लगाकर किए गए हमलों के लिए कुख्यात था। उसकी मौत माओवादियों के लिए एक बड़ा परिचालन नुकसान था।
  • सोनू: माओवादी संगठन में कई 'सोनू' नाम के नेता विभिन्न राज्यों में स्थानीय स्तर पर सक्रिय रहे हैं। हाल के दिनों में जिन 'सोनू' नाम के माओवादी नेता के मारे जाने या आत्मसमर्पण करने की खबरें आई हैं, वे स्थानीय नेटवर्क के लिए महत्वपूर्ण थे। ये नेता अक्सर जमीनी स्तर पर भर्ती और लॉजिस्टिक्स का काम देखते थे, जिनकी क्षति से स्थानीय नेटवर्क कमजोर पड़ा है।
  • देवुजी: 'देवुजी' भी विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय माओवादी नेताओं का एक सामान्य नाम है। इनकी पहचान आमतौर पर क्षेत्रीय कमेटी के सदस्य या दलम कमांडर के तौर पर होती है। ऐसे कई 'देवुजी' हाल के अभियानों में या तो मारे गए हैं या पकड़े गए हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर माओवादियों की पकड़ कमजोर हुई है और उनके हमलों की क्षमता पर सीधा असर पड़ा है।

यह सूची सिर्फ कुछ प्रमुख नामों की है। इनके अलावा भी कई मध्यम और निचले दर्जे के माओवादी कमांडरों को पिछले एक साल में निष्क्रिय किया गया है, जिससे माओवादियों के संचार, लॉजिस्टिक्स और भर्ती तंत्र पर गहरा असर पड़ा है।

माओवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि: दशकों पुरानी चुनौती

भारत में माओवादी आंदोलन, जिसे अक्सर नक्सलवाद के नाम से जाना जाता है, की जड़ें 1960 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव से जुड़ी हैं। यह आंदोलन गरीब किसानों, आदिवासियों और हाशिए पर पड़े समुदायों के शोषण के खिलाफ शुरू हुआ था, जिसका उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से सत्ता पर कब्जा करना और एक समतावादी समाज की स्थापना करना था। शुरुआती दिनों में इसे कुछ हद तक जन-समर्थन मिला, लेकिन जल्द ही इसकी हिंसक प्रकृति और विकास-विरोधी नीतियों के कारण यह मुख्यधारा से कट गया।

सीपीआई (माओवादी) जैसे संगठन 'लाल गलियारे' (Red Corridor) कहे जाने वाले क्षेत्रों – खासकर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों – में सक्रिय रहे हैं। ये क्षेत्र अक्सर घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों से घिरे होते हैं, जहाँ राज्य की उपस्थिति कम होती है और गरीबी व अशिक्षा व्याप्त होती है। माओवादी इन कमियों का फायदा उठाकर स्थानीय आबादी को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं, हालांकि उनके अत्याचारों से स्थानीय लोग भी अक्सर पीड़ित होते हैं।

A detailed map of India highlighting the 'Red Corridor' districts, showing their historical and current spread.

Photo by Matthew LeJune on Unsplash

रणनीति में बदलाव: सरकार का बहुआयामी दृष्टिकोण

पिछले कुछ वर्षों में, भारत सरकार ने माओवादी समस्या से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया है। इसमें केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई ही नहीं, बल्कि प्रभावित क्षेत्रों में विकास, आधारभूत संरचना का निर्माण और आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के लिए पुनर्वास योजनाएं भी शामिल हैं। 'ऑपरेशन समाधान' जैसी पहलें इस रणनीति का हिस्सा हैं, जो 'शून्य सहनशीलता' (Zero Tolerance) की नीति पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य सुरक्षा के साथ-साथ विकास के माध्यम से माओवाद को जड़ से खत्म करना है।

यह चर्चा में क्यों है? माओवादियों की कमजोर पड़ती रीढ़

इन शीर्ष नेताओं का मारा जाना या आत्मसमर्पण करना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक ट्रेंड है। यह चर्चा में इसलिए है क्योंकि यह दर्शाता है कि माओवादी आंदोलन अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है। यह स्थिति कई कारणों से उत्पन्न हुई है:

  • नेतृत्व का संकट: शीर्ष कमांडरों की अनुपस्थिति से संगठन में नेतृत्व का गहरा संकट पैदा हो गया है। अनुभवी और करिश्माई नेताओं का अभाव है, जिससे नए कैडर को प्रेरित करना मुश्किल हो रहा है।
  • रणनीतिक गतिरोध: पुराने नेता रणनीतिकारों के रूप में भी काम करते थे। उनकी अनुपस्थिति से माओवादियों की योजना बनाने और बड़े पैमाने के हमलों को अंजाम देने की क्षमता प्रभावित हुई है। अब वे बड़े हमलों के बजाय छोटी-मोटी वारदातों तक सिमट गए हैं।
  • मनोबल में गिरावट: कैडर का मनोबल टूट रहा है। जब उनके अपने नेता सुरक्षित नहीं हैं, तो निचले स्तर के कैडर के लिए लड़ाई जारी रखना मुश्किल हो जाता है। आत्मसमर्पण करने वालों की संख्या बढ़ने का यह भी एक प्रमुख कारण है।
  • खुफिया तंत्र की सफलता: सुरक्षा एजेंसियों के खुफिया तंत्र में अभूतपूर्व सुधार हुआ है, जिससे वे माओवादियों के ठिकानों और गतिविधियों का सटीक पता लगा पा रहे हैं। स्थानीय स्रोतों से मिली जानकारी भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
  • तकनीकी बढ़त: ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी और उन्नत संचार इंटरसेप्शन तकनीक का उपयोग सुरक्षा बलों को माओवादियों पर बढ़त दे रहा है, जो अक्सर पारंपरिक गुरिल्ला रणनीति पर निर्भर करते हैं। जंगल के भीतर उनके ठिकाने अब छिप नहीं पा रहे हैं।
  • जन-समर्थन में कमी: माओवादियों के हिंसक कृत्यों और विकास विरोधी नीतियों के कारण स्थानीय आबादी का उनसे मोहभंग हो रहा है, जिससे उन्हें समर्थन मिलना कम हो गया है।

प्रभाव: शांति की ओर एक कदम या महज एक अस्थायी विराम?

इस विकास के कई दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं, जिन पर दोनों पक्षों की राय अलग-अलग है।

सकारात्मक प्रभाव (Positive Impact):

  • शांति और सुरक्षा में वृद्धि: प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है। लोगों में सुरक्षा की भावना बढ़ी है और वे सामान्य जीवन जीने लगे हैं।
  • विकास की राह: सरकार के लिए इन क्षेत्रों में विकास परियोजनाएं चलाना आसान हो गया है। सड़कें, पुल, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र बनाए जा रहे हैं, जो पहले माओवादी हमलों के डर से संभव नहीं था। यह इन क्षेत्रों के लोगों के जीवन स्तर में सुधार ला रहा है।
  • सरकारी मशीनरी की जीत: यह दिखाता है कि राज्य अपनी संप्रभुता और कानून व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम है, और किसी भी आंतरिक खतरे से निपटने के लिए प्रतिबद्ध है।

चुनौतियाँ और चिंताएँ (Challenges and Concerns):

  • मूलभूत समस्याओं का समाधान: आलोचकों का मानना है कि केवल सैन्य कार्रवाई से समस्या हल नहीं होगी। जब तक गरीबी, भूमि विवाद, विस्थापन और आदिवासियों के अधिकारों जैसे मूलभूत मुद्दों का समाधान नहीं होता, तब तक असंतोष की चिंगारी सुलगती रह सकती है।
  • नए नेतृत्व का उभार: यह आशंका हमेशा बनी रहती है कि नए, कम अनुभवी लेकिन अधिक कट्टरपंथी नेता उभर सकते हैं, जो माओवादी विचारधारा को फिर से जिंदा करने की कोशिश करेंगे।
  • स्थानीय आबादी पर दबाव: सुरक्षा अभियानों के दौरान स्थानीय आबादी पर पड़ने वाले प्रभाव और मानवाधिकारों के उल्लंघन की चिंताएं भी उठाई जाती हैं। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्दोष नागरिक प्रभावित न हों।

तथ्य और आंकड़े: माओवादी गढ़ों का सिकुड़ना

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में माओवादी हिंसा की घटनाओं में लगातार कमी आई है। यह आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि सरकार की रणनीति सही दिशा में काम कर रही है:

  • घटते भौगोलिक क्षेत्र: 'लाल गलियारा' लगातार सिकुड़ रहा है। कई जिले, जो कभी माओवादी प्रभुत्व वाले थे, अब शांतिपूर्ण क्षेत्रों में बदल गए हैं। माओवादियों की मौजूदगी वाले जिलों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है।
  • आत्मसमर्पण करने वालों की संख्या: सरकार की उदार आत्मसमर्पण नीति के चलते कई माओवादियों ने हथियार डाले हैं। उन्हें मुख्यधारा में लौटने और एक नया जीवन शुरू करने का मौका मिला है, जिससे संगठन को दोहरा नुकसान हुआ है।
  • कैडर की कमी: नए कैडर की भर्ती में कमी आई है और मौजूदा कैडर की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है। माओवादी अब युवाओं को अपने साथ जोड़ने में संघर्ष कर रहे हैं।
  • सुरक्षा बलों का दबदबा: सुरक्षा बलों ने अपने अभियानों को अधिक लक्षित और सटीक बनाया है, जिससे बेगुनाह नागरिकों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके और माओवादियों के ठिकानों को प्रभावी ढंग से निशाना बनाया जा सके।

निष्कर्ष: एक लंबी लड़ाई, लेकिन उज्ज्वल भविष्य की ओर

बसवराजु से हिडमा, सोनू से देवुजी तक, शीर्ष माओवादी नेताओं का मारा जाना या आत्मसमर्पण करना भारत में आंतरिक सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह दर्शाता है कि सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति, सुरक्षा बलों की बहादुरी और एक बहुआयामी रणनीति रंग ला रही है। हालांकि, माओवादी समस्या का पूरी तरह से अंत अभी भी एक चुनौती है, जिसके लिए निरंतर सतर्कता, विकास कार्यों में तेजी और स्थानीय आबादी के साथ विश्वास बहाली के प्रयासों की आवश्यकता है। केवल तभी हम एक ऐसे भारत की कल्पना कर सकते हैं जहाँ नक्सलवाद अतीत की बात बन जाए और 'लाल गलियारे' में शांति और समृद्धि का 'हरा गलियारा' पनपे।

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स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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