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Fire in the Middle East: Israel-Iran Tensions and India's 'Deep Concern' – What's Next? - Viral Page (मध्य पूर्व में आग: इजरायल-ईरान तनाव और भारत की 'गहरी चिंता' – क्या होगा अगला कदम? - Viral Page)

‘गहरी चिंता’: भारत ने इजरायल-ईरान तनाव के बाद संयम बरतने का किया आग्रह

मध्य पूर्व, जो पहले से ही अस्थिरता का शिकार है, एक बार फिर बड़े युद्ध के मुहाने पर खड़ा दिख रहा है। इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने दुनिया भर की सरकारों को चिंता में डाल दिया है, और भारत भी इससे अछूता नहीं है। हाल ही में ईरान पर हुए कथित इजरायली हमलों के बाद, भारत ने तुरंत ‘गहरी चिंता’ व्यक्त की है और सभी पक्षों से ‘संयम बरतने’ की अपील की है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब इजरायल और ईरान दशकों पुरानी दुश्मनी को एक नए और खतरनाक मोड़ पर ले आए हैं, जिससे वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

क्या हुआ: एक खतरनाक सप्ताह की पूरी कहानी

ताजा संकट की शुरुआत 1 अप्रैल को हुई, जब सीरिया की राजधानी दमिश्क में स्थित ईरानी वाणिज्य दूतावास पर एक हवाई हमला हुआ। इस हमले में ईरान के इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के दो शीर्ष कमांडरों सहित कई अधिकारी मारे गए। ईरान ने इस हमले के लिए सीधे इजरायल को जिम्मेदार ठहराया और बदला लेने की कसम खाई। इजरायल ने इस हमले की जिम्मेदारी न तो स्वीकार की और न ही इससे इनकार किया, लेकिन यह व्यापक रूप से माना गया कि यह हमला इजरायल द्वारा ही किया गया था।
ठीक दो हफ्ते बाद, 13 अप्रैल की रात को, ईरान ने दमिश्क हमले का बदला लेते हुए इजरायल पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलों से हमला किया। यह पहला मौका था जब ईरान ने अपनी जमीन से सीधे इजरायल पर हमला किया था। हालांकि, इजरायल ने अपने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जॉर्डन जैसे सहयोगियों की मदद से इन हमलों में से अधिकांश को हवा में ही नाकाम कर दिया, जिससे जान-माल का बड़ा नुकसान टल गया।
दुनिया ने राहत की सांस ली थी, लेकिन यह शांति ज्यादा देर नहीं टिक पाई। 19 अप्रैल को, इजरायल ने ईरान के हमले के जवाब में जवाबी कार्रवाई की। ईरान के इस्फाहान प्रांत के पास कुछ हवाई ठिकानों को निशाना बनाने की खबरें आईं। रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने छोटे ड्रोनों का इस्तेमाल किया और ईरान ने दावा किया कि उनके एयर डिफेंस सिस्टम ने इन ड्रोनों को मार गिराया और कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। हालांकि, इस हमले ने यह स्पष्ट कर दिया कि टकराव का यह सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ है। भारत ने इन सभी घटनाओं पर बारीकी से नजर रखी और इजरायल के जवाबी हमले के बाद तुरंत अपनी चिंता व्यक्त करते हुए संयम बरतने का आग्रह किया। भारत की विदेश मंत्रालय ने कहा कि क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि सभी पक्ष तनाव बढ़ाने से बचें।
मध्य पूर्व के नक्शे पर ईरान और इजरायल के बीच बढ़ती शत्रुता को दर्शाते तीर। पृष्ठभूमि में कुछ क्षतिग्रस्त इमारतें और धुएं के गुबार।

Photo by Arin Melikyan on Unsplash

पृष्ठभूमि: दुश्मनी की जड़ें और मौजूदा भू-राजनीति

इजरायल और ईरान के बीच की दुश्मनी दशकों पुरानी है। 1979 की ईरानी क्रांति से पहले, दोनों देशों के संबंध अपेक्षाकृत सामान्य थे। लेकिन क्रांति के बाद, ईरान में इस्लामी शासन आने के बाद से इजरायल को एक "जायोनी सत्ता" के रूप में देखा जाने लगा और उसके अस्तित्व को चुनौती दी जाने लगी।
इन दोनों देशों के बीच टकराव के कई मुख्य कारण हैं:
  • फिलीस्तीन मुद्दा: ईरान फिलिस्तीनियों के अधिकारों का प्रबल समर्थक है और इजरायल की फिलिस्तीन नीतियों का घोर विरोधी है।
  • ईरान का परमाणु कार्यक्रम: इजरायल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है और किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना चाहता है।
  • क्षेत्रीय प्रभुत्व: दोनों ही देश मध्य पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं, जिससे वे अक्सर प्रॉक्सी युद्धों में उलझते रहते हैं। ईरान लेबनान के हिजबुल्लाह, गाजा के हमास और यमन के हूतियों जैसे समूहों का समर्थन करता है, जिन्हें इजरायल आतंकवादी संगठन मानता है।
  • अमेरिकी भूमिका: अमेरिका इजरायल का एक प्रमुख सहयोगी है, जिससे ईरान के साथ उसके संबंध हमेशा तनावपूर्ण रहे हैं। अमेरिका की ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों की नीति ने भी तनाव को बढ़ाया है।
गाजा में इजरायल-हमास युद्ध ने इस पूरे क्षेत्र में पहले से ही तनाव बढ़ा रखा था, और दमिश्क और फिर ईरान पर हुए हमलों ने इस आग में घी डालने का काम किया है।

क्यों यह खबर ट्रेंड कर रही है और दुनिया चिंतित है?

यह खबर सिर्फ इसलिए ट्रेंड नहीं कर रही क्योंकि यह एक सैन्य टकराव है, बल्कि इसलिए कि इसके वैश्विक स्तर पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
  1. बड़े क्षेत्रीय युद्ध का खतरा: सबसे बड़ी चिंता यह है कि इजरायल और ईरान के बीच सीधा टकराव एक पूर्ण पैमाने के क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिसमें अन्य देश भी शामिल हो सकते हैं। यह मध्य पूर्व को पूरी तरह से अस्थिर कर देगा।
  2. वैश्विक आर्थिक प्रभाव: मध्य पूर्व दुनिया की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा पूरा करता है। किसी भी बड़े संघर्ष से तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ सकती है। शिपिंग रूट्स, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), दुनिया के तेल व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है और यह युद्ध के कारण बाधित हो सकता है।
  3. मानवीय संकट: युद्ध से बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हो सकता है, जिससे लाखों लोग विस्थापित होंगे और एक बड़ा मानवीय संकट पैदा हो सकता है।
  4. भारत पर सीधा असर: भारत की ऊर्जा सुरक्षा मध्य पूर्व पर निर्भर करती है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में लाखों भारतीय प्रवासी काम करते हैं। किसी भी संघर्ष से उनके जीवन और आजीविका पर सीधा खतरा मंडराएगा और भारत को उन्हें सुरक्षित निकालने के लिए एक बड़ा अभियान चलाना पड़ सकता है।

भारत की चिंता और उसका स्टैंड: संतुलन की कूटनीति

भारत ने इजरायल-ईरान तनाव पर अपनी "गहरी चिंता" व्यक्त करके एक स्पष्ट संदेश दिया है कि वह इस क्षेत्र में किसी भी तरह की बढ़ती अस्थिरता के खिलाफ है। भारत की विदेश नीति हमेशा से शांति, संयम और बातचीत के माध्यम से विवादों को सुलझाने पर केंद्रित रही है।
भारत के लिए यह क्षेत्र कई मायनों में महत्वपूर्ण है:
  • ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 60% मध्य पूर्व से आयात करता है। किसी भी संघर्ष से तेल की आपूर्ति बाधित हो सकती है और कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • व्यापार और कनेक्टिविटी: मध्य पूर्व भारत के लिए एक महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार और कनेक्टिंग कॉरिडोर है। चाबहार बंदरगाह और अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर (INSTC) जैसी परियोजनाएं ईरान के माध्यम से भारत को मध्य एशिया और यूरोप से जोड़ती हैं।
  • भारतीय प्रवासी: खाड़ी देशों में लगभग 9 मिलियन भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो भारत को बड़ी मात्रा में प्रेषण (remittances) भेजते हैं। उनकी सुरक्षा और कल्याण भारत की प्रमुख चिंता है।
भारत का आग्रह है कि सभी पक्ष कूटनीति और बातचीत के रास्ते पर लौटें। भारत की इस तटस्थ और संतुलन साधने वाली कूटनीति का उद्देश्य न केवल क्षेत्रीय शांति सुनिश्चित करना है, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों की भी रक्षा करना है।

दोनों पक्षों के तर्क और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं

इस जटिल स्थिति में, दोनों प्रमुख खिलाड़ियों – इजरायल और ईरान – के अपने-अपने तर्क हैं:
इजरायल का पक्ष:
  • आत्मरक्षा का अधिकार: इजरायल का कहना है कि वह ईरान के अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष हमलों से अपनी रक्षा कर रहा है। ईरान के 13 अप्रैल के हमले को इजरायल ने अपनी संप्रभुता पर एक अभूतपूर्व हमला बताया और उसके जवाब में कार्रवाई करना अनिवार्य माना।
  • ईरान को संदेश: इजरायल का उद्देश्य ईरान को यह स्पष्ट संदेश देना है कि वह किसी भी हमले का जवाब देगा और ईरान को अपनी आक्रामक नीतियों से पीछे हटना होगा।
  • क्षेत्रीय स्थिरता: इजरायल का तर्क है कि ईरान की अस्थिर करने वाली गतिविधियां, प्रॉक्सी समूहों का समर्थन और परमाणु महत्वाकांक्षाएं पूरे क्षेत्र के लिए खतरा हैं।

ईरान का पक्ष:
  • प्रतिशोध का अधिकार: ईरान ने दमिश्क में अपने वाणिज्य दूतावास पर हुए हमले को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया और कहा कि 13 अप्रैल का हमला संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत आत्मरक्षा का वैध कार्य था।
  • इजरायली आक्रामकता का मुकाबला: ईरान इजरायल को एक आक्रामक शक्ति मानता है और फिलिस्तीनियों के समर्थन में अपनी भूमिका निभाता है। उनका तर्क है कि वे इजरायली अतिक्रमण और क्षेत्रीय विस्तारवाद का विरोध कर रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं:
  • संयुक्त राज्य अमेरिका: अमेरिका ने इजरायल की सुरक्षा के प्रति अपनी "लौह जैसी प्रतिबद्धता" दोहराई है, लेकिन साथ ही ईरान पर इजरायल के जवाबी हमले में सीधे शामिल होने से इनकार किया है और इजरायल को आगे तनाव न बढ़ाने की सलाह दी है।
  • संयुक्त राष्ट्र: संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सभी पक्षों से अधिकतम संयम बरतने का आह्वान किया है और कहा है कि मध्य पूर्व "अंतिम किनारे" पर है। सुरक्षा परिषद ने भी कई बैठकें की हैं।
  • जी7 देश: दुनिया के सात सबसे धनी देशों के समूह जी7 ने ईरान के इजरायल पर हमले की निंदा की है और सभी पक्षों से संयम बरतने का आग्रह किया है।
  • चीन और रूस: इन दोनों देशों ने भी संयम की अपील की है, लेकिन अमेरिकी हस्तक्षेप और इजरायली नीतियों की आलोचना में अधिक मुखर रहे हैं।

सामने आने वाले संभावित प्रभाव

यह तनाव अगर नहीं रोका गया तो इसके कई दूरगामी और विनाशकारी प्रभाव हो सकते हैं:
  • आर्थिक प्रभाव: तेल की कीमतें बढ़ना तय है, जो महंगाई को बढ़ावा देगा और वैश्विक आर्थिक वृद्धि को धीमा कर देगा। शिपिंग लागत बढ़ेगी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित होंगी।
  • भू-राजनीतिक प्रभाव: इससे मध्य पूर्व में नए गठबंधन बन सकते हैं और मौजूदा ध्रुवीकरण और गहरा हो सकता है। यह दुनिया के बड़े शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेगा।
  • मानवीय प्रभाव: युद्ध की स्थिति में बड़े पैमाने पर विस्थापन, खाद्य असुरक्षा और बुनियादी ढांचे का विनाश होगा, जिससे लाखों लोगों का जीवन प्रभावित होगा।
  • आतंकवाद का खतरा: क्षेत्रीय अस्थिरता चरमपंथी समूहों को पनपने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान कर सकती है, जिससे आतंकवाद का खतरा बढ़ सकता है।

क्या है आगे का रास्ता?

आगे का रास्ता बेहद नाजुक और अनिश्चित है। फिलहाल, सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इजरायल और ईरान आगे क्या कदम उठाते हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से अमेरिका, यूरोप, चीन और भारत जैसे देशों को इस मामले में रचनात्मक भूमिका निभानी होगी।
ज़रूरत इस बात की है कि:
  1. कूटनीति को प्राथमिकता दी जाए: सैन्य समाधान के बजाय बातचीत और कूटनीति के माध्यम से तनाव को कम करने का प्रयास किया जाए।
  2. संयम बरता जाए: दोनों पक्ष किसी भी ऐसी कार्रवाई से बचें जिससे तनाव और बढ़ सकता है।
  3. शांतिपूर्ण समाधान की तलाश: उन मूल कारणों को संबोधित किया जाए जो इस दुश्मनी को बढ़ावा दे रहे हैं, जैसे कि फिलिस्तीन मुद्दा और ईरान का परमाणु कार्यक्रम।

निष्कर्ष

इजरायल-ईरान तनाव मध्य पूर्व के लिए एक गंभीर परीक्षा का क्षण है, जिसके वैश्विक परिणाम हो सकते हैं। भारत की 'गहरी चिंता' और संयम बरतने की अपील ऐसे समय में एक महत्वपूर्ण आवाज है जब इस क्षेत्र को विवेक और शांति की सबसे ज्यादा जरूरत है। दुनिया उम्मीद कर रही है कि समझदारी और कूटनीति, प्रतिशोध और युद्ध की आग पर काबू पा लेगी, और मध्य पूर्व एक बार फिर स्थिरता और शांति की ओर बढ़ सकेगा।
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स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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