विकसित भारत का निर्माण तभी होगा जब राष्ट्र आत्मनिर्भर होगा, कहते हैं पीएम मोदी। यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि एक ऐसे भारत के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृढ़ संकल्प और व्यापक दृष्टिकोण है, जो वैश्विक मंच पर अपनी पहचान और सामर्थ्य को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहता है। यह घोषणा हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से की गई, जहां उन्होंने देश के भविष्य की नींव के रूप में 'आत्मनिर्भरता' को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल अपनी क्षमताओं पर भरोसा करके, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करके और अपनी नवाचार शक्ति को बढ़ावा देकर ही भारत एक सच्चा 'विकसित राष्ट्र' बन सकता है।
आत्मनिर्भर भारत: एक राष्ट्रीय संकल्प की पृष्ठभूमि
यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री मोदी ने आत्मनिर्भरता के महत्व पर जोर दिया है। 'आत्मनिर्भर भारत' का मंत्र कोरोना महामारी के चुनौतीपूर्ण समय में एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में उभरा, जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो गईं और हर देश को अपनी आंतरिक शक्ति पर निर्भर रहना पड़ा। यह वह समय था जब भारत ने न केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति की, बल्कि दुनिया के कई देशों को मदद भी पहुंचाई, चाहे वह दवाएं हों या वैक्सीन।ऐतिहासिक जड़ें और वर्तमान संदर्भ
- स्वदेशी आंदोलन: महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन से प्रेरणा लेते हुए, 'आत्मनिर्भर भारत' का विचार देश की आर्थिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देता है। यह बाहरी निर्भरता को कम करने और स्थानीय उत्पादों, ज्ञान और कौशल को प्रोत्साहित करने का आह्वान है।
- 'मेक इन इंडिया' और 'वोकल फॉर लोकल': 2014 में शुरू की गई 'मेक इन इंडिया' पहल का उद्देश्य भारत को विनिर्माण का वैश्विक हब बनाना था। 'वोकल फॉर लोकल' ने इस विचार को आगे बढ़ाते हुए स्थानीय उत्पादों के उपयोग और प्रचार को प्रोत्साहित किया। ये सभी पहलें 'आत्मनिर्भर भारत' के विशाल वृक्ष की शाखाएं हैं।
- वैश्विक भू-राजनीति: वर्तमान विश्व में, भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। व्यापार युद्ध, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और रणनीतिक स्वायत्तता की बढ़ती आवश्यकता ने सभी देशों को अपनी आंतरिक क्षमताओं को मजबूत करने पर विचार करने पर मजबूर किया है। भारत भी इस वैश्विक परिदृश्य में अपनी जगह बनाने और किसी भी बाहरी दबाव से अप्रभावित रहने के लिए आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दे रहा है।
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यह बयान क्यों ट्रेंड कर रहा है?
प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और तेजी से तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। ऐसे में, यह बयान कई कारणों से सुर्खियों में है और चर्चा का विषय बना हुआ है:- विकास की नई परिभाषा: 'विकसित भारत' का लक्ष्य केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक प्रगति, तकनीकी नवाचार, मजबूत सुरक्षा और एक समृद्ध सांस्कृतिक पहचान भी शामिल है। आत्मनिर्भरता को इस समग्र विकास की कुंजी के रूप में देखना एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है।
- युवाओं में उत्साह: देश का युवा वर्ग, जो स्टार्टअप्स, नवाचार और उद्यमिता में सक्रिय है, इस संदेश को एक अवसर के रूप में देख रहा है। यह उन्हें अपने विचारों को जमीन पर उतारने और देश के विकास में सीधे योगदान देने के लिए प्रेरित करता है।
- भू-रणनीतिक महत्व: रक्षा, अंतरिक्ष और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता देश की संप्रभुता और रणनीतिक स्वतंत्रता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह भारत को वैश्विक मंच पर एक मजबूत और स्वतंत्र आवाज देता है।
- स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: यह बयान न केवल बड़े उद्योगों को बल्कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) और स्थानीय कारीगरों को भी सशक्त बनाने पर केंद्रित है, जिससे जमीनी स्तर पर रोजगार सृजन होता है।
आत्मनिर्भरता का बहुआयामी प्रभाव
आत्मनिर्भरता का लक्ष्य केवल आयात कम करना नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सोच है जिसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं:1. आर्थिक प्रभाव:
- विनिर्माण और निर्यात में वृद्धि: 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत, सरकार उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दे रही है। इससे न केवल घरेलू मांग पूरी होती है, बल्कि निर्यात को भी बढ़ावा मिलता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता है।
- रोजगार सृजन: विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में घरेलू क्षमता बढ़ने से बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होते हैं, खासकर कुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए।
- अनुसंधान और विकास (R&D): आत्मनिर्भरता का लक्ष्य तकनीकी नवाचार और R&D में निवेश को प्रोत्साहित करता है, जिससे भारत अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकियों में अग्रणी बन सके।
- राजकोषीय स्थिरता: आयात पर निर्भरता कम होने से व्यापार घाटा कम होता है और देश की आर्थिक स्थिरता बढ़ती है।
2. सामाजिक प्रभाव:
- कौशल विकास: घरेलू उद्योगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कौशल विकास कार्यक्रमों पर जोर दिया जाता है, जिससे कार्यबल की गुणवत्ता में सुधार होता है।
- उद्यमिता को बढ़ावा: सरकार की विभिन्न योजनाएं और 'स्टार्टअप इंडिया' जैसी पहलें युवा उद्यमियों को अपने व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, जिससे एक मजबूत उद्यमिता पारिस्थितिकी तंत्र बनता है।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सशक्तिकरण: 'वोकल फॉर लोकल' और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने से ग्रामीण और कुटीर उद्योगों को लाभ होता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास होता है।
3. भू-राजनीतिक प्रभाव:
- रणनीतिक स्वायत्तता: रक्षा उपकरणों से लेकर महत्वपूर्ण खनिजों तक, आत्मनिर्भरता भारत को बाहरी देशों पर अपनी रणनीतिक निर्भरता कम करने में मदद करती है, जिससे उसकी भू-राजनीतिक स्थिति मजबूत होती है।
- विश्वसनीय वैश्विक भागीदार: जब भारत अपनी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम होता है, तो वह एक विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला भागीदार के रूप में उभरे सकता है, जिससे अन्य देशों के साथ उसके संबंध मजबूत होते हैं।
तथ्य और आंकड़े आत्मनिर्भरता की कहानी
'आत्मनिर्भर भारत' की यात्रा ने कई क्षेत्रों में ठोस परिणाम दिखाए हैं:- रक्षा उत्पादन: भारत अब रक्षा उपकरणों का एक प्रमुख आयातक होने के बजाय, एक निर्यातक बनने की राह पर है। पिछले कुछ वर्षों में रक्षा निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण: मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के विनिर्माण में भारत ने जबरदस्त प्रगति की है, जिससे वह दुनिया के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक बन गया है।
- स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र: भारत दुनिया के तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र का घर है, जिसमें हजारों स्टार्टअप नए समाधान और रोजगार पैदा कर रहे हैं।
- नवीकरणीय ऊर्जा: सौर ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में भारत का बढ़ता निवेश उसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रहा है।
दोनों पक्ष: अवसर और चुनौतियाँ
आत्मनिर्भरता का मार्ग अवसरों से भरा है, लेकिन इसमें कुछ चुनौतियां भी हैं जिन पर ध्यान देना आवश्यक है।अवसर:
- विशाल घरेलू बाजार: भारत की बड़ी आबादी एक विशाल घरेलू बाजार प्रदान करती है, जो स्थानीय उत्पादों के लिए एक मजबूत आधार है।
- जनसांख्यिकीय लाभांश: भारत की युवा आबादी एक विशाल और गतिशील कार्यबल प्रदान करती है, जो नवाचार और उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
- डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर: भारत का मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे कि UPI और आधार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और सेवा वितरण में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता है।
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का पुनर्गठन: चीन पर निर्भरता कम करने की वैश्विक प्रवृत्ति भारत के लिए विनिर्माण और आपूर्ति श्रृंखला में अपनी स्थिति मजबूत करने का एक बड़ा अवसर है।
चुनौतियाँ:
- गुणवत्ता और लागत: घरेलू उत्पादों को वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने के लिए गुणवत्ता और लागत-प्रभावशीलता दोनों में सुधार करना होगा।
- तकनीकी खाई: कुछ उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में भारत को अभी भी काफी प्रगति करनी है। इसके लिए R&D में भारी निवेश और वैश्विक सहयोग की आवश्यकता होगी।
- संरक्षणवाद का खतरा: आत्मनिर्भरता को अक्सर संरक्षणवाद के रूप में देखा जा सकता है, जिससे व्यापार बाधाएं बढ़ सकती हैं। भारत को वैश्विक व्यापार से अलगाव के बिना आत्मनिर्भरता हासिल करने का संतुलन साधना होगा।
- अवसंरचना और कौशल की कमी: विश्व स्तरीय विनिर्माण के लिए उन्नत अवसंरचना और अत्यधिक कुशल कार्यबल की निरंतर आवश्यकता बनी रहेगी।
निष्कर्ष: एक साझा यात्रा
प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन कि "विकसित भारत का निर्माण तभी होगा जब राष्ट्र आत्मनिर्भर होगा" एक दूरदर्शी और व्यावहारिक सोच का प्रतीक है। यह सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक की एक साझा यात्रा है। हमें स्थानीय उत्पादों को अपनाने, नवाचार को बढ़ावा देने और एक मजबूत, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था बनाने के लिए मिलकर काम करना होगा। यह एक दीर्घकालिक लक्ष्य है जिसके लिए निरंतर प्रयास, सही नीतियां और सामूहिक संकल्प की आवश्यकता है। आत्मनिर्भर भारत केवल आर्थिक आंकड़ों की बात नहीं, बल्कि एक ऐसे भारत की परिकल्पना है जो अपनी क्षमताओं पर गर्व करता है, अपनी चुनौतियों का सामना करता है और एक मजबूत, स्वतंत्र एवं विकसित राष्ट्र के रूप में विश्व का नेतृत्व करता है। यह तभी संभव है जब हम सब मिलकर इस लक्ष्य की ओर बढ़ें। यह लेख आपको कैसा लगा? कमेंट करके अपनी राय दें और इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें। ऐसे ही और दिलचस्प और ज्ञानवर्धक कंटेंट के लिए, "Viral Page" को फॉलो करना न भूलें!स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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