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Demolition of Maoist Memorials in Bastar: The Story of State's Return 'Brick by Brick' - Viral Page (बस्तर में माओवादी स्मारकों का ध्वस्तीकरण: ‘ईंट दर ईंट’ राज्य की वापसी की कहानी - Viral Page)

‘Brick by brick’: Behind the ‘conscious decision’ to demolish Maoist memorials in Bastar

बस्तर, जिसे कभी भारत के सबसे अशांत और दुर्गम क्षेत्रों में से एक माना जाता था, आज एक ऐसी परिवर्तनकारी प्रक्रिया का गवाह बन रहा है, जो देश के आंतरिक सुरक्षा मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है। पिछले कुछ महीनों से, छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में माओवादियों द्वारा निर्मित 'शहीद स्मारकों' को व्यवस्थित रूप से ध्वस्त किया जा रहा है। यह सिर्फ इमारतों को गिराना नहीं है, बल्कि एक विचारधारा की नींव को हिलाने का एक "सचेत निर्णय" है, एक ऐसी रणनीति जो राज्य की सत्ता को फिर से स्थापित करने की दिशा में 'ईंट दर ईंट' आगे बढ़ रही है।

क्या हो रहा है बस्तर में?

पिछले कई महीनों से, छत्तीसगढ़ पुलिस और सुरक्षा बल बस्तर के विभिन्न इलाकों में माओवादियों द्वारा बनाए गए स्मृति चिन्हों और स्मारकों को ध्वस्त करने का अभियान चला रहे हैं। ये स्मारक अक्सर उन माओवादी कैडरों की याद में बनाए जाते थे जो सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए थे। ग्रामीण इलाकों में, विशेषकर बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जैसे अतिसंवेदनशील जिलों में, ये ‘शहीद वेदियां’ या ‘स्तंभ’ माओवादी उपस्थिति और प्रभाव का एक दृश्यमान प्रतीक थे।

सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान में, जवानों की टीमें अंदरूनी इलाकों में घुसकर इन ढांचों की पहचान कर उन्हें ध्वस्त कर रही हैं। इन स्मारकों में अक्सर मारे गए माओवादियों के नाम और 'शहादत' की तारीखें खुदी होती थीं, जो स्थानीय ग्रामीणों के बीच माओवादी विचारधारा का प्रचार करने का एक तरीका था। प्रशासन का कहना है कि ये अवैध संरचनाएं हैं जो हिंसा को महिमामंडित करती हैं और अब उन्हें बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

एक ध्वस्त माओवादी शहीद स्मारक के मलबे की तस्वीर, जिसके पास पुलिसकर्मी खड़े हैं।

Photo by Duc Van on Unsplash

पृष्ठभूमि: माओवाद की जड़ों और स्मारकों का महत्व

बस्तर में माओवाद की जड़ें दशकों पुरानी हैं। गरीबी, अशिक्षा, और शासकीय उदासीनता ने इस क्षेत्र को माओवादियों के लिए एक उपजाऊ जमीन बना दिया था। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी समानांतर सरकार स्थापित कर ली, जिसमें 'जन अदालतें' और 'जन मिलिशिया' जैसी संरचनाएं शामिल थीं। इन इलाकों में माओवादियों का इतना दबदबा था कि वे अपने मारे गए साथियों के लिए खुलेआम स्मारक बना सकते थे, और प्रशासन अक्सर उनकी तरफ आँखें फेर लेता था या पहुँचने में असमर्थ होता था।

इन स्मारकों का निर्माण केवल याददाश्त के लिए नहीं था, बल्कि यह कई महत्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति करता था:

  • प्रचार का माध्यम: ये स्मारक माओवादी विचारधारा को फैलाने और युवाओं को संगठन में शामिल होने के लिए प्रेरित करने का एक प्रभावी तरीका थे।
  • मनोबल बढ़ाना: कैडरों के लिए, ये स्मारक 'शहादत' का प्रतीक थे और उन्हें संगठन के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखने के लिए प्रेरित करते थे।
  • क्षेत्रीय नियंत्रण का प्रतीक: जिस क्षेत्र में ये स्मारक मौजूद थे, वह माओवादियों के मजबूत नियंत्रण का प्रमाण था। यह राज्य की सत्ता की अनुपस्थिति को दर्शाता था।
  • सामुदायिक जुड़ाव: कुछ ग्रामीणों के लिए, विशेषकर जिन्हें माओवादियों द्वारा डराया-धमकाया गया था या जो उनकी विचारधारा से प्रभावित थे, ये स्मारक उनकी 'पहचान' का हिस्सा बन गए थे।

दशकों पुरानी समस्या का नया समाधान

बस्तर में सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच संघर्ष एक जटिल और लंबा इतिहास रहा है। अतीत में, सरकार की रणनीति में विकास कार्य, पुनर्वास और सैन्य अभियान का मिश्रण शामिल था, लेकिन माओवादी स्मारकों को इतनी व्यापक और व्यवस्थित तरीके से ध्वस्त करने का अभियान एक अपेक्षाकृत नया दृष्टिकोण है। यह इस बात का संकेत है कि सुरक्षा बल अब न केवल सैन्य रूप से, बल्कि वैचारिक और प्रतीकात्मक रूप से भी माओवादियों को चुनौती देने के लिए तैयार हैं।

क्यों ट्रेंडिंग है यह कदम?

बस्तर में माओवादी स्मारकों का ध्वस्तीकरण इसलिए ट्रेंडिंग है क्योंकि यह एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। यह सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों की एक समन्वित और दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।

  1. बढ़ता आत्मविश्वास: सुरक्षा बलों ने पिछले कुछ वर्षों में बस्तर में कई सफल अभियान चलाए हैं, जिससे माओवादियों का प्रभाव कम हुआ है। यह अभियान उनके बढ़ते आत्मविश्वास और क्षेत्र में उनकी बढ़ती पकड़ को दर्शाता है।
  2. मनोवैज्ञानिक युद्ध: यह एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक युद्ध है। स्मारकों का ध्वस्तीकरण माओवादियों के लिए एक बड़ा प्रतीकात्मक झटका है, जबकि सुरक्षा बलों और स्थानीय आबादी के एक वर्ग के लिए यह राज्य की संप्रभुता की बहाली का प्रतीक है।
  3. नई सरकार का संकल्प: छत्तीसगढ़ में हाल ही में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद, नई सरकार ने माओवाद के खिलाफ एक मजबूत रुख अपनाने का संकल्प लिया है। यह अभियान उस संकल्प को जमीनी स्तर पर दिखा रहा है।
  4. विकास और सुरक्षा का गठजोड़: इस अभियान को उन प्रयासों के साथ जोड़ा जा रहा है, जिनमें नए सुरक्षा शिविर स्थापित करना, सड़कें बनाना और विकास परियोजनाएं शुरू करना शामिल है। यह दिखाता है कि सरकार अब 'विकास और सुरक्षा' को एक साथ आगे बढ़ा रही है।

प्रभाव: कौन प्रभावित और कैसे?

इस "सचेत निर्णय" का प्रभाव बहुआयामी है और यह विभिन्न हितधारकों को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित कर रहा है:

राज्य और सुरक्षा बलों पर प्रभाव

  • बढ़ता मनोबल: सुरक्षा बलों का मनोबल ऊंचा हुआ है, क्योंकि वे देख रहे हैं कि उनके प्रयासों का ठोस परिणाम निकल रहा है और राज्य का प्रभाव बढ़ रहा है।
  • राज्य की उपस्थिति की पुष्टि: यह कदम यह दर्शाता है कि राज्य अब उन क्षेत्रों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, जहां पहले माओवादियों का एकाधिकार था।
  • कानून के शासन की स्थापना: अवैध संरचनाओं को हटाकर, राज्य कानून के शासन को पुनः स्थापित कर रहा है।

माओवादियों पर प्रभाव

  • प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक झटका: अपने 'शहीदों' के स्मारकों का ध्वस्त होना माओवादियों के लिए एक बड़ा प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक झटका है। यह उनके प्रचार तंत्र को कमजोर करता है।
  • भर्ती पर असर: युवा पीढ़ी को आकर्षित करने की उनकी क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ सकता है, क्योंकि 'शहादत' का महिमामंडन अब मुश्किल होगा।
  • रणनीति पर पुनर्विचार: उन्हें अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

स्थानीय आबादी पर प्रभाव

  • मिश्रित प्रतिक्रिया: स्थानीय आबादी में प्रतिक्रियाएं मिश्रित हैं। कुछ लोग राहत महसूस कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें माओवादी उत्पीड़न से मुक्ति मिल रही है और विकास की उम्मीद है। वहीं, कुछ लोग, विशेषकर वे जो माओवादियों से जुड़े हुए थे या डर के कारण समर्थन करते थे, शायद असहज महसूस करें।
  • विश्वास बहाली: इस कदम से उन ग्रामीणों में राज्य के प्रति विश्वास बढ़ सकता है, जो दशकों से माओवादी आतंक के साये में जी रहे थे।

तथ्य और आंकड़े

  • हाल के महीनों में, बस्तर संभाग के विभिन्न जिलों में दर्जनों माओवादी स्मारक ध्वस्त किए गए हैं। इनमें बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर और दंतेवाड़ा जैसे सबसे प्रभावित जिले शामिल हैं।
  • ये स्मारक अक्सर गांव के प्रवेश द्वार पर, चौक-चौराहों पर या जंगल के अंदरूनी इलाकों में बनाए जाते थे।
  • छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा है कि राज्य सरकार माओवादी मुक्त छत्तीसगढ़ के लिए प्रतिबद्ध है और इस तरह के अवैध प्रतीकों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
  • सुरक्षा बलों के अधिकारियों के अनुसार, इन अभियानों को स्थानीय पुलिस, सीआरपीएफ (CRPF) और कोबरा बटालियन (COBRA Battalion) की संयुक्त टीमों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है।
  • यह 'सचेत निर्णय' माओवादियों के खिलाफ एक समग्र रणनीति का हिस्सा है जिसमें नए सुरक्षा शिविरों की स्थापना, खुफिया जानकारी जुटाना और आत्मसमर्पण नीतियों को बढ़ावा देना भी शामिल है।

दोनों पक्ष: तर्क और प्रतिवाद

सरकार और सुरक्षा बलों का पक्ष

राज्य सरकार और सुरक्षा बल इस कदम को पूरी तरह से जायज ठहराते हैं। उनके मुख्य तर्क हैं:

  1. अवैधता: ये स्मारक अवैध रूप से बनाए गए हैं और एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन की हिंसा और 'शहादत' का महिमामंडन करते हैं। कानून के शासन में इनकी कोई जगह नहीं है।
  2. मनोबल तोड़ना: माओवादियों के प्रतीकों को ध्वस्त करके उनके मनोबल को तोड़ना और उनके वैचारिक आधार को कमजोर करना आवश्यक है।
  3. राज्य की संप्रभुता: यह राज्य की संप्रभुता को पुनः स्थापित करने और यह संदेश देने का एक तरीका है कि बस्तर भारत का अभिन्न अंग है, न कि माओवादियों का 'मुक्त क्षेत्र'।
  4. शांति और विकास: इन प्रतीकों को हटाने से स्थानीय आबादी में शांति और सामान्य स्थिति का संदेश जाएगा, जिससे विकास के प्रयासों को गति मिलेगी।

माओवादी sympathizers और आलोचकों का पक्ष

हालांकि, इस कदम के कुछ आलोचक या माओवादी सहानुभूति रखने वाले वर्ग अलग तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं। वे शायद यह तर्क दें:

  1. इतिहास मिटाना: कुछ लोग इसे इतिहास मिटाने का प्रयास मान सकते हैं, भले ही वह इतिहास हिंसक और विवादास्पद ही क्यों न रहा हो। उनका तर्क हो सकता है कि ये संरचनाएं स्थानीय संघर्षों का हिस्सा थीं।
  2. प्रतिशोध: ध्वस्तीकरण के ऐसे कदम माओवादियों को और अधिक हिंसक प्रतिशोध के लिए उकसा सकते हैं, जिससे क्षेत्र में हिंसा बढ़ सकती है।
  3. मूल कारणों का समाधान: कुछ विश्लेषक यह भी तर्क दे सकते हैं कि प्रतीकों को हटाने से मूल समस्याओं जैसे गरीबी, असमानता और आदिवासियों के अधिकारों का उल्लंघन समाप्त नहीं होगा, जो माओवाद के पनपने के प्रमुख कारण हैं।

निष्कर्ष: एक नए बस्तर की ओर?

बस्तर में माओवादी स्मारकों का ध्वस्तीकरण सिर्फ पत्थरों को हटाने का काम नहीं है, बल्कि यह दशकों से चली आ रही एक जटिल समस्या के समाधान की दिशा में एक प्रतीकात्मक और रणनीतिक कदम है। 'ईंट दर ईंट' राज्य का यह 'सचेत निर्णय' यह दर्शाता है कि सरकार अब केवल सैन्य अभियानों पर ही निर्भर नहीं है, बल्कि वह माओवादी विचारधारा के प्रचार को भी चुनौती दे रही है।

यह देखना बाकी है कि इस कदम का दीर्घकालिक प्रभाव क्या होगा। क्या यह माओवादियों को कमजोर करेगा और क्षेत्र में शांति लाएगा, या इससे नए सिरे से टकराव भड़केगा? एक बात निश्चित है – बस्तर अब उस दिशा में आगे बढ़ रहा है जहाँ राज्य अपनी उपस्थिति को मजबूत कर रहा है, और यह आंतरिक सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है।

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स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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