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Bihar 'Maoist Free' Too: From Red Corridor to Development Path, How the Wheel Came Full Circle? - Viral Page (बिहार भी 'माओवादी मुक्त': लाल गलियारे से विकास की राह तक, कैसे पूरा हुआ यह चक्र? - Viral Page)

"बिहार भी 'माओवादी मुक्त', कैसे पूरा हुआ यह चक्र?" यह शीर्षक आज भारत में सुरक्षा और विकास से जुड़ी एक बहुत बड़ी खबर का ऐलान कर रहा है। दशकों तक 'लाल गलियारे' का हिस्सा रहा बिहार, जिसने वामपंथी उग्रवाद (LWE) के एक बड़े हिस्से को अपने भीतर समेट रखा था, उसे अब इस अभिशाप से मुक्त घोषित कर दिया गया है। यह सिर्फ एक घोषणा नहीं, बल्कि एक युग के अंत और शांति व विकास के एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत है।

क्या हुआ? बिहार को क्यों घोषित किया गया 'माओवादी मुक्त'?

हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्रालय और बिहार सरकार ने घोषणा की कि बिहार में अब माओवादी गतिविधियों का कोई संगठित प्रभाव नहीं बचा है। इसका मतलब यह है कि राज्य में अब माओवादियों के कोई बड़े गढ़ नहीं हैं, उनकी गतिविधियां न के बराबर हो गई हैं और उनके शीर्ष नेताओं की पकड़ कमजोर पड़ गई है। यह घोषणा सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए सतत अभियानों, खुफिया जानकारी के बेहतर तालमेल और विकास कार्यों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है।
  • यह राज्य के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जा रही है, क्योंकि बिहार कभी उन राज्यों में शामिल था जो माओवादी हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित थे।
  • केंद्र सरकार का कहना है कि पूरे देश में माओवादी हिंसा में 85% की कमी आई है, और बिहार इसमें एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुआ है।
  • यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब झारखंड भी माओवादी प्रभाव से तेजी से बाहर निकल रहा है।

पृष्ठभूमि: माओवाद की जड़ें और बिहार का 'लाल गलियारा'

नक्सलवाद का उदय और भारत में विस्तार

माओवाद, जिसे भारत में अक्सर नक्सलवाद कहा जाता है, की जड़ें 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में हुए किसान विद्रोह से जुड़ी हैं। यह आंदोलन जल्द ही देश के कई गरीब और आदिवासी बहुल इलाकों में फैल गया, जहाँ भूमिहीनता, असमानता, शोषण और सरकारी उपेक्षा जैसी समस्याएं गहरी थीं। माओवादियों ने "बंदूक की नोक से सत्ता" हासिल करने के सिद्धांत पर काम किया और सरकारों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाया।

बिहार की विशेष स्थिति: माओवाद का एक मजबूत गढ़

बिहार में माओवाद ने 1970 के दशक से अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी थी। राज्य की सामाजिक-आर्थिक संरचना, जिसमें जातिगत भेदभाव, भूमि विवाद, और सामंती प्रथाएं शामिल थीं, ने माओवादियों को पनपने के लिए उपजाऊ जमीन दी।
  • गरीबी और असमानता: ग्रामीण बिहार में व्याप्त अत्यधिक गरीबी और संसाधनों के असमान वितरण ने लोगों में असंतोष पैदा किया।
  • भूमि विवाद: बड़े पैमाने पर भूमिहीनता और भूमि सुधारों के विफल होने से किसानों और मजदूरों में नाराजगी थी।
  • न्याय का अभाव: अक्सर गरीब और वंचित तबकों को न्याय नहीं मिल पाता था, जिससे वे माओवादियों की तरफ आकर्षित हुए जो उन्हें "न्याय" दिलाने का वादा करते थे।
  • लाल गलियारा: बिहार उन राज्यों में शामिल था जिन्हें 'लाल गलियारा' कहा जाता था, जो देश के पूर्व से दक्षिण तक फैला हुआ था और माओवादी गतिविधियों का केंद्र था। औरंगाबाद, गया, जमुई, लखीसराय, मुंगेर, रोहतास और बांका जैसे जिले इसकी चपेट में थे।
दशकों तक, इन इलाकों में सड़कें नहीं बनीं, स्कूल नहीं खुले, और अस्पताल दूर की कौड़ी थे। विकास ठप था और हिंसा चरम पर थी।

सरकार की रणनीति: सुरक्षा और विकास का दोहरा वार

माओवाद से निपटने के लिए भारत सरकार और राज्य सरकारों ने एक बहुआयामी रणनीति अपनाई:
  1. सुरक्षा अभियान: विभिन्न सुरक्षा बलों (CRPF, कोबरा बटालियन, राज्य पुलिस) द्वारा लगातार खुफिया-आधारित अभियान चलाए गए, जिसमें कई माओवादी नेताओं को गिरफ्तार किया गया या मार गिराया गया।
  2. विकास कार्य: दुर्गम और प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, पुल, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने पर जोर दिया गया।
  3. आत्मसमर्पण नीति: माओवादियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए आकर्षक आत्मसमर्पण और पुनर्वास पैकेज दिए गए।
  4. स्थानीय भागीदारी: जनजातीय समुदायों और स्थानीय लोगों को विकास प्रक्रियाओं में शामिल करने का प्रयास किया गया।

क्यों है यह खबर चर्चा में? इसका क्या महत्व है?

बिहार के 'माओवादी मुक्त' घोषित होने की खबर कई कारणों से चर्चा में है और इसका गहरा महत्व है:

शांति और स्थिरता की ओर एक कदम

यह घोषणा दशकों से हिंसा और भय में जी रहे लाखों लोगों के लिए शांति और स्थिरता की उम्मीद लेकर आई है। यह न केवल राज्य में सुरक्षा स्थिति में सुधार का प्रतीक है, बल्कि यह दर्शाता है कि हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

विकास को मिलेगा पंख

माओवादी हिंसा ने बिहार के कई इलाकों में विकास की गति को रोक रखा था। अब, इन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का विकास, निवेश और पर्यटन बढ़ने की संभावना है। सड़कें बनेंगी, स्कूल खुलेंगे, और रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

राजनीतिक निहितार्थ और केंद्र-राज्य समन्वय

यह केंद्र और राज्य सरकार, दोनों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। केंद्र सरकार इसे वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ अपनी 'दृढ़ नीति' की सफलता के रूप में प्रस्तुत कर रही है। यह दिखाता है कि सुरक्षा और विकास के क्षेत्र में केंद्र-राज्य का समन्वय कितना प्रभावी हो सकता है।

अन्य राज्यों के लिए मिसाल

बिहार की सफलता अन्य शेष माओवादी प्रभावित राज्यों, विशेषकर छत्तीसगढ़ और झारखंड, के लिए एक प्रेरणा और मॉडल का काम कर सकती है।

प्रभाव: सकारात्मक बदलाव और चुनौतियाँ

सकारात्मक प्रभाव

  • सुरक्षा में सुधार: हिंसा की घटनाओं में भारी कमी, जिससे लोगों का जीवन सुरक्षित हुआ है।
  • विकास की गति तेज: जिन इलाकों में पहले विकास कार्य संभव नहीं थे, वहाँ अब बुनियादी ढांचे का तेजी से निर्माण हो रहा है।
  • स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: पर्यटन, व्यापार और कृषि में नए अवसरों का सृजन हो रहा है।
  • सरकार की पहुंच: पहले जिन क्षेत्रों में प्रशासन का पहुंचना मुश्किल था, वहां अब सरकारी योजनाएं और सेवाएं आसानी से उपलब्ध हो रही हैं।
  • मनोवैज्ञानिक राहत: भय और अनिश्चितता के माहौल से बाहर निकलकर स्थानीय लोग अब शांतिपूर्ण जीवन जी सकते हैं।

चुनौतियाँ और चिंताएं

यह घोषणा निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण मोड़ है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ और चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं:
  1. स्थिरता बनाए रखना: क्या माओवादी पूरी तरह से खत्म हो गए हैं, या वे सिर्फ भूमिगत हो गए हैं और फिर से उभर सकते हैं? यह एक महत्वपूर्ण सवाल है।
  2. मूल कारणों का समाधान: गरीबी, असमानता, भूमि विवाद और न्याय के अभाव जैसे मूल मुद्दों को पूरी तरह से हल किए बिना, असंतोष फिर से पनप सकता है।
  3. पुनर्वास: आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों और उनके परिवारों का समाज में सफल पुनर्वास सुनिश्चित करना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। उन्हें रोजगार और सामाजिक स्वीकार्यता कैसे मिलेगी?
  4. विकास का समावेशी मॉडल: यह सुनिश्चित करना कि विकास सभी तक पहुंचे और किसी भी समुदाय को हाशिए पर न धकेला जाए, ताकि नए सिरे से असंतोष पैदा न हो।
  5. मानवाधिकारों का सम्मान: सुरक्षा अभियानों के दौरान मानवाधिकारों का सम्मान सुनिश्चित करना और पीड़ितों को न्याय दिलाना भी आवश्यक है।

तथ्य और आंकड़े: बदलाव की गवाही

केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2010 से 2021 के बीच वामपंथी उग्रवाद से जुड़ी घटनाओं में 77% की कमी आई है। इस अवधि में मरने वालों की संख्या में भी 85% की गिरावट दर्ज की गई है। बिहार ने इस गिरावट में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
  • घटते प्रभावित जिले: 2015 में देश में 90 जिले LWE से प्रभावित थे, जो 2021 तक घटकर 46 रह गए। बिहार के कई जिले अब इस सूची से बाहर हैं।
  • सुरक्षा बलों की तैनाती: केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की कोबरा बटालियन और बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस बल ने इन इलाकों में लगातार अभियान चलाए।
  • आर्थिक पैकेज: केंद्र सरकार द्वारा प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष योजनाएं और फंड जारी किए गए।
  • आत्मसमर्पण: बड़ी संख्या में माओवादियों ने सरकार की आत्मसमर्पण नीति का लाभ उठाया और मुख्यधारा में लौटे।

दोनों पक्ष: सरकारी दृष्टिकोण बनाम जमीनी हकीकत

सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का पक्ष

सरकार और सुरक्षा एजेंसियां इसे अपनी नीतियों, रणनीतियों और सुरक्षा बलों के अथक प्रयासों की बड़ी सफलता मानती हैं। उनका तर्क है कि:
  • कठोर कार्रवाई: माओवादी नेतृत्व पर लगातार दबाव बनाया गया, जिससे उनकी ताकत कमजोर हुई।
  • विकास की किरण: सड़कें, पुल, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं के निर्माण से स्थानीय लोगों का विश्वास सरकार में बढ़ा है।
  • आत्मसमर्पण: आत्मसमर्पण नीतियों ने कई माओवादियों को हिंसा का रास्ता छोड़ने के लिए प्रेरित किया।
  • खुफिया नेटवर्क: बेहतर खुफिया जानकारी और तकनीकी निगरानी ने अभियानों को सफल बनाने में मदद की।
उनके अनुसार, यह सिर्फ सुरक्षा बलों की जीत नहीं, बल्कि लोकतंत्र और विकास की जीत है।

आलोचकों और जमीनी कार्यकर्ताओं का दृष्टिकोण

कुछ सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद और स्थानीय लोग इस घोषणा को "अधूरी" या "अतिशयोक्तिपूर्ण" मानते हैं। उनके तर्क हैं:
  • मूल मुद्दे अनसुलझे: उनका कहना है कि भूमिहीनता, अशिक्षा, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता जैसे मूल मुद्दे अभी भी पूरी तरह से हल नहीं हुए हैं। ये समस्याएं भविष्य में फिर से असंतोष का कारण बन सकती हैं।
  • 'माओवादी मुक्त' की परिभाषा: उनका सवाल है कि 'माओवादी मुक्त' का मतलब क्या है? क्या यह सिर्फ संगठित हिंसा की अनुपस्थिति है, या विचारधारा का भी अंत है? विचारधारा भूमिगत होकर कभी भी फिर से उभर सकती है।
  • जबरन विस्थापन: विकास परियोजनाओं के नाम पर स्थानीय आदिवासियों और वंचितों के विस्थापन की चिंता भी जताई जाती है, जो उन्हें फिर से हाशिए पर धकेल सकती है।
  • विश्वास का संकट: दशकों के संघर्ष के बाद, स्थानीय लोगों में सरकार के प्रति विश्वास पूरी तरह से बहाल होने में अभी समय लगेगा।
यह मानना गलत होगा कि एक घोषणा से दशकों पुराने मुद्दे पूरी तरह से समाप्त हो गए हैं। यह एक निरंतर प्रक्रिया है जिसमें सुरक्षा, विकास और सामाजिक न्याय तीनों को साथ लेकर चलना होगा।

निष्कर्ष: नए बिहार की उम्मीदें और जिम्मेदारियां

बिहार का 'माओवादी मुक्त' घोषित होना एक ऐतिहासिक क्षण है। यह दर्शाता है कि संकल्प, सही रणनीति और अथक प्रयासों से सबसे कठिन चुनौतियों का भी सामना किया जा सकता है। यह सिर्फ हिंसा के अंत का प्रतीक नहीं, बल्कि नया बिहार बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है - एक ऐसा बिहार जो शांतिपूर्ण, समृद्ध और समावेशी हो। हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हम इस सफलता को अंतिम न मानें। सरकार, नागरिक समाज और स्थानीय समुदायों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि विकास सभी तक पहुंचे, सामाजिक न्याय स्थापित हो, और कोई भी समूह खुद को उपेक्षित महसूस न करे। तभी यह चक्र सही मायने में "पूरा" होगा और बिहार वास्तव में लाल गलियारे की छाया से निकलकर विकास की उज्ज्वल राह पर अग्रसर होगा। यह समय जश्न मनाने का है, लेकिन साथ ही भविष्य की चुनौतियों के लिए कमर कसने का भी है। --- आपको यह जानकारी कैसी लगी? हमें कमेंट करके बताएं! इस महत्वपूर्ण खबर को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें। ऐसी ही और एक्सक्लूसिव और एंगेजिंग खबरों के लिए Viral Page को फॉलो करना न भूलें!

स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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