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Amit Shah's 'Devnagari' Push for Kokborok: Why is it Causing a Political Storm in Tripura? - Viral Page (कोकबोरॉक लिपि पर अमित शाह का 'देवनागरी' जोर: त्रिपुरा में क्यों मचा है सियासी बवंडर? - Viral Page)

अमित शाह का ‘देवनागरी’ पुश फॉर कोकबोरॉक ट्रिगर्स फ्रेश स्टॉर्म इन त्रिपुरा त्रिपुरा में एक बार फिर भाषाई पहचान और लिपि को लेकर गहरा विवाद खड़ा हो गया है। इस बार केंद्र में है राज्य की प्रमुख स्वदेशी भाषा कोकबोरॉक और उसे लिखने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का देवनागरी लिपि का प्रस्ताव। इस सुझाव ने त्रिपुरा के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में एक नया तूफान खड़ा कर दिया है, जिससे आदिवासी समुदायों और विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। यह सिर्फ एक लिपि बदलने का मामला नहीं, बल्कि गहरी पहचान, इतिहास और भविष्य की आकांक्षाओं का प्रश्न बन गया है।

क्या हुआ? गृह मंत्री का बयान और तत्काल प्रतिक्रिया

हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक सार्वजनिक मंच पर कोकबोरॉक भाषा को देवनागरी लिपि में लिखने की वकालत की। उनका तर्क था कि देवनागरी लिपि में कोकबोरॉक को अपनाने से भाषा का मानकीकरण होगा, उसे राष्ट्रीय स्तर पर अधिक स्वीकार्यता मिलेगी और यह भाषा के विकास में सहायक सिद्ध होगा। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और देश की भाषाओं के 'भारतीयकरण' के व्यापक दृष्टिकोण के तहत यह बात कही। हालांकि, शाह के इस बयान ने तुरंत ही आग में घी डालने का काम किया। त्रिपुरा के स्वदेशी संगठन, विशेष रूप से प्रभावशाली टिपरा मोथा पार्टी और कई छात्र संगठन, इस प्रस्ताव के खिलाफ मुखर हो गए। उन्होंने इसे आदिवासी पहचान पर हमला और एक जबरन थोपा गया सांस्कृतिक एजेंडा करार दिया। उनका मानना है कि यह कदम कोकबोरॉक की अपनी मौलिक पहचान और उसके लंबे संघर्ष को कमजोर करेगा।
त्रिपुरा में पारंपरिक पोशाक पहने कुछ लोग विरोध प्रदर्शन करते हुए, उनके हाथों में कोकबोरॉक भाषा के बैनर हैं, जिस पर 'हमारी लिपि, हमारी पहचान' लिखा है।

Photo by Masjid Pogung Dalangan on Unsplash

कोकबोरॉक भाषा और उसकी लिपि का लंबा इतिहास: एक परिचय

कोकबोरॉक त्रिपुरा की सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से बोली जाने वाली स्वदेशी भाषा है। यह त्रिपुरी लोगों की मातृभाषा है और राज्य की आधिकारिक भाषाओं में से एक है (बंगाली के साथ)। 1979 में इसे आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला। इसका शाब्दिक अर्थ है 'मनुष्य की भाषा' ('कोक' यानी भाषा, 'बोरॉक' यानी मनुष्य)। इस भाषा को लेकर लिपि का विवाद कोई नया नहीं है। दशकों से यह बहस चली आ रही है कि कोकबोरॉक को किस लिपि में लिखा जाए।
  • बंगाली लिपि: ऐतिहासिक रूप से, कोकबोरॉक को लंबे समय से बंगाली लिपि में लिखा जाता रहा है, खासकर ब्रिटिश काल से और उसके बाद भी। कई पुरानी किताबें, सरकारी दस्तावेज और साहित्यिक कृतियाँ इसी लिपि में उपलब्ध हैं। जो लोग बंगाली भाषा से परिचित हैं, उनके लिए यह लिपि स्वाभाविक थी।
  • रोमन लिपि: 1960 और 70 के दशक में, आदिवासी समुदायों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रखने और बंगाली सांस्कृतिक प्रभुत्व का मुकाबला करने के लिए रोमन लिपि को अपनाने की मांग तेज हुई। कई युवा और छात्र संगठन रोमन लिपि के प्रबल समर्थक हैं, उनका तर्क है कि यह कोकबोरॉक की ध्वन्यात्मकता (phonetics) के अधिक अनुकूल है और उन्हें बंगाली से अलग एक स्वतंत्र पहचान प्रदान करती है। कई स्कूलों में और उच्च शिक्षा में भी रोमन लिपि का प्रयोग होता रहा है।
दोनों लिपियों के समर्थक अपने-अपने तर्क देते रहे हैं, और इस विषय पर कई बार हिंसक प्रदर्शन भी हुए हैं। राज्य सरकारों ने इस मुद्दे को सुलझाने के कई प्रयास किए हैं, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।

देवनागरी लिपि का प्रस्ताव: सरकार का तर्क क्या है?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्र सरकार के समर्थक कोकबोरॉक के लिए देवनागरी लिपि को अपनाने के पक्ष में कई तर्क दे रहे हैं:
  1. मानकीकरण और एकरूपता: देवनागरी भारत की सबसे व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली लिपियों में से एक है, जिसमें हिंदी, मराठी, नेपाली और कई अन्य भाषाएँ लिखी जाती हैं। इसे अपनाने से कोकबोरॉक का मानकीकरण होगा और इसकी वर्तनी में एकरूपता आएगी।
  2. राष्ट्रीय एकता: सरकार का मानना है कि देवनागरी को अपनाना 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को मजबूत करेगा। यह कोकबोरॉक बोलने वालों को व्यापक राष्ट्रीय पहचान से जोड़ेगा।
  3. सीखने में आसानी: यदि छात्र हिंदी या अन्य देवनागरी भाषाओं से परिचित हैं, तो उनके लिए कोकबोरॉक को देवनागरी में सीखना आसान हो सकता है।
  4. डिजिटल अनुकूलता: देवनागरी लिपि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर व्यापक रूप से समर्थित है, जो भाषा के ऑनलाइन प्रसार और आधुनिक तकनीकी एकीकरण के लिए फायदेमंद हो सकता है।
यह भी कहा जा रहा है कि देवनागरी को अपनाने से कोकबोरॉक के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं, क्योंकि देवनागरी में सामग्री और उपकरण विकसित करने में आसानी होगी।

त्रिपुरा की राजनीति में कोकबोरॉक लिपि का महत्व

त्रिपुरा की राजनीति में कोकबोरॉक भाषा और उसकी लिपि का मुद्दा हमेशा से एक संवेदनशील विषय रहा है। राज्य की लगभग एक तिहाई आबादी आदिवासी समुदायों की है, और उनकी पहचान, संस्कृति और अधिकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले मुद्दे चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। टिपरा मोथा पार्टी, जिसका नेतृत्व त्रिपुरा शाही परिवार के सदस्य प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देबबर्मा करते हैं, ने आदिवासी अधिकारों और 'ग्रेटर टिपरालैंड' की अवधारणा को प्रमुखता दी है। यह पार्टी कोकबोरॉक को रोमन लिपि में लिखने की प्रबल पक्षधर रही है। उनका मानना है कि रोमन लिपि ही आदिवासी पहचान को सही मायने में दर्शाती है और बंगाली प्रभुत्व के खिलाफ एक प्रतिरोध है। शाह का देवनागरी प्रस्ताव उनके राजनीतिक आधार और आदिवासी अस्मिता के एजेंडे को सीधे चुनौती देता है। भाजपा, जो वर्तमान में राज्य में सत्ता में है, आदिवासी वोटों को आकर्षित करने के लिए हमेशा प्रयासरत रही है। देवनागरी प्रस्ताव से भाजपा को यह उम्मीद हो सकती है कि वह राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक एकीकरण का संदेश देकर अपने आधार को मजबूत करेगी। हालांकि, यह कदम टिपरा मोथा और अन्य आदिवासी संगठनों को एकजुट कर सकता है, जिससे भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं।

विपक्ष और आदिवासी समुदायों की चिंताएं: यह केवल एक लिपि का मामला नहीं

अमित शाह के देवनागरी प्रस्ताव पर विपक्षी दलों और आदिवासी समुदायों की प्रतिक्रियाएं तीव्र और नकारात्मक रही हैं। उनकी चिंताएं केवल तकनीकी नहीं हैं, बल्कि पहचान, स्वायत्तता और सांस्कृतिक अस्तित्व से जुड़ी हैं:
  • पहचान का संकट: आदिवासी समुदाय इसे अपनी विशिष्ट पहचान पर हमला मानते हैं। उनका तर्क है कि कोकबोरॉक को रोमन लिपि में लिखने की उनकी दशकों पुरानी मांग को नजरअंदाज किया जा रहा है और एक बाहरी लिपि थोपी जा रही है।
  • ऐतिहासिक संघर्ष: रोमन लिपि के लिए संघर्ष बंगाली भाषा और संस्कृति के कथित प्रभुत्व के खिलाफ आदिवासी आत्मनिर्णय का एक हिस्सा रहा है। देवनागरी का परिचय इस संघर्ष को नकारना माना जा रहा है।
  • साहित्यिक और शैक्षणिक चुनौतियां: मौजूदा कोकबोरॉक साहित्य का एक बड़ा हिस्सा बंगाली लिपि में है, और रोमन लिपि में भी काफी सामग्री विकसित हुई है। देवनागरी को अचानक अपनाने से मौजूदा शैक्षणिक सामग्री को बदलना होगा और छात्रों व शिक्षकों के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी होगी।
  • सांस्कृतिक अतिक्रमण: कई आदिवासी नेता इसे सांस्कृतिक अतिक्रमण और केंद्र सरकार द्वारा स्थानीय पहचान को दबाने का प्रयास मानते हैं।
प्रद्योत देबबर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि "कोकबोरॉक को देवनागरी में थोपना भाषा और आदिवासी पहचान को खत्म करने का सीधा प्रयास है। हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे।" उनका यह बयान इस मुद्दे की संवेदनशीलता को दर्शाता है।

किन तथ्यों पर आधारित है यह विवाद?

* कोकबोरॉक की स्थिति: 1979 से यह त्रिपुरा की आधिकारिक भाषाओं में से एक है। 2011 की जनगणना के अनुसार, त्रिपुरा में लगभग 9 लाख लोग कोकबोरॉक बोलते हैं। * लिपि की अनिश्चितता: भले ही बंगाली लिपि का व्यापक उपयोग होता रहा है, लेकिन आधिकारिक रूप से कभी एक लिपि को पूरी तरह से तय नहीं किया गया, जिससे रोमन लिपि की मांग भी बनी रही। त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (TTAADC) के कई संस्थानों में रोमन लिपि का उपयोग होता है। * सरकारी प्रयास: पहले भी कई समितियों का गठन किया गया, जैसे 2008 में डॉ. सुभाशीष गंगोपाध्याय समिति, जिसने रोमन लिपि के पक्ष में सिफारिशें की थीं, लेकिन उन्हें पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका। * संविधानिक प्रावधान: भारत का संविधान राज्यों को अपनी आधिकारिक भाषा चुनने का अधिकार देता है (अनुच्छेद 345)। हालांकि, केंद्र सरकार की 'राष्ट्रीय एकता' की अवधारणा के तहत भाषाई एकरूपता के सुझाव अक्सर सामने आते रहते हैं (जैसे हिंदी को बढ़ावा देना, अनुच्छेद 351)।

आगे क्या? संभावित प्रभाव और रास्ता

यह विवाद निश्चित रूप से त्रिपुरा में राजनीतिक उथल-पुथल को बढ़ाएगा।
  • बढ़ते विरोध प्रदर्शन: आदिवासी संगठन और टिपरा मोथा पार्टी इस मुद्दे पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर सकती है, जिससे राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
  • चुनावों पर असर: आगामी स्थानीय और विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा एक महत्वपूर्ण कारक बनेगा, जिससे भाजपा के लिए आदिवासी वोटों को बरकरार रखना मुश्किल हो सकता है। टिपरा मोथा इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश करेगी।
  • पहचान की राजनीति: यह मुद्दा पूरे पूर्वोत्तर भारत में पहचान की राजनीति को फिर से हवा दे सकता है, जहाँ भाषाई और जातीय पहचान बेहद संवेदनशील मानी जाती है।
इस मुद्दे का समाधान केवल संवाद और आपसी समझ से ही निकल सकता है। केंद्र सरकार को आदिवासी समुदायों की भावनाओं और ऐतिहासिक संघर्षों को समझना होगा। स्थानीय नेताओं और विशेषज्ञों को शामिल करके एक व्यापक सहमति बनाने का प्रयास करना होगा, जो भाषा के विकास और पहचान के संरक्षण दोनों को सुनिश्चित कर सके।

निष्कर्ष: पहचान और विकास के बीच संतुलन

कोकबोरॉक के लिए देवनागरी लिपि का प्रस्ताव सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि त्रिपुरा के आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान, गौरव और इतिहास से जुड़ा एक भावनात्मक मुद्दा है। जबकि केंद्र सरकार राष्ट्रीय एकीकरण और भाषा के मानकीकरण की बात कर रही है, वहीं आदिवासी समुदाय अपनी अनूठी पहचान को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस संवेदनशील मामले में, किसी भी एक पक्ष को नजरअंदाज करना गहरे घाव दे सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि भाषाई विकास को स्थानीय पहचान के साथ सामंजस्य बिठाकर आगे बढ़ाया जाए, न कि किसी पर कोई लिपि थोपी जाए। यह एक नाजुक संतुलन है जिसे हासिल करने के लिए बहुत सावधानी और सम्मान की आवश्यकता होगी। आपकी राय क्या है? क्या आपको लगता है कि कोकबोरॉक को देवनागरी लिपि में लिखना एक अच्छा विचार है, या यह आदिवासी पहचान पर हमला है? हमें नीचे कमेंट्स में बताएं! अगर आपको यह जानकारीपूर्ण लेख पसंद आया, तो इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें और ऐसे ही ताजातरीन और विश्लेषण से भरे लेखों के लिए Viral Page को फॉलो करना न भूलें!

स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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