‘Climate change a common challenge’: India on Nepal’s ‘justice’ demand
हाल के दिनों में, भारत और नेपाल के बीच राजनयिक वार्ता में एक नया और महत्वपूर्ण आयाम जुड़ गया है। यह मुद्दा है जलवायु परिवर्तन और इससे उत्पन्न होने वाली चुनौतियाँ। जहाँ एक ओर नेपाल, एक हिमालयी राष्ट्र होने के नाते, जलवायु परिवर्तन के भयावह प्रभावों का सामना कर रहा है, वहीं वह इन प्रभावों के लिए 'न्याय' की मांग कर रहा है। इसके जवाब में, भारत ने इस चुनौती को 'साझा' बताते हुए सामूहिक प्रयासों पर जोर दिया है।
आखिर क्या हुआ? नेपाल की 'न्याय' मांग और भारत का जवाब
पड़ोसी देश नेपाल ने हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मंचों और द्विपक्षीय वार्ताओं में यह स्पष्ट किया है कि वह जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले नुकसान और क्षति (Loss and Damage) के लिए 'न्याय' चाहता है। नेपाल का मानना है कि वह एक ऐसा देश है जिसने ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन किया है, लेकिन उसे उन विकसित और बड़े विकासशील देशों के 'पापों' का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है, जिन्होंने अत्यधिक उत्सर्जन किया है। उसकी 'न्याय' की मांग मुख्य रूप से वित्तीय सहायता, तकनीकी हस्तांतरण और अनुकूलन व न्यूनीकरण प्रयासों के लिए समर्थन से जुड़ी है, ताकि वह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना कर सके।
इसके जवाब में, भारत ने अपने पड़ोसी देश की चिंताओं को स्वीकार करते हुए, इस मुद्दे को एक 'साझा चुनौती' के रूप में प्रस्तुत किया है। भारत का कहना है कि जलवायु परिवर्तन कोई एकतरफा मुद्दा नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक संकट है जिससे सभी देश प्रभावित हैं, चाहे वे उत्सर्जक हों या नहीं। भारत ने जोर दिया है कि इस चुनौती से निपटने के लिए किसी एक देश को दोषी ठहराने के बजाय, सभी को मिलकर काम करना होगा। यह रुख भारत की 'कॉमन बट डिफरेंशिएटेड रिस्पॉन्सिबिलिटीज़ एंड रेस्पेक्टिव कैपेबिलिटीज़' (CBDR-RC) की नीति से भी मेल खाता है, जिसमें ऐतिहासिक उत्सर्जन और विकास के स्तर के आधार पर देशों की अलग-अलग जिम्मेदारियों को स्वीकार किया जाता है, लेकिन यह भी कहा जाता है कि सभी को अपनी क्षमताओं के अनुसार योगदान देना चाहिए।
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इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि क्या है?
नेपाल की जलवायु भेद्यता
नेपाल दुनिया के सबसे कम विकसित और सबसे अधिक जलवायु-भेद्य देशों में से एक है। हिमालय की गोद में बसा यह देश ग्लेशियरों के पिघलने, अप्रत्याशित बाढ़, भूस्खलन, सूखे और extreme weather events का सामना कर रहा है।
- ग्लेशियर पिघलना: हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे शुरुआत में नदियों में पानी बढ़ रहा है, लेकिन लंबे समय में यह जल संकट का कारण बन सकता है। इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (GLOFs) का खतरा भी बढ़ गया है।
- अत्यधिक वर्षा और बाढ़: मानसून के पैटर्न में बदलाव आया है, जिससे अत्यधिक वर्षा और विनाशकारी बाढ़ की घटनाएं बढ़ी हैं, खासकर तराई क्षेत्रों में।
- सूखा और फसल क्षति: कुछ क्षेत्रों में वर्षा की कमी से सूखे की स्थिति पैदा हो रही है, जिससे कृषि पर निर्भर आबादी प्रभावित हो रही है।
- जैविक विविधता पर असर: तापमान बढ़ने से नेपाल की समृद्ध जैव विविधता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
नेपाल का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन दुनिया में सबसे कम है, फिर भी उसे दूसरों के उत्सर्जन का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। यही कारण है कि नेपाल अपने लिए 'जलवायु न्याय' की मांग कर रहा है।
भारत की भूमिका और स्थिति
भारत एक विशाल अर्थव्यवस्था और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी कार्बन उत्सर्जक (पूर्ण रूप से, प्रति व्यक्ति नहीं) है। हालांकि, भारत ऐतिहासिक रूप से एक बड़ा उत्सर्जक नहीं रहा है और अभी भी प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। भारत स्वयं भी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों (सूखे, बाढ़, समुद्री जलस्तर में वृद्धि) का सामना कर रहा है।
भारत ने अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) जैसी पहलें शुरू की हैं और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने में अग्रणी भूमिका निभाई है। भारत का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए विकासशील देशों को विकसित देशों से वित्तीय और तकनीकी सहायता मिलनी चाहिए। इसलिए, जब नेपाल भारत से 'न्याय' की मांग करता है, तो भारत इसे एक क्षेत्रीय 'साझा चुनौती' के रूप में देखता है, जहाँ सभी देशों को अपनी क्षमतानुसार योगदान देना चाहिए और वैश्विक मंच पर विकसित देशों से अधिक मदद की वकालत करनी चाहिए।
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यह मुद्दा क्यों ट्रेंड कर रहा है?
यह मुद्दा कई कारणों से चर्चा का विषय बना हुआ है:
- तत्काल जलवायु संकट: दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तेजी से स्पष्ट हो रहे हैं। नेपाल जैसे देशों में बाढ़, भूस्खलन और सूखे की बढ़ती घटनाएं इस मुद्दे को तात्कालिक बनाती हैं।
- राजनयिक महत्त्व: भारत और नेपाल के बीच संबंध क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर दोनों देशों का रुख मायने रखता है। यह दिखाता है कि कैसे विकासशील देशों के बीच भी 'नुकसान और क्षति' पर अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकते हैं।
- 'न्याय' बनाम 'साझा चुनौती': नेपाल की 'न्याय' की मांग और भारत के 'साझा चुनौती' के दृष्टिकोण के बीच का अंतर दिलचस्प है। यह दिखाता है कि जलवायु कार्रवाई की जिम्मेदारी और जवाबदेही पर अलग-अलग राय हो सकती है।
- दक्षिण एशिया का नेतृत्व: भारत दक्षिण एशिया में एक प्रमुख शक्ति है। इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उसकी प्रतिक्रिया और भूमिका पर सबकी नज़र है।
- आम लोगों की चिंता: जलवायु परिवर्तन अब केवल वैज्ञानिक या राजनयिक चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम लोगों के जीवन, आजीविका और भविष्य को प्रभावित कर रहा है।
इसके क्या प्रभाव हो सकते हैं?
भारत-नेपाल संबंधों पर
यह मुद्दा दोनों देशों के बीच संबंधों को नया रूप दे सकता है।
- सहयोग के अवसर: यह एक अवसर हो सकता है कि दोनों देश जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और न्यूनीकरण के लिए मिलकर काम करें। उदाहरण के लिए, साझा नदी घाटियों का प्रबंधन, बाढ़ की चेतावनी प्रणालियों का विकास और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में सहयोग।
- राजनयिक घर्षण: यदि यह मुद्दा ठीक से नहीं संभाला गया, तो इससे कुछ राजनयिक घर्षण उत्पन्न हो सकता है, खासकर यदि नेपाल को लगता है कि उसकी चिंताओं को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया जा रहा है।
क्षेत्रीय जलवायु नीतियों पर
यह मुद्दा दक्षिण एशिया में अन्य छोटे, जलवायु-भेद्य देशों के लिए एक मिसाल कायम कर सकता है। भूटान, बांग्लादेश जैसे देश भी इसी तरह की चिंताओं को उठा सकते हैं। इससे क्षेत्रीय स्तर पर जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और आपदा प्रबंधन पर अधिक समन्वित नीतियों की आवश्यकता होगी।
स्थानीय समुदायों पर
सबसे बड़ा प्रभाव स्थानीय समुदायों पर पड़ेगा। यदि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ठीक से संबोधित नहीं किया जाता है, तो इससे गरीबी, विस्थापन, खाद्य असुरक्षा और जल संकट बढ़ सकता है, जिससे सामाजिक अशांति भी पैदा हो सकती है।
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
- नेपाल का कुल कार्बन उत्सर्जन वैश्विक उत्सर्जन का 0.027% से भी कम है।
- आईपीसीसी (IPCC) की रिपोर्टों में हिमालयी क्षेत्र को दुनिया के सबसे गर्म होने वाले क्षेत्रों में से एक बताया गया है।
- विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में 2030 तक जलवायु परिवर्तन के कारण 2.2% जीडीपी का नुकसान हो सकता है।
- भारत ने 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन (Net-Zero Emissions) का लक्ष्य रखा है और नवीकरणीय ऊर्जा में भारी निवेश कर रहा है।
- भारत और नेपाल के बीच कई साझा नदियाँ हैं, जो दोनों देशों की जल सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। जलवायु परिवर्तन इन नदियों के प्रवाह को सीधे प्रभावित करता है।
दोनों देशों का अपना-अपना पक्ष: एक जटिल पहेली
नेपाल का पक्ष: 'नुकसान का भुगतान'
नेपाल का पक्ष इस तर्क पर आधारित है कि उसे ऐसे संकट का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है जिसके लिए वह शायद ही जिम्मेदार है। उसकी मुख्य दलीलें हैं:
- ऐतिहासिक जिम्मेदारी: नेपाल ने औद्योगिक क्रांति के बाद से बहुत कम उत्सर्जन किया है। इसलिए, जिन देशों ने अतीत में बड़े पैमाने पर उत्सर्जन किया है, उनकी जिम्मेदारी है कि वे उन देशों की मदद करें जो अब इसके परिणाम भुगत रहे हैं।
- अ disproportionate प्रभाव: नेपाल की अर्थव्यवस्था, जो काफी हद तक कृषि और पर्यटन पर निर्भर करती है, जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। ग्लेशियरों के पिघलने से लेकर बाढ़ और सूखे तक, हर आपदा सीधे तौर पर उसके विकास को प्रभावित करती है।
- वित्तीय और तकनीकी आवश्यकता: अनुकूलन और न्यूनीकरण के प्रयासों के लिए नेपाल को भारी वित्तीय संसाधनों और उन्नत तकनीक की आवश्यकता है, जो उसके पास नहीं हैं। इसलिए, वह इन बड़े उत्सर्जकों से 'न्याय' के रूप में सहायता की मांग करता है।
भारत का पक्ष: 'साझा संकट, साझा समाधान'
भारत अपने पड़ोसी देश की पीड़ा को समझता है, लेकिन वह इस मुद्दे को एक व्यापक वैश्विक ढांचे में देखता है:
- वैश्विक प्रकृति: भारत का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है जो किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं है। इससे निपटने के लिए सभी देशों को, उनकी क्षमता के अनुसार, मिलकर काम करना होगा।
- अपनी भेद्यता: भारत स्वयं भी जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है। वह अपनी सीमाओं के भीतर इन चुनौतियों का सामना करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है। ऐसे में, किसी एक पड़ोसी देश से सीधे 'न्याय' की मांग को स्वीकार करना मुश्किल हो सकता है।
- विकसित देशों की जिम्मेदारी: भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि विकसित देशों को ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन के लिए अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और विकासशील देशों को जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी सहायता प्रदान करनी चाहिए। भारत का मानना है कि नेपाल को 'न्याय' दिलाने की मुख्य जिम्मेदारी उन अमीर देशों की है।
- क्षेत्रीय सहयोग: भारत क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देने में विश्वास करता है। उसका मानना है कि दक्षिण एशियाई देशों को एक साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि वे जलवायु परिवर्तन से सामूहिक रूप से लड़ सकें और वैश्विक मंच पर अपनी बात को मजबूत कर सकें।
निष्कर्ष
नेपाल की 'न्याय' की मांग और भारत के 'साझा चुनौती' के दृष्टिकोण के बीच का संवाद जलवायु परिवर्तन के वैश्विक और क्षेत्रीय आयामों को दर्शाता है। यह सिर्फ दो देशों के बीच का मुद्दा नहीं, बल्कि विकासशील देशों के भीतर भी जलवायु न्याय की जटिलताओं को उजागर करता है। इस संकट से निपटने के लिए कूटनीति, सहयोग और सहानुभूति की आवश्यकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि ये दोनों पड़ोसी देश इस चुनौती को कैसे एक अवसर में बदलते हैं ताकि न केवल अपने लोगों के लिए, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक स्थायी भविष्य सुरक्षित किया जा सके।
हमें उम्मीद है कि यह गहन विश्लेषण आपको इस महत्वपूर्ण मुद्दे की गहरी समझ देने में सफल रहा होगा।
इस मुद्दे पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि भारत को नेपाल की 'न्याय' की मांग को और अधिक सक्रिय रूप से समर्थन देना चाहिए या 'साझा चुनौती' का दृष्टिकोण ही सही है? अपने विचार कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं!
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स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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