सरकार पश्चिमी घाट के पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) को कम से कम तीन राज्यों में अधिसूचित करने की तैयारी कर रही है। यह खबर पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन साधने की भारत की दशकों पुरानी बहस को एक नया मोड़ देती है। यह सिर्फ एक सरकारी अधिसूचना नहीं, बल्कि हमारे देश के 'ग्रीन हार्ट' – पश्चिमी घाट – के भविष्य को आकार देने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है।
उनकी मुख्य चिंताएँ हैं:
पश्चिमी घाट: एक अनमोल धरोहर और उसकी अहमियत
पश्चिमी घाट, जिसे भारत का 'जैविक हॉटस्पॉट' कहा जाता है, गुजरात से लेकर तमिलनाडु तक फैला हुआ लगभग 1,600 किलोमीटर लंबा एक पर्वत श्रृंखला है। यह न केवल भौगोलिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि पर्यावरणीय और सांस्कृतिक रूप से भी अतुलनीय है।Photo by Zoshua Colah on Unsplash
क्यों है पश्चिमी घाट इतना खास?
- जैव विविधता का खजाना: पश्चिमी घाट विश्व के आठ सबसे बड़े जैव विविधता वाले हॉटस्पॉट में से एक है। यहां हजारों प्रकार के पेड़-पौधे और जीव-जंतु पाए जाते हैं, जिनमें से कई दुनिया में कहीं और नहीं मिलते।
- जलवायु नियामक: यह क्षेत्र मानसून के पैटर्न को प्रभावित करता है और दक्षिणी भारत में वर्षा का मुख्य स्रोत है।
- जल स्रोत: कावेरी, गोदावरी, कृष्णा जैसी कई प्रमुख नदियाँ इसी क्षेत्र से निकलती हैं, जो लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा हैं।
- कार्बन सिंक: घने जंगल कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करते हैं।
पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) क्या हैं और क्यों जरूरी हैं?
पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (Eco-Sensitive Areas - ESA) वे क्षेत्र होते हैं जिन्हें पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया जाता है। इन क्षेत्रों को राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों और संरक्षित क्षेत्रों के आसपास 10 किलोमीटर तक के दायरे में परिभाषित किया जाता है। ESA का मुख्य उद्देश्य इन संरक्षित क्षेत्रों के आसपास मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित करना है ताकि वन्यजीवों और उनके आवासों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सके। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी गतिविधियाँ रुक जाएंगी, बल्कि कुछ गतिविधियों पर प्रतिबंध या विनियमन होगा, जैसे:- खनन और उत्खनन
- बड़े पैमाने पर उद्योग
- पर्यटन संबंधी मेगा-परियोजनाएं
- थर्मल पावर प्लांट
- प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग
इतिहास और संदर्भ: गडगिल से कस्तूरीरंगन तक
पश्चिमी घाट के संरक्षण का मुद्दा कोई नया नहीं है। इसकी जड़ें कई दशकों पुरानी हैं।गडगिल समिति (2010)
केंद्र सरकार ने 2010 में पश्चिमी घाट पर एक विशेषज्ञ पैनल, जिसे प्रोफेसर माधव गडगिल की अध्यक्षता में गठित किया गया था (Western Ghats Ecology Expert Panel - WGEEP), का गठन किया। इस समिति ने 2011 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें पश्चिमी घाट के पूरे क्षेत्र को तीन पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्रों (ESA 1, ESA 2, ESA 3) में विभाजित करने और कठोर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई थी। गडगिल रिपोर्ट ने पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों के बीच व्यापक समर्थन प्राप्त किया, लेकिन स्थानीय समुदायों, उद्योगों और कुछ राज्य सरकारों द्वारा इसका कड़ा विरोध किया गया। उनका तर्क था कि ये सिफारिशें उनकी आजीविका, विकास और आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेंगी।कस्तूरीरंगन समिति (2012)
गडगिल रिपोर्ट के विरोध को देखते हुए, सरकार ने एक उच्च-स्तरीय कार्य समूह (High-Level Working Group - HLWG) का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता डॉ. के. कस्तूरीरंगन ने की। इस समिति को गडगिल रिपोर्ट की समीक्षा करनी थी। कस्तूरीरंगन समिति ने 2013 में अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें पश्चिमी घाट के कुल क्षेत्रफल का लगभग 37% (लगभग 60,000 वर्ग किलोमीटर) क्षेत्र को ESA के रूप में अधिसूचित करने का सुझाव दिया गया था। कस्तूरीरंगन रिपोर्ट, गडगिल रिपोर्ट की तुलना में कम कठोर थी। इसने केवल गैर-वनाच्छादित, गैर-कृषि क्षेत्रों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर जोर दिया। हालांकि, इस रिपोर्ट का भी केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में विरोध हुआ, क्योंकि स्थानीय लोगों को अपनी ज़मीनों पर प्रतिबंधों का डर था। तब से, इस मुद्दे पर कई ड्राफ्ट अधिसूचनाएं जारी की गईं, लेकिन राज्य सरकारों के प्रतिरोध और स्थानीय लोगों की चिंताओं के कारण कोई भी अंतिम रूप नहीं ले सकी। अब, "सरकार कम से कम तीन राज्यों में अधिसूचना की तैयारी कर रही है" यह दर्शाता है कि एक बार फिर इस दिशा में गंभीरता से विचार किया जा रहा है।क्यों यह खबर अहम है और क्यों अब?
यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक लंबे समय से लंबित और अत्यधिक संवेदनशील मुद्दे पर निर्णायक कार्रवाई का संकेत देती है।Photo by Sushanta Rokka on Unsplash
पर्यावरण संकट की बढ़ती चिंताएँ
हाल के वर्षों में, पश्चिमी घाट क्षेत्र ने कई प्राकृतिक आपदाएँ देखी हैं, जिनमें केरल में विनाशकारी बाढ़ और कर्नाटक तथा महाराष्ट्र में भूस्खलन शामिल हैं। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पारिस्थितिकी तंत्र के साथ छेड़छाड़ के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। वैज्ञानिक और पर्यावरणविद लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि संरक्षण के उपाय नहीं किए गए, तो स्थितियां और बदतर हो सकती हैं।जलवायु परिवर्तन का दबाव
वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच, भारत पर अपने महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा के लिए दबाव बढ़ रहा है। पश्चिमी घाट जैसे कार्बन सिंक की रक्षा करना भारत के जलवायु लक्ष्यों के लिए महत्वपूर्ण है।राज्यों की बदलती सोच?
संभव है कि कुछ राज्य, जो पहले इन प्रतिबंधों का विरोध कर रहे थे, अब पर्यावरण संरक्षण की बढ़ती तात्कालिकता को समझते हुए अधिक सहयोगात्मक रुख अपना रहे हों। "कम से कम तीन राज्यों" का उल्लेख यह दर्शाता है कि सभी छह पश्चिमी घाट राज्यों में एक साथ सहमति नहीं बनी है, लेकिन कुछ आगे बढ़ने को तैयार हैं।प्रभाव और चुनौतियाँ: दोनों पक्षों की राय
इस अधिसूचना के लागू होने पर पश्चिमी घाट में रहने वाले लाखों लोगों और वहां की पारिस्थितिकी पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। इस मुद्दे पर हमेशा दो प्रमुख पक्ष रहे हैं: पर्यावरण संरक्षण और विकास/आजीविका।पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों का पक्ष: संरक्षण की अनिवार्यता
पर्यावरणविद इस कदम का स्वागत करते हैं। उनका मानना है कि पश्चिमी घाट को बिना किसी देरी के संरक्षित किया जाना चाहिए।- अविनाशी क्षति से बचाव: खनन, उत्खनन और बड़े पैमाने पर निर्माण से होने वाली क्षति अपरिवर्तनीय है। ESA अधिसूचना इन गतिविधियों को रोककर इस क्षति को कम करेगी।
- जैव विविधता की रक्षा: यह अनोखी प्रजातियों के आवासों की रक्षा करेगा और जैव विविधता के नुकसान को धीमा करेगा।
- जल सुरक्षा: प्रदूषण और अतिक्रमण से नदियों और जल स्रोतों की रक्षा होगी, जिससे लाखों लोगों के लिए पानी की आपूर्ति सुनिश्चित होगी।
- प्राकृतिक आपदाओं में कमी: वनों की कटाई और अवैज्ञानिक विकास से भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाएँ बढ़ती हैं। ESA इन जोखिमों को कम करेगा।
स्थानीय समुदायों और किसानों की चिंताएँ: आजीविका का सवाल
दूसरी ओर, पश्चिमी घाट में रहने वाले लाखों स्थानीय समुदायों, विशेषकर किसानों और आदिवासियों के लिए, यह अधिसूचना चिंता का विषय है।Photo by Zoshua Colah on Unsplash
- आजीविका का नुकसान: कृषि, बागवानी, मछली पकड़ना और वन उत्पादों पर निर्भरता वाले समुदायों को डर है कि नए नियम उनकी पारंपरिक आजीविका को प्रतिबंधित कर सकते हैं।
- विकास पर प्रतिबंध: उन्हें डर है कि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (सड़कें, अस्पताल, स्कूल) के निर्माण में बाधा आएगी, जिससे क्षेत्र का विकास रुक जाएगा।
- ज़मीन पर अधिकार: ESA की सीमाओं के भीतर उनकी निजी ज़मीन पर लगने वाले प्रतिबंधों को लेकर वे चिंतित हैं। उन्हें लगता है कि उनकी भूमि के अधिकार कम हो जाएंगे।
- परामर्श का अभाव: अक्सर उन्हें लगता है कि ऐसे बड़े निर्णय लेते समय उनकी राय और अनुभव को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।
राज्य सरकारों और उद्योगों की भूमिका
राज्य सरकारें अक्सर इन दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं। उन्हें एक ओर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के निर्देशों का पालन करना होता है, तो दूसरी ओर अपने नागरिकों और उद्योगों की मांगों को भी पूरा करना होता है। उद्योग जगत, विशेष रूप से खनन और पर्यटन से जुड़े, नए प्रतिबंधों को अपनी विकास योजनाओं में बाधा के रूप में देखते हैं। वे अक्सर आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और राजस्व के नुकसान की दलील देते हैं।आगे क्या?
अधिसूचना की तैयारी एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह केवल शुरुआत है। इस प्रक्रिया में अभी भी कई चरण शामिल होंगे:- ड्राफ्ट अधिसूचना का प्रकाशन: मंत्रालय एक ड्राफ्ट अधिसूचना जारी करेगा, जिसमें ESA की विस्तृत सीमाओं और अनुमेय/निषिद्ध गतिविधियों का उल्लेख होगा।
- सार्वजनिक प्रतिक्रिया: इस ड्राफ्ट पर आम जनता, राज्य सरकारों और हितधारकों से आपत्तियाँ और सुझाव मांगे जाएंगे।
- विचार-विमर्श और संशोधन: प्राप्त प्रतिक्रियाओं पर विचार किया जाएगा, और आवश्यकतानुसार अधिसूचना में संशोधन किए जाएंगे।
- अंतिम अधिसूचना: सभी विचार-विमर्श के बाद, अंतिम अधिसूचना जारी की जाएगी, जो कानून का रूप लेगी।
स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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