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Great Nicobar Project: The Epic Saga of Environment vs. Development Heats Up Again – Jairam Ramesh Confronts Bhupender Yadav! - Viral Page (ग्रेट निकोबार परियोजना: पर्यावरण बनाम विकास की महागाथा पर फिर गरमाई बहस – जयराम रमेश ने भूपेंद्र यादव को घेरा! - Viral Page)

ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना: जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को ग्रीन नोड पर फिर घेरा!

भारत के पर्यावरण और विकास के बीच चल रहा द्वंद्व एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार केंद्र में है महत्वाकांक्षी ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना और इसके पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और मौजूदा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव के बीच तीखी नोकझोंक। यह सिर्फ एक राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि भविष्य के भारत के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्नचिह्न है – क्या हम विकास की दौड़ में अपने अनमोल प्राकृतिक विरासत को खोने के लिए तैयार हैं?

क्या हुआ: नवीनतम टकराव

यह कोई पहली बार नहीं है जब जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी पर सवाल उठाए हैं। वास्तव में, 'फिर घेरा' शब्द ही बताता है कि यह विवाद पुराना है और लगातार गहराता जा रहा है। नवीनतम टकराव तब सामने आया जब जयराम रमेश ने एक बार फिर पर्यावरण मंत्रालय और उसकी विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) द्वारा इस मेगा-परियोजना को दी गई 'हरी झंडी' की वैधता और प्रक्रिया पर गंभीर चिंता व्यक्त की।

रमेश का आरोप है कि इस विशाल परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी देते समय कई नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई है। उनका मानना है कि यह देश के सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों में से एक पर 'अपरिवर्तनीय' और 'विनाशकारी' प्रभाव डालेगा। उन्होंने विशेष रूप से पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को संबोधित करते हुए कहा कि मंत्रालय ने वैज्ञानिक तथ्यों और विशेषज्ञ सलाह को दरकिनार कर दिया है, जिससे भारत की जैव विविधता को गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

A split image showing Jairam Ramesh speaking passionately on one side and Bhupender Yadav listening intently on the other, symbolizing their confrontation.

Photo by ARTO SURAJ on Unsplash

पृष्ठभूमि: ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना क्या है?

ग्रेट निकोबार द्वीप, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का सबसे दक्षिणी द्वीप है और भारत के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह इलाका अपनी अद्वितीय जैव विविधता, घने वर्षावनों और स्वदेशी जनजातियों (जैसे शोम्पेन और निकोबारी) के लिए जाना जाता है।

परियोजना की महत्वाकांक्षाएं

यह परियोजना, जिसे नीति आयोग ने "समग्र विकास" के रूप में पेश किया है, ₹72,000 करोड़ से अधिक की अनुमानित लागत पर बन रही है। इसमें चार मुख्य घटक शामिल हैं:

  1. एक विशाल अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट: इसे हिंद महासागर में एक प्रमुख शिपिंग हब बनाने का लक्ष्य है।
  2. एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा: सैन्य और नागरिक दोनों उपयोग के लिए।
  3. एक टाउनशिप और संबंधित बुनियादी ढांचा: लगभग 6.5 लाख की आबादी वाले शहर का निर्माण।
  4. एक गैस और सौर ऊर्जा आधारित बिजली संयंत्र: ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए।

सरकार का तर्क है कि यह परियोजना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, क्षेत्र में आर्थिक विकास लाएगी और रोजगार के अवसर पैदा करेगी।

'ग्रीन नोड' पर विवाद की जड़

परियोजना को जनवरी 2023 में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा पर्यावरण और वन मंजूरी (ईएफएसी) मिली, जिसे आमतौर पर 'ग्रीन नोड' कहा जाता है। यही वह मंजूरी है जिस पर जयराम रमेश सहित कई पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, यह मंजूरी एक त्रुटिपूर्ण और अपर्याप्त पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) रिपोर्ट पर आधारित है, जो द्वीप के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र और स्वदेशी आबादी पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभावों को समझने में विफल रही है।

An aerial view of the lush, dense rainforests of Great Nicobar Island meeting clear blue waters, highlighting its pristine natural beauty.

Photo by Nabil Naidu on Unsplash

यह मुद्दा क्यों ट्रेंड कर रहा है?

यह मुद्दा कई कारणों से लगातार सुर्खियों में बना हुआ है:

  • अभूतपूर्व पर्यावरणीय चिंताएं: यह भारत की सबसे बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक है जो देश के सबसे अछूते और जैव-विविधता संपन्न क्षेत्रों में से एक को प्रभावित करती है।
  • रणनीतिक महत्व बनाम पारिस्थितिक संवेदनशीलता: यह राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के दावों को गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक लागतों के साथ संतुलित करने की चुनौती पेश करता है।
  • स्वदेशी जनजातियों का भविष्य: शोम्पेन और निकोबारी जैसी कमजोर जनजातीय समूहों के विस्थापन और जीवन शैली पर सीधा खतरा।
  • उच्च-स्तरीय राजनीतिक बहस: दो प्रमुख राजनेताओं – एक पूर्व पर्यावरण मंत्री और एक मौजूदा मंत्री – के बीच टकराव इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर करता है।
  • जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता का नुकसान: यह मुद्दा वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है, जहां हरियाली और स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

परियोजना का संभावित प्रभाव

यदि परियोजना अपने वर्तमान स्वरूप में आगे बढ़ती है, तो इसके दूरगामी और अक्सर अपरिवर्तनीय प्रभाव हो सकते हैं:

  • जैव विविधता का नुकसान:
    • वन्यजीव: अनुमान है कि लाखों पेड़ काटे जाएंगे, जिससे निकोबार मेगापोड, निकोबार ट्री श्रीव और निकोबार क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल जैसे स्थानिक और लुप्तप्राय प्रजातियों के आवास नष्ट हो जाएंगे।
    • समुद्री जीवन: बंदरगाह निर्माण और संबंधित गतिविधियों से प्रवाल भित्तियों, समुद्री कछुओं (लेदरबैक और हॉक्सबिल) और अन्य समुद्री जीवों को गंभीर खतरा होगा।
  • स्वदेशी जनजातियों पर प्रभाव:
    • शोम्पेन, एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी), और निकोबारी जनजातियों को उनके पारंपरिक आवासों और जीवन शैली से विस्थापित होने का खतरा है।
    • उनकी संस्कृति, आजीविका और पहचान को अपरिवर्तनीय क्षति हो सकती है।
  • पर्यावरणीय असंतुलन: इतने बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से स्थानीय जलवायु पैटर्न, जल चक्र और मिट्टी की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
  • भूवैज्ञानिक जोखिम: यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से सक्रिय है। विशाल निर्माण से इस क्षेत्र की नाजुक भूवैज्ञानिक संरचना पर दबाव बढ़ सकता है।

दोनों पक्ष: विकास बनाम संरक्षण

जयराम रमेश और पर्यावरणविदों का पक्ष:

जयराम रमेश और उनके साथ खड़े पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और नागरिक समाज संगठनों का तर्क है कि परियोजना को जिस तरह से मंजूरी दी गई है, वह वैज्ञानिक सिद्धांतों और पर्यावरणीय नैतिकता का उल्लंघन है।

  • त्रुटिपूर्ण EIA रिपोर्ट: उनका मुख्य तर्क है कि ईआईए रिपोर्ट में गंभीर खामियां हैं। यह पर्याप्त वैज्ञानिक डेटा पर आधारित नहीं है और इसने परियोजना के दीर्घकालिक और संचयी प्रभावों का ठीक से आकलन नहीं किया है।
  • जैव विविधता का विनाश: वे इस बात पर जोर देते हैं कि ग्रेट निकोबार द्वीप एक "मेगा-जैव विविधता हॉटस्पॉट" है और ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में इतनी बड़ी परियोजना का मतलब हजारों स्थानिक प्रजातियों का विलुप्त होना है।
  • वन अधिकार और जनजातीय कल्याण: वे स्वदेशी शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों के अधिकारों के उल्लंघन और उनके जीवन पर पड़ने वाले विनाशकारी प्रभावों को उजागर करते हैं। जनजातीय अधिकारों पर वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अनिवार्य ग्राम सभा की सहमति नहीं ली गई है।
  • प्रक्रियात्मक अनियमितताएं: आरोप है कि विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) ने कई सवालों को अनसुलझा छोड़ दिया और पारदर्शिता की कमी थी।

सरकार और भूपेंद्र यादव का पक्ष:

दूसरी ओर, सरकार और पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव इस परियोजना को भारत के लिए 'गेम-चेंजर' मानते हैं। उनका पक्ष निम्नलिखित बिंदुओं पर आधारित है:

  • राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक लाभ: हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर, यह बंदरगाह और हवाई अड्डा भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करेगा।
  • आर्थिक विकास और रोजगार: सरकार का दावा है कि यह परियोजना क्षेत्र में निवेश आकर्षित करेगी, व्यापार को बढ़ावा देगी और हजारों स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करेगी।
  • धारणीय विकास का मॉडल: सरकार का कहना है कि परियोजना को सतत विकास सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है, और पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए पर्याप्त उपाय किए जा रहे हैं। इसमें वनीकरण और पुनर्वास योजनाएं शामिल हैं।
  • व्यापक विचार-विमर्श: मंत्रालय का दावा है कि सभी आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन किया गया है और परियोजना को मंजूरी देने से पहले सभी हितधारकों के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया गया है।

यह स्पष्ट है कि यह सिर्फ एक परियोजना नहीं है, बल्कि भारत के पर्यावरण संरक्षण और विकास लक्ष्यों के बीच संतुलन साधने की एक बड़ी परीक्षा है। जिस तरह से इस परियोजना को संभाला जाता है, वह भविष्य में अन्य बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए एक मिसाल कायम करेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या जयराम रमेश और पर्यावरणविदों की चिंताएं सरकार को परियोजना के पैमाने या कार्यान्वयन के तरीकों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करती हैं, या विकास के तर्कों को ही सर्वोच्चता मिलती है।

यह बहस जारी है, और इसका परिणाम आने वाले दशकों में भारत के प्राकृतिक परिदृश्य और उसकी पहचान पर गहरा प्रभाव डालेगा।

हमें बताएं कि इस मुद्दे पर आपके क्या विचार हैं! क्या आप विकास के पक्ष में हैं, या पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देंगे? नीचे कमेंट करें!

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स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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