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BJP's Old Ally in Assam Feels 'Left in the Cold': Searching for a New Political Path - Viral Page (असम में भाजपा का पुराना सहयोगी 'ठगा महसूस' कर रहा: नई राजनीतिक राह की तलाश - Viral Page)

असम में भाजपा के एक सहयोगी दल ने अब कह दिया है, "बस, बहुत हो गया!" यह कोई सामान्य बयान नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। भाजपा के साथ दशकों पुराना रिश्ता रखने वाली बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (BPF) ने खुद को 'ठगा हुआ' महसूस करते हुए भगवा पार्टी से दूरी बना ली है। इस फैसले ने न केवल असम की राजनीति में हलचल मचा दी है, बल्कि आगामी चुनावों और गठबंधन की राजनीति पर भी गहरा असर डाला है।

क्या हुआ: विश्वास का टूटना और नई राह की तलाश

कुछ समय पहले तक, असम में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (BPF) एक मजबूत गठबंधन का हिस्सा थे, जिसने 2016 के विधानसभा चुनावों में शानदार जीत दर्ज की थी। लेकिन बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (BTC) चुनावों के नतीजों ने इस रिश्ते में दरार डाल दी। दिसंबर 2020 में हुए इन चुनावों में, BPF सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन उसे पूर्ण बहुमत नहीं मिला। उम्मीद थी कि BJP, अपने पुराने सहयोगी BPF के साथ मिलकर BTC में सरकार बनाएगी। लेकिन राजनीतिक गलियारों में सबको चौंकाते हुए, BJP ने BPF को छोड़कर यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (UPPL) और गण सुरक्षा पार्टी (GSP) के साथ गठबंधन कर लिया और BTC में सत्ता की बागडोर UPPL के प्रमुख प्रमोद बोरो के हाथों में सौंप दी। यह घटना BPF के लिए एक बड़ा झटका थी। पार्टी को लगा कि उसे बीच रास्ते में छोड़ दिया गया है और उसकी सालों की वफादारी को नजरअंदाज किया गया है। BPF नेतृत्व ने इस कदम को "विश्वासघात" करार दिया। नतीजतन, मार्च 2021 में, असम विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, BPF ने औपचारिक रूप से भाजपा से अपना गठबंधन तोड़ दिया और कांग्रेस के नेतृत्व वाले 'महाजोत' (महागठबंधन) में शामिल हो गई। इस फैसले ने असम की चुनावी बिसात पर एक नई चाल चल दी है, जिसके गहरे निहितार्थ हैं।

पृष्ठभूमि: बोडोलैंड की राजनीति और भाजपा की 'असम-मित्र' रणनीति

बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (BPF) का गठन 2005 में हुआ था और तब से यह बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (BTR) की राजनीति में एक प्रमुख शक्ति रही है। BPF के नेता हाग्रामा मोहिलारी ने बोडो आंदोलन से निकलकर इस क्षेत्र में शांति और विकास की एक नई धारा बहाई थी। BTC पर BPF का एकछत्र राज था और मोहिलारी लगातार कई वर्षों तक BTC के चीफ एक्जीक्यूटिव मेंबर (CEM) रहे। 2016 के असम विधानसभा चुनावों में, भाजपा ने पूर्वोत्तर में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए 'असम-मित्र' रणनीति अपनाई। इस रणनीति के तहत, भाजपा ने क्षेत्रीय दलों जैसे असम गण परिषद (AGP) और BPF के साथ गठबंधन किया। इस गठबंधन ने कांग्रेस के दशकों के शासन को समाप्त करते हुए असम में भाजपा की पहली सरकार बनाने में मदद की। BPF के साथ गठबंधन ने भाजपा को बोडो बहुल क्षेत्रों में मजबूत पैठ बनाने में मदद की, जो चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण थे। बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (BTR) का अपना एक जटिल इतिहास है। दशकों तक चले उग्रवाद के बाद, 2003 में बोडोलैंड समझौता हुआ, जिसके तहत BTC का गठन किया गया, जो क्षेत्र में सीमित स्वायत्तता प्रदान करता है। BPF ने इस समझौते के बाद से ही BTC पर शासन किया। हालाँकि, भाजपा ने हमेशा से ही इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की, खासकर उन गैर-बोडो समुदायों के बीच जो BPF के शासन से असंतुष्ट थे। UPPL का उदय भी इस पृष्ठभूमि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक अपेक्षाकृत नई पार्टी है जिसे 2015 में स्थापित किया गया था। UPPL ने BPF के खिलाफ एक विकल्प के रूप में खुद को पेश किया, खासकर उन युवा बोडो मतदाताओं के बीच जो एक नए नेतृत्व की तलाश में थे और BPF के लंबे शासन से ऊब चुके थे। 2020 में एक नए बोडो शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसने केंद्र सरकार को बोडो मुद्दों पर सीधा संवाद करने का अवसर दिया और इससे UPPL जैसे नए बोडो दलों को मजबूती मिली।

यह मुद्दा क्यों गरमा रहा है: आगामी चुनावों पर असर और गठबंधन की विश्वसनीयता

BPF का भाजपा से नाता तोड़ना कई कारणों से सुर्खियों में है और इसकी चर्चा गर्म है: * **चुनावी गणित पर प्रभाव:** असम विधानसभा चुनावों (अगर ये खबर चुनाव से पहले की है) या अगले चुनावों पर इसका सीधा असर पड़ेगा। BPF के कांग्रेस के नेतृत्व वाले महाजोत में शामिल होने से विपक्षी गठबंधन को बोडो बहुल क्षेत्रों में एक मजबूत चेहरा मिल गया है, जिससे भाजपा के लिए इन क्षेत्रों में अपनी पकड़ बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। * **भाजपा की गठबंधन रणनीति पर सवाल:** इस घटना ने भाजपा की गठबंधन रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह दर्शाता है कि भाजपा आवश्यकतानुसार अपने सहयोगियों को छोड़ने में संकोच नहीं करती, खासकर जब उसे कोई नया और अधिक अनुकूल विकल्प मिल जाए। यह पूर्वोत्तर के अन्य क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए भी एक संदेश हो सकता है। * **क्षेत्रीय दलों की पहचान का संकट:** BPF का उदाहरण अन्य क्षेत्रीय दलों के लिए एक चेतावनी है कि राष्ट्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन में उनकी अपनी क्षेत्रीय पहचान और स्वायत्तता खतरे में पड़ सकती है। * **उत्तर-पूर्वी राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता:** पूर्वोत्तर भारत में गठबंधन की राजनीति महत्वपूर्ण रही है। इस तरह के बदलाव क्षेत्रीय राजनीतिक स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं और भविष्य में नए गठबंधनों और ध्रुवीकरण को जन्म दे सकते हैं। * **जनता का मूड:** यह मुद्दा इस बात का भी संकेत देता है कि जनता, खासकर बोडो क्षेत्र की, मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य से क्या अपेक्षा कर रही है और क्या वह किसी नए नेतृत्व की तलाश में है।

गठबंधन टूटने का व्यापक प्रभाव

BPF और भाजपा के बीच गठबंधन टूटने के कई दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं: *

असम की राजनीति पर:

* **बदलता सत्ता समीकरण:** BPF के महाजोत में शामिल होने से असम में कांग्रेस-बदरुद्दीन अजमल की AIUDF और BPF का एक मजबूत त्रिकोणीय गठबंधन बन गया है, जो भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करेगा। * **मतदाताओं का ध्रुवीकरण:** यह मुद्दा विभिन्न समुदायों के वोटों को प्रभावित कर सकता है। बोडो और गैर-बोडो वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है। * **गठबंधन की राजनीति की विश्वसनीयता:** इससे भविष्य में क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय दलों के बीच गठबंधन की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं। *

भाजपा पर:

* **NEDA की नींव:** भाजपा ने पूर्वोत्तर में नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (NEDA) का गठन किया है, जिसमें कई क्षेत्रीय दल शामिल हैं। BPF का जाना NEDA की नींव को कमजोर कर सकता है और अन्य सहयोगियों में असंतोष पैदा कर सकता है। * **छवि को नुकसान:** भाजपा पर यह आरोप लग सकता है कि वह अपने सहयोगियों के प्रति वफादार नहीं है, जिससे उसकी राष्ट्रीय स्तर पर छवि को नुकसान हो सकता है। * **बोडोलैंड में चुनौती:** बोडोलैंड क्षेत्र में भाजपा को अब UPPL पर पूरी तरह निर्भर रहना होगा, जो एक मजबूत चुनौती है। *

BPF पर:

* **नई राजनीतिक पहचान:** BPF के लिए यह एक मौका है कि वह अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखे और कांग्रेस के साथ मिलकर एक नई राजनीतिक दिशा तय करे। * **अस्तित्व की लड़ाई:** BPF के लिए यह एक अस्तित्व की लड़ाई भी हो सकती है, क्योंकि उसे नए सिरे से अपने जनाधार को मजबूत करना होगा और UPPL जैसे नए प्रतिद्वंद्वियों का सामना करना होगा। *

बोडोलैंड क्षेत्र पर:

* **स्थिरता और विकास:** राजनीतिक अस्थिरता से क्षेत्र में विकास परियोजनाओं और शांति प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। * **नए नेतृत्व का आगमन:** UPPL के सत्ता में आने से क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत हुई है, लेकिन उसे BPF और अन्य दलों के मजबूत विरोध का सामना करना होगा।

तथ्य और आंकड़े: एक नज़र

आइए कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों और आंकड़ों पर गौर करें, जो इस राजनीतिक घटनाक्रम को समझने में मदद करते हैं: * BTC चुनाव 2020: * BPF: 17 सीटें (सबसे बड़ी पार्टी) * BJP: 9 सीटें * UPPL: 12 सीटें * कांग्रेस: 1 सीट * GSP: 1 सीट * बहुमत का आंकड़ा: 21 सीटें * गठबंधन का गणित: भाजपा ने UPPL (12) और GSP (1) के साथ मिलकर 22 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया, जबकि BPF (17) को अकेले छोड़ दिया गया। * महत्वपूर्ण तिथियाँ: * दिसंबर 2020: BTC चुनाव परिणाम और UPPL-BJP गठबंधन की घोषणा। * मार्च 2021: BPF द्वारा भाजपा से गठबंधन तोड़ने और 'महाजोत' में शामिल होने की घोषणा। * प्रमुख नेता: * हाग्रामा मोहिलारी (BPF प्रमुख) * हिमंत बिस्वा सरमा (तत्कालीन भाजपा नेता और NEDA संयोजक) * प्रमोद बोरो (UPPL प्रमुख और BTC के CEM)

दोनों पक्षों की राय: आरोप-प्रत्यारोप और स्पष्टीकरण

इस पूरे प्रकरण में, दोनों ही पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश की हैं। *

BPF का पक्ष:

* विश्वासघात और उपेक्षा: BPF के नेताओं ने बार-बार कहा है कि भाजपा ने उनके साथ विश्वासघात किया है। BPF प्रमुख हाग्रामा मोहिलारी ने कहा कि "हमने सालों तक भाजपा के साथ मिलकर काम किया, लेकिन उन्होंने हमें छोड़ दिया और नए दोस्त बना लिए।" * क्षेत्रीय पहचान को कमजोर करना: BPF का मानना है कि भाजपा ने जानबूझकर बोडोलैंड क्षेत्र में उनकी क्षेत्रीय पहचान और शक्ति को कमजोर करने की कोशिश की, ताकि वह अपनी राष्ट्रीय पार्टी की पकड़ को मजबूत कर सके। * वादाखिलाफी: BPF ने आरोप लगाया कि भाजपा ने गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया और BTC चुनावों के बाद उनसे कोई सलाह नहीं ली। *

भाजपा का पक्ष:

* लोकतांत्रिक जनादेश का सम्मान: भाजपा ने अपनी कार्रवाई को BTC के लोकतांत्रिक जनादेश का सम्मान बताया। उनका तर्क था कि UPPL को पर्याप्त जनसमर्थन मिला था और जनता एक बदलाव चाहती थी। * विकास और सुशासन की प्राथमिकता: भाजपा नेताओं ने कहा कि उनका लक्ष्य बोडोलैंड क्षेत्र में विकास और सुशासन लाना है, और इसके लिए उन्होंने एक ऐसे गठबंधन को चुना जो क्षेत्र की आकांक्षाओं को बेहतर ढंग से पूरा कर सके। * BPF की घटती लोकप्रियता: भाजपा के कुछ नेताओं ने यह भी संकेत दिया कि BPF की लोकप्रियता घट रही थी और बोडो लोग एक नए नेतृत्व की तलाश में थे। * नई शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाना: भाजपा ने तर्क दिया कि UPPL के साथ गठबंधन बोडो शांति समझौते के बाद क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत थी, जहां सभी हितधारकों को साथ लेकर चला जाएगा।

आगे क्या: असम की राजनीति का भविष्य

BPF का भाजपा से अलग होना केवल एक गठबंधन का टूटना नहीं है, बल्कि यह असम और पूर्वोत्तर की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है। यह घटना दर्शाती है कि राष्ट्रीय पार्टियां, खासकर भाजपा, पूर्वोत्तर में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए क्षेत्रीय सहयोगियों पर अपनी शर्तों को थोपने या उन्हें बदलने में संकोच नहीं करेंगी। दूसरी ओर, यह क्षेत्रीय दलों के लिए भी एक चुनौती है कि वे अपनी पहचान और अस्तित्व को कैसे बनाए रखते हैं। असम में आगामी चुनाव (या जो हो चुके हैं, अगर खबर चुनाव के बाद की है) इस बदलाव की असली परीक्षा होंगे। बोडो बेल्ट, जो कभी BPF का गढ़ था, अब भाजपा और UPPL के गठबंधन और महाजोत के बीच विभाजित हो सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि बोडो समुदाय किस ओर करवट लेता है और क्या यह राजनीतिक फेरबदल असम के चुनावी और सामाजिक ताने-बाने को दीर्घकालिक रूप से प्रभावित करता है। **क्या आपको लगता है कि भाजपा ने BPF के साथ सही किया? या BPF का यह फैसला उसके लिए एक नई शुरुआत साबित होगा? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में बताएं!** इस लेख को अपने दोस्तों और परिवार के साथ **शेयर करें** ताकि वे भी इस महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम को समझ सकें। अधिक ब्रेकिंग न्यूज़ और विश्लेषण के लिए, **Viral Page को फॉलो करें!**

स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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