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Rishab Rikhiram, Anoushka Shankar and the Question of Lineage: An Unheard Melody of a Musical Legacy - Viral Page (ऋषभ रिखिराम, अनुष्का शंकर और वंशानुक्रम का सवाल: एक संगीतमय विरासत की अनसुनी धुन - Viral Page)

ऋषभ रिखिराम, अनुष्का शंकर और वंशानुक्रम का सवाल हाल ही में संगीत जगत में एक ऐसी चर्चा ने ज़ोर पकड़ा है, जिसने भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक सबसे सम्मानित घराने के भीतर की जटिलताओं को उजागर कर दिया है। यह चर्चा है दिग्गज सितार वादक पंडित रवि शंकर की विरासत और उसे आगे बढ़ाने वाले उनके वंशजों से जुड़ी। केंद्र में हैं पंडित जी के पोते, सितार वादक ऋषभ रिखिराम, और उनकी विश्व-प्रसिद्ध बेटी, अनुष्का शंकर। ऋषभ ने कुछ ऐसे सवाल उठाए हैं, जो न केवल परिवार के भीतर बल्कि संगीत प्रेमियों के बीच भी वंशानुक्रम, पहचान और सम्मान की बहस छेड़ रहे हैं।

तो आखिर हुआ क्या है? ऋषभ रिखिराम ने सार्वजनिक रूप से अपनी पहचान और अपने दादा, पंडित रवि शंकर की विरासत से अपने सीधे जुड़ाव पर जोर दिया है। उनका मानना है कि उन्हें उस रूप में पहचान नहीं मिली है, जिसके वे हकदार हैं, खासकर जब बात महान पं. रवि शंकर की संगीत परंपरा को आगे बढ़ाने की आती है। यह एक मार्मिक आह्वान है, जो एक ऐसे कलाकार के मन की बात कहता है, जो एक विशालकाय विरासत की छाया में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है, और चाहता है कि उसके "वंश" को उचित मान्यता मिले।

संगीत के दिग्गजों का परिवार: पृष्ठभूमि

इस पूरे मामले को समझने के लिए, हमें पहले पंडित रवि शंकर और उनके परिवार की असाधारण पृष्ठभूमि को जानना होगा।

  • पंडित रवि शंकर: भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक अमर स्तंभ, जिन्होंने सितार को वैश्विक मंच पर पहुंचाया। उन्हें अक्सर 'गॉडफादर ऑफ वर्ल्ड म्यूजिक' कहा जाता है। उनका संगीत सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सुना और सराहा जाता है।
  • अनुष्का शंकर: पंडित जी की बेटी और शिष्या। अनुष्का ने अपने पिता की विरासत को बखूबी आगे बढ़ाया है। वह एक विश्व प्रसिद्ध सितार वादक और संगीतकार हैं, जिन्हें कई ग्रैमी नामांकन मिल चुके हैं। उनकी शैली में पारंपरिक भारतीय शास्त्रीय संगीत और समकालीन प्रभावों का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।
  • नोरा जोन्स: पंडित जी की दूसरी बेटी, जो एक प्रसिद्ध अमेरिकी गायिका-गीतकार हैं। हालांकि उनका संगीत भारतीय शास्त्रीय नहीं है, लेकिन वे अपने पिता की कलात्मक प्रतिभा को दर्शाती हैं।
  • शुभेंद्र राव: ऋषभ रिखिराम के पिता। शुभेंद्र राव पंडित रवि शंकर के प्रिय शिष्य थे और उन्हें पंडित जी ने अपने दत्तक पुत्र (adopted son) के रूप में भी माना था। वे स्वयं एक सिद्धहस्त सितार वादक हैं और उन्होंने पंडित जी की परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

ऋषभ रिखिराम शुभेंद्र राव के बेटे और इस प्रकार पंडित रवि शंकर के पोते हैं। वे भी अपने परिवार की संगीत विरासत को आगे बढ़ाते हुए एक कुशल सितार वादक बन गए हैं। इस पृष्ठभूमि से यह साफ है कि ऋषभ का संबंध पंडित रवि शंकर से सीधा और गहरा है, चाहे वह रक्त संबंध हो या गुरु-शिष्य परंपरा का।

A black and white photo of a young Pandit Ravi Shankar intently playing the sitar on stage.

Photo by Bill Fairs on Unsplash

विवाद की चिंगारी: ऋषभ का बयान

ऋषभ रिखिराम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर और विभिन्न साक्षात्कारों में अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है। उनका मुख्य मुद्दा यह है कि उन्हें, पंडित रवि शंकर के सीधे पोते होने के बावजूद, वह पहचान और सम्मान नहीं मिला है जिसकी उन्हें उम्मीद थी। उनका कहना है कि उनकी पहचान अक्सर शुभेंद्र राव के बेटे के रूप में होती है, न कि सीधे पंडित रवि शंकर के पोते के रूप में, खासकर जब पंडित जी की विरासत के "वंशानुक्रम" की बात आती है।

ऋषभ के अनुसार, उन्हें कभी-कभी परिवार के आयोजनों या सार्वजनिक चर्चाओं में दरकिनार कर दिया जाता है, जबकि अनुष्का शंकर को मुख्य उत्तराधिकारी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। वे मानते हैं कि उनके दादा की परंपरा को आगे बढ़ाने में उनका भी उतना ही महत्वपूर्ण योगदान और अधिकार है। यह एक कलाकार की स्वाभाविक इच्छा है कि उसे अपनी पहचान और परिवार से जुड़ाव के लिए उचित मान्यता मिले। उन्होंने अपनी संगीत यात्रा और पंडित जी की विरासत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर भी जोर दिया है।

क्यों बन रहा है यह मुद्दा ट्रेंडिंग?

यह मुद्दा कई कारणों से ट्रेंडिंग बन रहा है, खासकर आज के डिजिटल युग में:

  • पारिवारिक गाथाओं में रुचि: सार्वजनिक हस्तियों के पारिवारिक विवादों या अंदरूनी चर्चाओं में लोगों की हमेशा से गहरी दिलचस्पी रही है। जब बात संगीत के इतने बड़े घराने की आती है, तो यह स्वाभाविक रूप से ध्यान खींचता है।
  • विरासत और उत्तराधिकार का सवाल: यह मुद्दा सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि भारतीय कला और संस्कृति में विरासत को कैसे परिभाषित और आगे बढ़ाया जाता है, उस पर एक बड़ी बहस छेड़ता है। क्या विरासत केवल रक्त संबंधों से तय होती है, या इसमें गुरु-शिष्य परंपरा, प्रतिभा और समर्पण भी शामिल है?
  • सोशल मीडिया की शक्ति: ऋषभ जैसे कलाकारों के लिए सोशल मीडिया अपनी बात रखने का एक सीधा मंच बन गया है। एक व्यक्तिगत भावना अब लाखों लोगों तक पहुंच सकती है, जिससे यह एक सार्वजनिक बहस का रूप ले लेती है।
  • कलात्मक पहचान का संघर्ष: यह कहानी उन सभी कलाकारों के संघर्ष को दर्शाती है, जो महान दिग्गजों की छाया में अपनी खुद की पहचान बनाने की कोशिश करते हैं, जबकि साथ ही अपनी पारिवारिक विरासत पर गर्व भी करना चाहते हैं।

इस मुद्दे का प्रभाव यह है कि इसने शास्त्रीय संगीत के प्रेमियों और सामान्य दर्शकों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि एक महान कलाकार की विरासत को कौन आगे बढ़ाता है और उसे कैसे सम्मानित किया जाना चाहिए।

A candid shot of Rishab Rikhiram, looking focused, playing the sitar in a performance setting.

Photo by Saubhagya gandharv on Unsplash

तथ्य क्या कहते हैं?

आइए इस विवाद से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर गौर करें:

  • रक्त संबंध: अनुष्का शंकर और नोरा जोन्स पंडित रवि शंकर की सीधी रक्त संबंधी बेटियां हैं।
  • दत्तक पुत्र/शिष्य संबंध: शुभेंद्र राव पंडित रवि शंकर के प्रमुख शिष्य थे और बाद में उन्हें दत्तक पुत्र का दर्जा मिला। भारतीय परंपरा में, एक शिष्य को अक्सर परिवार का सदस्य माना जाता है, और यह रिश्ता बेहद पवित्र होता है।
  • वंशानुक्रम की परिभाषा: 'वंश' या 'लाइनएज' शब्द की व्याख्या अलग-अलग संस्कृतियों और व्यक्तियों के लिए अलग-अलग हो सकती है। कुछ के लिए यह केवल रक्त संबंध है, जबकि अन्य के लिए इसमें आध्यात्मिक या गुरु-शिष्य संबंध भी शामिल होते हैं, खासकर कला के क्षेत्र में।
  • अनुष्का की वैश्विक पहचान: अनुष्का शंकर ने अपने पिता की विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नई पीढ़ी तक पहुंचाया है, जिसमें उनके अपने अद्वितीय संगीत योगदान भी शामिल हैं। उनकी सफलता निर्विवाद है।
  • ऋषभ का समर्पण: ऋषभ रिखिराम भी एक समर्पित सितार वादक हैं, जिन्होंने अपनी कला को निखारने में वर्षों लगाए हैं और अपने दादा की शैली को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।

ये तथ्य दर्शाते हैं कि विवाद 'कौन संबंधित है' के बारे में नहीं है, बल्कि 'कैसे संबंधित है' और 'उस संबंध को कैसे मान्यता दी जाती है' के बारे में है।

दोनों पक्षों को समझना: वंश, कला और पहचान

ऋषभ का पक्ष: पहचान और सम्मान की चाह

ऋषभ रिखिराम के नजरिए से, यह एक पहचान की लड़ाई है। वे अपने दादा पंडित रवि शंकर के संगीत और उनके परिवार के सीधे वंशज हैं, अपने पिता शुभेंद्र राव के माध्यम से, जिन्हें पंडित जी ने स्वयं अपना दत्तक पुत्र माना। उनका यह कहना जायज हो सकता है कि उन्हें उनकी विरासत में एक स्पष्ट और निर्विवाद स्थान मिलना चाहिए। ऋषभ शायद महसूस करते हैं कि उनकी प्रतिभा और पंडित जी के संगीत के प्रति उनके समर्पण के बावजूद, उन्हें अनुष्का शंकर की तरह 'प्रमुख' उत्तराधिकारी के रूप में नहीं देखा जाता, जो कि उन्हें पीड़ा पहुंचाता है। वे चाहते हैं कि उनके दादा के प्रशंसकों और संगीत जगत द्वारा उन्हें वास्तविक वंश के एक महत्वपूर्ण वाहक के रूप में स्वीकार किया जाए। यह किसी भी कलाकार के लिए एक स्वाभाविक मानवीय इच्छा है कि उसे उसके परिवार और उसकी कला के लिए उचित पहचान और सम्मान मिले।

दूसरा पक्ष: विरासत की व्यापक व्याख्या

दूसरे पक्ष को अनुष्का शंकर या व्यापक शंकर परिवार की आधिकारिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि 'वंश' और 'विरासत' की एक सामान्य या पारंपरिक समझ के रूप में देखा जा सकता है।

  • रक्त और कला का संगम: अनुष्का शंकर, पंडित रवि शंकर की बेटी होने के नाते, न केवल रक्त संबंध से जुड़ी हैं, बल्कि उन्होंने अपने पिता से सीधे संगीत की दीक्षा भी ली है। उनकी अपनी कलात्मक यात्रा और वैश्विक सफलता ने उन्हें स्वाभाविक रूप से अपने पिता की विरासत का एक प्रमुख चेहरा बना दिया है। कई लोगों के लिए, प्रत्यक्ष रक्त संबंधी और साथ ही शिष्य होना, विरासत को आगे ले जाने का एक मजबूत आधार प्रदान करता है।
  • 'उत्तराधिकार' की धारणा: शास्त्रीय संगीत में, 'उत्तराधिकार' अक्सर सबसे निपुण और प्रसिद्ध शिष्य या रक्त संबंधी को मिलता है, जो गुरु की शैली और दर्शन को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाता है। अनुष्का ने इसे वैश्विक स्तर पर किया है।
  • दत्तक बनाम रक्त: भारतीय संदर्भ में, जबकि दत्तक पुत्र या शिष्य को परिवार का सदस्य माना जाता है और उसे पूरा सम्मान दिया जाता है, कुछ संदर्भों में 'वंश' (lineage) की सख्त व्याख्या में सीधे रक्त संबंध को अधिक प्राथमिकता दी जा सकती है। यह सांस्कृतिक बारीकियां इस चर्चा को और जटिल बनाती हैं।

यह महत्वपूर्ण है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी जगह पर सही हो सकते हैं। ऋषभ का दावा उनकी व्यक्तिगत भावनाओं और वंश से जुड़ाव पर आधारित है, जबकि दूसरे पक्ष की समझ विरासत को आगे ले जाने के व्यापक मानदंडों पर आधारित हो सकती है।

Anoushka Shankar performing live on stage, gracefully playing her sitar, surrounded by warm stage lights.

Photo by Yash Goyal on Unsplash

आगे क्या? संगीत जगत पर प्रभाव

यह बहस केवल एक परिवार के भीतर का मामला नहीं है; यह भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत और व्यापक कला समुदाय के लिए कई सवाल खड़े करती है:

  • वंशानुक्रम की परिभाषा: क्या वंश केवल रक्त से है, या गुरु-शिष्य परंपरा का भी इसमें बराबर का योगदान है?
  • पहचान का संघर्ष: एक महान दिग्गज की विरासत को आगे बढ़ाने वाले कई योग्य कलाकारों के लिए अपनी पहचान बनाना कितना मुश्किल है?
  • पारदर्शिता की आवश्यकता: क्या कलात्मक घरानों को अपनी विरासत और उत्तराधिकार योजनाओं के बारे में अधिक पारदर्शी होने की आवश्यकता है?

इस चर्चा से भारतीय शास्त्रीय संगीत के भीतर की परंपराओं, आधुनिक पहचानों और कला को जीवित रखने की चुनौतियों पर नए सिरे से विचार करने का अवसर मिलता है। अंततः, पंडित रवि शंकर की विरासत उनके संगीत में जीवित है, और इसे आगे बढ़ाने वाले सभी कलाकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

ऋषभ रिखिराम, अनुष्का शंकर और वंशानुक्रम का सवाल सिर्फ एक पारिवारिक विवाद नहीं है; यह संगीत, विरासत, पहचान और सम्मान के बीच के जटिल संबंधों का एक प्रतिबिंब है। यह एक अनुत्तरित धुन की तरह है जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे एक महान कलाकार की विरासत को न केवल पीढ़ी-दर-पीढ़ी, बल्कि सम्मान और स्वीकृति के साथ आगे बढ़ाया जाता है। आशा है कि यह चर्चा अंततः सभी संबंधित पक्षों के लिए सद्भाव और सम्मान की राह खोलेगी, और पंडित रवि शंकर के अद्भुत संगीत को ही केंद्र में रखेगी।

क्या आपको लगता है कि ऋषभ रिखिराम को उनकी विरासत में उचित स्थान मिल रहा है? आपकी इस पर क्या राय है? कमेंट्स में हमें बताएं! इस आर्टिकल को अपने दोस्तों और संगीत प्रेमियों के साथ शेयर करें। ऐसी ही और दिलचस्प और वायरल खबरों के लिए 'Viral Page' को फॉलो करना न भूलें!

स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)

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