कांग्रेस अमेरिकी व्यापार समझौते के खिलाफ 'किसान सम्मेलन' आयोजित करेगी, पहला 24 फरवरी को भोपाल में। यह खबर सिर्फ एक छोटी सी घोषणा नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति, कृषि क्षेत्र और भारत-अमेरिका संबंधों के लिए एक बड़ा संकेत है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने देशव्यापी 'किसान सम्मेलनों' की घोषणा करके एक बार फिर किसानों के मुद्दों को केंद्र में लाने का प्रयास किया है, जिसका सीधा निशाना मोदी सरकार की नीतियों पर है।
यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब लोकसभा चुनाव नजदीक हैं और किसानों का मुद्दा हमेशा से भारतीय राजनीति में अहम रहा है। कांग्रेस का यह दांव क्या रंग लाएगा? क्या अमेरिकी व्यापार समझौता वाकई भारतीय किसानों के लिए खतरा है? आइए, इस पूरी खबर की तह तक जाते हैं।
आखिर क्या है यह अमेरिकी व्यापार समझौता?
भारत और अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने के साथ-साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार भी हैं। पिछले कुछ समय से दोनों देशों के बीच एक व्यापक व्यापार समझौते (Comprehensive Trade Deal) को लेकर बातचीत चल रही है। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देना, व्यापारिक बाधाओं को कम करना और नए बाजार खोलना है।पृष्ठभूमि और आशंकाएं
इस समझौते के तहत कई क्षेत्रों में छूट और सुविधाएँ देने पर विचार किया जा रहा है। इनमें कृषि उत्पाद, डेयरी उत्पाद, बौद्धिक संपदा अधिकार और टैरिफ जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। अमेरिका लगातार भारत से अपने कृषि उत्पादों, खासकर डेयरी उत्पादों के लिए बाजार तक पहुंच की मांग कर रहा है। इसके बदले में भारत भी कुछ क्षेत्रों में अमेरिकी बाजार तक पहुंच चाहता है। लेकिन यहीं पर विवाद की जड़ है। भारतीय किसानों और विपक्षी दलों को आशंका है कि अगर अमेरिका के भारी सब्सिडी वाले कृषि और डेयरी उत्पाद भारतीय बाजार में बाढ़ लाते हैं, तो इससे भारतीय किसानों के उत्पादों को उचित मूल्य नहीं मिल पाएगा। उनका तर्क है कि अमेरिका में किसानों को सरकार से भारी सब्सिडी मिलती है, जिससे उनके उत्पाद सस्ते हो जाते हैं। अगर ये उत्पाद भारत आते हैं, तो हमारे देश के छोटे और मध्यम किसान उनके साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। इससे उनकी आजीविका पर गंभीर संकट आ जाएगा। पहले भी भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। अमेरिकी उत्पादों पर भारत द्वारा लगाए गए टैरिफ (जैसे हार्ले-डेविडसन बाइक्स पर) और भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी प्रतिबंध (जैसे स्टील और एल्यूमीनियम पर) अतीत में तनाव का कारण बन चुके हैं। अमेरिका ने भारत को अपनी GSP (Generalized System of Preferences) सूची से भी बाहर कर दिया था, जिससे भारतीय निर्यातकों को नुकसान हुआ था। इन पृष्ठभूमियों के चलते किसी भी नए व्यापार समझौते पर काफी बारीकी से नजर रखी जा रही है।Photo by Jorge Maya on Unsplash
कांग्रेस क्यों कर रही है विरोध?
कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि मोदी सरकार अमेरिकी व्यापार समझौते के नाम पर भारतीय किसानों के हितों से समझौता कर रही है। उनका मानना है कि यह समझौता भारतीय कृषि और डेयरी क्षेत्र को बर्बादी की ओर धकेल देगा।किसानों के हितों की वकालत और राजनीतिक दांव
कांग्रेस हमेशा से खुद को किसानों की सबसे बड़ी हितैषी पार्टी बताती रही है। पिछले कुछ वर्षों में, खासकर तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद, किसानों का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में और भी मुखर हो गया है। कांग्रेस इस मुद्दे को उठाकर एक बार फिर सरकार को घेरने और किसानों के बीच अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। उनके विरोध के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:- डेयरी क्षेत्र पर खतरा: भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। लाखों छोटे और सीमांत किसान डेयरी से जुड़े हुए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि अगर अमेरिकी डेयरी उत्पाद (जैसे दूध पाउडर, पनीर) बिना किसी महत्वपूर्ण टैरिफ के भारत में आते हैं, तो वे भारतीय किसानों के उत्पादों को टक्कर नहीं दे पाएंगे। इससे उन्हें भारी नुकसान होगा।
- कृषि उत्पादों का डंपिंग: अमेरिकी कृषि उत्पादों को अक्सर उनकी सरकार द्वारा भारी सब्सिडी मिलती है। ऐसे में, इन उत्पादों के भारतीय बाजार में आने से भारतीय किसानों को अपने उत्पाद औने-पौने दामों पर बेचने पड़ सकते हैं, जिससे उनकी आय प्रभावित होगी।
- खाद्य सुरक्षा: कांग्रेस का तर्क है कि ऐसे समझौते देश की खाद्य सुरक्षा को भी खतरे में डाल सकते हैं, क्योंकि भारत अपनी जरूरतों के लिए विदेशी आयात पर अधिक निर्भर हो जाएगा।
- राजनीतिक अवसर: लोकसभा चुनाव से पहले किसानों के मुद्दे पर सरकार को घेरना कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक अवसर है। यह उन्हें किसान समुदाय के बीच फिर से विश्वास बनाने और विपक्षी एकता को मजबूत करने में मदद कर सकता है।
भोपाल से आंदोलन का शंखनाद – महत्व और रणनीति
कांग्रेस ने अपने पहले 'किसान सम्मेलन' के लिए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को चुना है, जो बेहद रणनीतिक कदम है।मध्य प्रदेश और किसानों की राजनीति
मध्य प्रदेश एक कृषि प्रधान राज्य है, जहां किसानों की आबादी और उनके मुद्दे हमेशा से चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण रहे हैं। हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में, हालांकि कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा, लेकिन किसानों का मुद्दा अभी भी वहां की ग्रामीण आबादी के लिए संवेदनशील है। भोपाल से इस आंदोलन की शुरुआत करके कांग्रेस पूरे देश में एक मजबूत संदेश देना चाहती है। कांग्रेस की रणनीति स्पष्ट है:- राष्ट्रीय विमर्श का निर्माण: छोटे-छोटे सम्मेलनों के माध्यम से एक राष्ट्रीय विमर्श तैयार करना, जिसमें सरकार की आर्थिक और कृषि नीतियों पर सवाल उठाए जाएं।
- किसानों को एकजुट करना: विभिन्न राज्यों के किसानों को इस मुद्दे पर एकजुट करना और उन्हें एक मंच पर लाना। यह पिछले कृषि कानूनों के विरोध प्रदर्शनों की याद दिलाता है, जब किसानों ने एकजुट होकर अपनी ताकत दिखाई थी।
- लोकसभा चुनाव पर नजर: आगामी लोकसभा चुनावों में इस मुद्दे को भुनाना और ग्रामीण वोट बैंक को अपने पाले में लाना। कांग्रेस को उम्मीद है कि यह किसानों के बीच उसकी विश्वसनीयता को बढ़ाएगा।
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सरकार का पक्ष और संभावित तर्क
जहां कांग्रेस इस व्यापार समझौते के खिलाफ मोर्चा खोल रही है, वहीं केंद्र सरकार के पास भी अपने तर्क और इस समझौते के संभावित लाभ गिनाने के लिए कई बिंदु हैं।आर्थिक लाभ और वैश्विक व्यापार
मोदी सरकार का संभवतः यह कहना होगा कि किसी भी व्यापार समझौते का उद्देश्य देश के समग्र आर्थिक हितों को साधना है। उनके संभावित तर्क इस प्रकार हो सकते हैं:- निर्यात को बढ़ावा: यह समझौता भारतीय उत्पादों के लिए अमेरिकी बाजार तक पहुंच बढ़ाएगा, जिससे भारत का निर्यात बढ़ेगा और विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि होगी।
- निवेश आकर्षित करना: व्यापार समझौते से अमेरिकी कंपनियों का भारत में निवेश बढ़ सकता है, जिससे रोजगार के अवसर पैदा होंगे और नई तकनीकें आएंगी।
- रणनीतिक साझेदारी: भारत-अमेरिका संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हैं। यह समझौता दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत करेगा।
- संरक्षण और सुरक्षा उपाय: सरकार यह आश्वासन दे सकती है कि किसी भी व्यापार समझौते में भारतीय किसानों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय और शर्तें शामिल होंगी। जैसे, कुछ संवेदनशील कृषि उत्पादों पर टैरिफ बरकरार रखना या कोटा निर्धारित करना।
- आपूर्ति श्रृंखला में सुधार: वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका को मजबूत करना और उसे अधिक एकीकृत बनाना।
इस आंदोलन का क्या होगा असर?
कांग्रेस के इस 'किसान संकल्प' आंदोलन का भारतीय राजनीति, किसानों और भारत-अमेरिका संबंधों पर गहरा असर पड़ सकता है।किसानों, राजनीति और भारत-अमेरिका संबंधों पर प्रभाव
- किसानों पर:
- जागरूकता में वृद्धि: यह आंदोलन किसानों के बीच अमेरिकी व्यापार समझौते और उसके संभावित प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाएगा।
- एकजुटता: विभिन्न किसान संगठन एक बार फिर एक साझा मंच पर आ सकते हैं, जिससे उनकी सौदेबाजी की शक्ति बढ़ सकती है।
- सरकार पर दबाव: किसानों का बढ़ता दबाव सरकार को व्यापार समझौते की शर्तों पर पुनर्विचार करने या अधिक सुरक्षा उपाय शामिल करने के लिए मजबूर कर सकता है।
- राजनीति पर:
- कांग्रेस के लिए संजीवनी: यह आंदोलन कांग्रेस को लोकसभा चुनावों से पहले एक महत्वपूर्ण मुद्दा देगा और किसानों के बीच उसकी छवि को मजबूत करेगा।
- सत्ताधारी पार्टी के लिए चुनौती: बीजेपी सरकार को इस मुद्दे पर सफाई देनी पड़ सकती है और कांग्रेस के आरोपों का खंडन करना पड़ सकता है। यह उसे ग्रामीण मतदाताओं के बीच अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने के लिए मजबूर करेगा।
- पोलराइजेशन: कृषि और व्यापार के मुद्दों पर राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।
- भारत-अमेरिका संबंधों पर:
- समझौते में देरी: घरेलू राजनीतिक विरोध के कारण व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में देरी हो सकती है।
- शर्तों में बदलाव: सरकार पर दबाव पड़ने पर समझौते की कुछ शर्तों, विशेषकर कृषि से संबंधित, में बदलाव हो सकता है।
- विश्वास का मुद्दा: अमेरिकी पक्ष भारत में घरेलू विरोध को लेकर अपनी रणनीति पर पुनर्विचार कर सकता है।
- अर्थव्यवस्था पर:
- निवेश अनिश्चितता: यदि व्यापार समझौता अनिश्चितता में पड़ जाता है, तो यह कुछ क्षेत्रों में विदेशी निवेश को प्रभावित कर सकता है।
- बाजार पर असर: जिन भारतीय उद्योगों को अमेरिकी बाजार से लाभ की उम्मीद है, उन्हें इंतजार करना पड़ सकता है।
प्रमुख तथ्य और आंकड़े
- आयोजनकर्ता: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस।
- पहला सम्मेलन: 24 फरवरी को भोपाल, मध्य प्रदेश में।
- उद्देश्य: अमेरिकी व्यापार समझौते के खिलाफ किसानों को लामबंद करना।
- भारत-अमेरिका व्यापार (2022-23): लगभग 128.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर (द्विपक्षीय वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार)। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा है।
- भारतीय डेयरी उद्योग का आकार: लगभग 150 बिलियन अमेरिकी डॉलर, जो लाखों ग्रामीण परिवारों को रोजगार देता है।
स्रोत: Indian Express (मूल खबर लिंक - हमारा लेख पूरी तरह मूल विश्लेषण है, कोई कॉपीराइट उल्लंघन नहीं।)
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